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संदेश को आत्मसात करें चिकित्सक

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नयी दिल्ली स्थित अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) के 42वें दीक्षांत समारोह में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने युवा चिकित्सकों के साथ-साथ पूरे चिकित्सक समुदाय को कई सारगर्भित संदेश दिये हैं. देश के गरीब लोगों एवं पिछड़े इलाकों के प्रति कर्तव्यों की ओर ध्यान दिलाते हुए, प्रधानमंत्री ने युवा चिकित्सकों से कहा कि उनकी शिक्षा और प्रशिक्षण में इन तबकों का प्रत्यक्ष व परोक्ष रूप से बड़ा योगदान है.
मोदी ने संकेत किया कि देश की उच्च शिक्षा सरकारी अनुदान पर निर्भर है और यह अनुदान जन कल्याण और विकास की योजनाओं में कटौती करके ही दिया जाता है. इसलिए प्रशिक्षित चिकित्सकों का दायित्व बनता है कि वे अपनी शिक्षा और विशेषज्ञता का लाभ देश को दें. मोदी की यह बात इंजीनियरिंग और विज्ञान के छात्रों के लिए भी समान रूप से प्रासंगिक है.
स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता और संसाधनों के मामले में भारत दुनिया के पिछड़े देशों की कतार में शामिल है. वर्तमान में,देश में 1,218 लोगों पर औसतन एक चिकित्सक उपलब्ध है.
इसमें हर तरह की चिकित्सा-प्रणाली के चिकित्सक शामिल हैं. सरकारी अस्पतालों में करीब दो हजार लोगों पर सिर्फ एक बिस्तर है और एक अस्पताल औसतन 61,744 लोगों को चिकित्सा सुविधाएं प्रदान करता है. चिंता की बात यह भी है कि भारत में चिकित्सा पर होनेवाले कुल खर्च का करीब 26 फीसदी हिस्सा ही सरकारी कोष से आता है. देश के विकास के लिए लोगों का स्वस्थ रहना जरूरी है.
यहां की आबादी का बड़ा हिस्सा गरीब है. उनके लिए स्वास्थ्य सुविधाओं की उपलब्धता सुनिश्चित करना सरकार का उत्तरदायित्व तो है ही, चिकित्सकों से भी सेवा भाव के साथ अपनी जिम्मेवारी समझने की अपेक्षा है. अक्सर देखा जाता है कि कुछ मरीजों या उनके परेशान परिजनों की हरकतों के खिलाफ चिकित्सक हड़ताल पर चले जाते हैं, जिससे आम मरीजों की मुश्किलें बढ़ जाती हैं.
अधिक कमाने की मंशा से अनुचित फीस लेने, गैरजरूरी महंगी जांच व दवाएं लिखने के आरोप भी आम हैं. ज्यादातर चिकित्सकों का मरीजों से संबंध आत्मीय नहीं है. अब ‘स्वस्थ भारत’ के प्रधानमंत्री के आह्वान की सफलता चिकित्सकों के रवैये पर निर्भर करेगी. आशा है कि हमारे चिकित्सक इसे आत्मसात करेंगे.
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