[tdb_header_weather inline="yes" temp_color="#000000" loc_color="#000000" api="653566bd56b7ecfee45d74c0fc937fc1" float_right="yes" align_horiz="content-horiz-center" icon_size="24" icon_space="10" f_temp_font_family="420" f_temp_font_size="14" f_temp_font_weight="500" f_unit_font_size="14" f_loc_font_size="14" f_unit_font_family="882" location="Ranchi" icon_color="#000000"]
[tdb_header_categories align_horiz="content-horiz-left" el_align_horiz="content-horiz-left" tdc_css="eyJhbGwiOnsibWFyZ2luLXJpZ2h0IjoiNSIsImhlaWdodCI6IjQwIiwiZGlzcGxheSI6IiJ9fQ==" icon_size="18" limit="18" elem_text_color="#2d2800" f_elem_font_family="420" f_elem_font_size="16px" f_elem_font_weight="500" tdicon="tdc-font-fa tdc-font-fa-navicon-reorder-bars" inline="yes" shadow_shadow_size="0" shadow_shadow_offset_vertical="0" shadow_shadow_spread="0" bg_color="#f9f9f9" include="1028, 1081, 1446, 1228, 3706, 2624,1071"][tdb_mobile_horiz_menu inline="yes" menu_id="372" tdc_css="eyJwaG9uZSI6eyJkaXNwbGF5IjoiIn0sInBob25lX21heF93aWR0aCI6NzY3LCJhbGwiOnsiYm9yZGVyLXN0eWxlIjoibm9uZSIsImRpc3BsYXkiOiIifX0=" f_elem_font_size="18px" f_elem_font_weight="eyJhbGwiOiI3MDAiLCJwaG9uZSI6IiJ9" f_elem_font_family="420" text_color_h="#f58220" main_sub_icon_size="13"]
Home Opinion मोदी-ओबामा वार्ता से निकलती राह

मोदी-ओबामा वार्ता से निकलती राह

0
अमेरिका में बसा भारतीय समुदाय वहां के आप्रवासियों समूहों में सर्वाधिक धनी तथा प्रतिभाशाली माना जाता है. ऐतिहासिक मैडिसन स्क्वायर के प्रेक्षागृह में पिछले दिनों नरेंद्र मोदी-प्रेमी इंडियन-अमेरिकन कम्युनिटी फाउंडेशन ने साढ़े दस लाख डॉलर के खर्चे से इस समुदाय को दुनिया के सामने दृश्यमान किया, तो दो बातें बड़े स्पष्ट रूप में जाहिर हुईं.
एक, अनिवासी भारतीय नरेंद्र मोदी में नये उभरते भारत की छवि देखता है और दूसरी बात यह कि नरेंद्र मोदी स्वयं भी अपने सपनों के भारत की रचना में इस समुदाय की सक्रिय भूमिका देखते हैं. मैडिसन स्क्वायर में उनके संबोधन का मुख्य स्वर विकास को जनांदोलन बनाने का था. अब उनकी अमेरिका-यात्रा की सफलता इस कसौटी पर मापी जायेगी कि विकास को जनांदोलन बनाने में वे भारत-अमेरिका रिश्तों को कहां तक ले जाने में सफल होते हैं. उस बड़े जलसे के बाद मोदी का अभियान 17 बड़े बहुराष्ट्रीय कंपनियों के मुखिया से मुलाकात और फिर अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के साथ रात्रिभोज में परिणत हुआ.
इन मुलाकातों से साफ है कि उद्योग जगत मोदी की विकास-योजनाओं के भीतर अपने लिए व्यापार की व्यापक संभावनाएं देखता है और अगर भारत का रुख सहयोग का रहा तो ये कंपनियां भारत में अपना निवेश बढ़ा सकती हैं. अगर इस निवेश से भारत में इंफ्रास्ट्रक्चर का विकास होता है, तो इसे मोदी की अमेरिका-यात्रा की सफलता के रूप में देखा जायेगा. भारत ने रक्षा और बीमा क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के लिए दरवाजे खोल दिये हैं, लेकिन अमेरिकी कंपनियों की रुचि खुदरा-क्षेत्र में निवेश की ज्यादा है.
गौरतलब है कि एटमी करार के चार वर्ष के बाद भी न्यूक्लियर लायबलिटी कानून के प्रावधानों की वजह से दोनों देशों के बीच परमाण्विक मामले में अब तक एक डॉलर का भी व्यापार नहीं हुआ है. अमेरिका की एक टेक जलवायु-परिवर्तन के मुद्दे को अपने साथ करने की है, साथ ही वह इस बात से आगाह है कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद को लेकर भारत की अपनी महत्वकांक्षाएं हैं. अमेरिकी अर्थव्यवस्था बीते चार सालों से ठहराव का शिकार है. ऐसे में उम्मीद है कि दोनों देश एक-दूसरे के हितों के अनुरूप बेहतर आर्थिक और रणनीतिक समझदारी की ओर आगे बढ़ेंगे.
ऐप पर पढें
होम आप का शहर
News Snap News Reel