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मेक नहीं, लूट इन इंडिया

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अमेरिका यात्रा से ठीक पहले महत्वाकांक्षी ‘मेक इन इंडिया’ अभियान का शुभारंभ किया. प्रधानमंत्री की मंशा यह है कि दुनिया के बड़े-बड़े उद्योग भारत में अपनी उत्पादन इकाइयां लगायें और भारत आनेवाले दौर में औद्योगिक उत्पादन का केंद्र बने और देश की अर्थव्यवस्था सुधर सके. लेकिन क्या ऐसा हो पायेगा?
क्या भारतीय अर्थव्यवस्था विदेशी पूंजी निवेश के आने से सुधर सकती है? अगर हम आज की स्थिति देखें तो आज देश में छोटी-बड़ी पांच हजार से अधिक विदेशी कंपनियां व्यापार कर रही हैं, जो हमें तकनीक और पूंजी देने आयीं हैं. लेकिन इनमें से अधिकतर कंपनियां तकनीक के नाम पर क्रीम, पाउडर, अचार, पानी की बोतलें, सॉफ्ट ड्रिंक्स, बिस्किट, साबुन आदि बेच कर हमें लूट रही हैं. और जहां तक अर्थव्यवस्था की बात है तो अभी तक तो इन विदेशी कंपनियों के आने से तो कोई सुधार नजर नहीं आया है.
दिनोंदिन रु पये का भाव गिर रहा है. अगर हम पीछे मुड़ कर देखें तो आज से चार सौ साल पहले जब भारतीय राजाओं ने प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को अनुमति दी थी, तब हमें नतीजे में दो सौ वर्ष की गुलामी नसीब हुई थी. तब ईस्ट इंडिया कंपनी भी हमें तकनीक देने और व्यापार करने ही आयी थी, लेकिन हमें गुलाम बना लिया. और अब प्रधानमंत्री जी विदेशी उद्योगपतियों को ढोल बजा कर कह रहे हैं कि आप तकनीक लेकर आओ और हमारा विकास करो. अब इससे कितना विकास होगा, यह तो वक्त ही बतायेगा. लेकिन सवाल यह उठता है कि हम इन विदेशी कंपनियों को बुलाने के बजाय, अपनी भारतीय कंपनियों को मजबूत करने के बारे में क्यों नहीं सोचते? स्वदेशी तकनीक का विकास कर भारत को आत्मनिर्भर बनाने की कोशिश नहीं होनी चाहिए?
विवेकानंद विमल, पाथरोल, मधुपुर
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