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Home Opinion ‘मैरी कॉम’ पर रोक से उठते सवाल

‘मैरी कॉम’ पर रोक से उठते सवाल

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‘मैरी कॉम’ पर रोक से उठते सवाल

स्त्रियों के प्रति समाज की रूढ़िवादी सोच से संघर्ष कर मुक्केबाजी के शिखर पर पहुंची मैरी कॉम की संघर्षगाथा पर बनी फिल्म ‘मैरी कॉम’ के बहाने मणिपुर में हिंदी सिनेमा पर लगे प्रतिबंध पर एक सार्थक बहस हो सकती है.

अगले महीने प्रदर्शित होनेवाली फिल्म ‘मैरी कॉम’ क्या मणिपुर में रिलीज होगी, यह इन दिनों लाख टके का सवाल है. मणिपुर में जन्मी मशूहर भारतीय महिला मुक्केबाज मैरी कॉम, जिनकी जिंदगी पर यह फिल्म आधारित है, क्या अपनी जन्मभूमि पर यह फिल्म देख पायेंगी? यह सवाल तकलीफभरा हो सकता है, पर वास्तविकता यही है कि पूर्वोत्तर के मणिपुर में वर्ष 2000 से हिंदी फिल्मों और हिंदी टीवी चैनलों पर रोक लगी हुई है. ‘रिवोल्यूशनरी पीपुल्स फ्रंट’ नामक बागी ग्रुप ने राज्य में हिंदी भाषा पर प्रतिबंध लगाने के लिए यह संकीर्ण कदम उठाया और 14 साल से यह रोक जारी है.

फिल्म ‘मैरी कॉम’ के संदर्भ में मणिपुर में प्रतिबंध की नैतिकता एवं समझदारी पर नये सिरे से बहस छिड़ गयी है. इस संदर्भ में वरिष्ठ फिल्म निर्देशक महेश भट्ट का यह बयान कि जब हिंदी फिल्में पाकिस्तान में दिखायी जा सकती हैं तो मणिपुर में क्यों नहीं, गौरतलब है. इससे बहस को एक आयाम मिल सकता है. भट्ट की राय है कि उग्रवादियों को अपनी मांगों पर सरकार से तकरार के बीच सिविल सोसाइटी को परेशान नहीं करना चाहिए. फिल्म इंडस्ट्री सिविल सोसाइटी का रूप है. उग्रवादियों को हिंदी फिल्मों पर प्रतिबंध लगाने की बजाय अपने सरोकार साझा करने चाहिए. उनकी यह समझ अत्यंत घातक है हिंदी फिल्मों की पहचान भारतीय सरकार की तरह है. भट्ट सवाल भी खड़ा करते हैं कि फिल्म इंडस्ट्री ने प्रतिबंध को हटाने के लिए 14 वर्षो में कोई पहल क्यों नहीं की.

रिवोल्यूशनरी पीपुल्स फ्रंट से संबद्ध अलगाववादियों की राय में हिंदी फिल्म और संगीत मणिपुरी सामाजिक मूल्यों के खिलाफ हैं. 2002 में अलगाववादी आंदोलन ने जोर पकड़ा और मणिपुर में मणिपुरी फिल्म निर्माण का धंधा भी फलने-फूलने लगा. आज मणिपुर में एक साल में 80 से 100 फिल्में बनती हैं. ‘फ्रीडम फ्रॉम इंडिया’ के लेखक व मणिपुरी विद्वान मेलम निंगथूहजा का मानना है कि मणिपुर में हिंदी फिल्मों और हिंदी गानों को सुनने पर प्रतिबंध वाले कदम ने क्षेत्रीय संस्कृति के प्रति अधिक चेतना लाने में अपनी अहम भूमिका निभायी है. हुनरमंद अदाकार, कोरियोग्राफर, गीतकार, पटकथा लेखक, संगीतकार आदि को अपना हुनर दिखाने का मौका प्रतिबंध के बाद ही मिला है. मणिपुरी अभिनेत्री बाला हिजेम 30 से ज्यादा फिल्मों में काम कर चुकी हैं. फिल्म ‘चक दे इंडिया’ में भी मणिपुर की एक अभिनेत्री को लिया गया था.

मैरी कॉम फिल्म में लीड रोल के लिए मणिपुरी अदाकारा लिन लाश्रेम का ऑडीशन लिया गया था, पर फिल्म के बिजनेस एवं दुनियाभर में पहुंच वाले पहलू के मद्देनजर वह रोल प्रियंका चोपड़ा को दिया गया और लिन को उसकी दोस्त का रोल दे दिया गया. प्रियंका को मैरी कॉम का रोल देने पर भी इन दिनों काफी विवाद छिड़ गया है. बहरहाल, मैरी कॉम ने खेल के प्रति अपने जज्बे से जाहिर कर दिया है कि एक लड़की होने के बावजूद आप खेल में ऊंचाइयों को छू सकती हैं. बकौल मैरी कॉम, उन्होंने अपने दो बच्चे होने के बाद भी घर में बैठने के बजाय खेल में आगे बढ़ने की सोची. उनकी मेहनत व परिवार का सहयोग रंग लाया.

महिला खिलाड़ियों की राह में आज भी सामाजिक पूर्वाग्रह एक बहुत बड़ी अड़चन है. कई साल पहले मध्य प्रदेश के एक कस्बे में खेल के मैदान में बास्केट बॉल खेल रही कुछ छात्रओं को जीप ने कुचल दिया था. यह एक हादसा नहीं था, बल्कि इरादतन किया गया था, क्योंकि कुछ लोगों को लड़कियों के बास्केट बॉल खेलने पर आपत्ति थी.

स्त्रियों के प्रति समाज की रूढ़िवादी सोच से संघर्ष कर मुक्केबाजी के शिखर पर पहुंची मैरी कॉम की संघर्षगाथा पर बनी इस फिल्म के बहाने मणिपुर में हिंदी सिनेमा पर प्रतिबंध पर एक सार्थक बहस हो सकती है और सिनेमाई विधा सुदूर इलाकों की संस्कृतियों को करीब लाने में ईमानदारी से अहम भूमिका निभा सकती है. महेश भट्ट ने इस संदर्भ में फिल्म इंडस्ट्री पर जो सवाल उठाये हैं, उस पर गंभीरता से मंथन होना चाहिए. बॉलीवुड सिनेमा मुख्यधारा का सिनेमा माना जाता है और एक सौ साल पुराने इस फिल्म जगत को अपने दायित्वों को समझना चाहिए.

मैरी कॉम ने मणिपुर सरकार से इस फिल्म को राज्य में रिलीज कराने की अपील की है. लेकिन, अलगाववादी संगठनों ने इस पर अपना पूर्ववर्ती रुख वाला संदेश बाहर पहुंचा दिया है. इस तरह यह फिल्म भारत सरकार और अलगाववादी संगठनों के बीच राजनीतिक टकराव और सांस्कृतिक पहचान के संकीर्ण सरोकार की शिकार हो गयी है. मैरी कॉम ने लगातार पांच बार वर्ल्ड वीमेन बॉक्सिंग चैंपियन का खिताब जीता और 2012 लंदन ओलिंपिक में पहला कांस्य पदक जीत कर देश का व अपना नाम इतिहास में दर्ज कराया. आजकल वे 2016 ओलिंपिक की तैयारियों पर ध्यान केंद्रित कर रही हैं. लेकिन, फिल्म पर प्रतिबंध वाला विवाद कहीं न कहीं उन्हें ‘इंटरप्ट’ करता ही होगा.

अलका आर्य

महिला मामालों की जानकार

alkaarya2001@gmail.com

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