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कैसे बचेगी श्वेत संस्कृति!

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कैसे बचेगी श्वेत संस्कृति!

।। डॉ भरत झुनझुनवाला ।।

अर्थशास्त्री

वीजा फीस में वृद्धि से अमेरिका में श्वेत संस्कृति बचेगी, इसमें संदेह है. मान लिया जाये कि दूसरों का अब प्रवेश कम होगा, परंतु पहले प्रवेश कर चुके लोग अधिक संख्या में संतानोत्पत्ति कर रहे हैं. इससे श्वेतों की संख्या तो घटेगी ही..

अमेरिकी विदेश सचिव जॉन केरी की हाल की यात्र में भारत ने एच1बी वीजा की फीस में की गयी बड़ी वृद्घि का मामला उठाया था. इन वीजा पर लगभग 1.5 लाख की अतिरिक्त फीस आरोपित की गयी है. अमेरिका की दक्षिणी सरहद पर मेक्सिको के रास्ते तमाम हिस्पैनिक लोगों का बड़ी संख्या में गैरकानूनी प्रवेश हो रहा था.

इसे रोकने के लिए सरहद पर कांटेदार तार लगाने तथा पुलिस बल में वृद्घि के लिए धन जुटाने के लिए यह फीस बढ़ायी गयी है. दक्षिण से हिस्पैनिक एवं पूरब से भारतीयों के प्रवेश को रोकने का एक साथ प्रयास किया गया है. उद्देश्य है कि अमेरिकी संस्कृति की रक्षा की जाये.

‘अमेरिकी’ लोग अधिक संख्या में यूरोपीय मूल के श्वेत हैं. हिस्पैनिक तथा एशियाइ मूल के लोगों के कारण वह संस्कृति ढक न जाये इसलिए इनके प्रवेश को कठिन बनाया जा गया है़ लेकिन अमेरिका में श्वेत लोगों की जनसंख्या तेजी से घट रही है़ यह उनकी उसी भोग प्रधान संस्कृति की देन है, जिसकी वे रक्षा करना चाह रहे हैं. इस भोगवादी संस्कृति के चलते श्वेत महिलाएं संतानोत्पत्ति से बचना चाह रही हैं. फोर्ब्स पत्रिका में स्पेन की स्थिति का वर्णन इस प्रकार है: ‘दक्षिण यूरोप की समस्या जनसंख्या में गिरावट के कारण है.

1960 में महिलाओं द्वारा औसतन चार संतानें पैदा की जा रही थीं. अस्सी के दशक में परिवार का महत्व क्षीण हो गया. युवा स्त्री पुरुषों का ध्यान कैरियर और धन कमाने पर केंद्रित हो गया. वे बच्चों को पैदा करने और पालने के झंझट में नहीं पड़ना चाहते थे. 1975 और वर्तमान के बीच विवाह की संख्या 270 हजार से घट कर 170 हजार रह गयी है, जबकि जनसंख्या में वृद्घि हुई है.’

इसके दो परिणाम हुए. एक यह कि लोगों की कर्मशीलता में गिरावट आयी और वे बेरोजगारी भत्ते पर निर्भर हो गये. इनके सामने भारतीय प्रवासी कर्मशील रहे और चमके. दूसरा, श्वेतों की संख्या में गिरावट आयी. अमेरिकी सरकार के आंकड़ों के मुताबिक, 2013 में 5 वर्ष से कम आयु के बच्चों में श्वेतों की संख्या 50 प्रतिशत से कम हो गयी है.

भारतीय मूल के लोग विशेषकर चमक रहे हैं. सत्या नडेला को माइक्रोसॉफ्ट कंपनी का मुख्याधिकारी नियुक्त किया गया है. नीना दवलूरी ने मिस अमेरिका का खिताब जीता था. बॉबी जिंदल और निक्की हैली ने राजनीति में अपनी पैठ बनायी है. बॉबी जिंदल का नाम अमेरिकी राष्ट्रपति की दौड़ में भी आ रहा है. भारतीयों की इस सफलता का मुख्य कारण पलायन के दौरान होनेवाला चयन है.

कर्मशील पलायन करते हैं. इतिहास साक्षी है कि मूल निवासी की तुलना में प्रवासी ज्यादा कर्मशील होते हैं. सत्या नडेला इसका उदाहरण हैं. यही कारण है कि अमेरिका में भारतीयों की औसत आय 88,000 डॉलर प्रति वर्ष है, जबकि अमेरिकियों की औसत आय 49,000 डॉलर से लगभग दोगुना है. यह बात अमेरिका में दूसरे देशों से आनेवाले प्रवासियों पर भी लागू होती है.

लेकिन संकेत मिलते हैं कि प्रवासियों की यह सफलता अल्पकालिक होती है. अमेरिकी यूनिवर्सिटी में प्रवेश को स्कोलास्टिक एप्टीट्यूड टेस्ट (सैट) परीक्षा होती है. एक अध्ययन के मुताबिक, एशियाइ बच्चों के सैट के अंक श्वेतों से 63 अंक अधिक थे. परंतु एशियाइ लोगों की तीसरी पीढ़ी के अंक श्वेतों के समान थे. इससे दिखता है कि प्रथम पीढ़ी की कर्मशीलता समय-क्रम में घटती जाती है.

उन पर मेजबान देश की संस्कृति हावी हो जाती है. भारतीयों की वर्तमान में सफलता इस कारण दिखती है कि भारत से प्रथम पीढ़ी के आगंतुकों की संख्या अधिक है. उनकी सफलता का दूसरा आयाम हमारी संस्कृति है. भारतीय संस्कृति में धर्म की प्रधानता है. सिद्धांत धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष. इसका परिणाम है कि कठिन परिस्थितियों के बीच भारतीय लोग कर्म में लगे रहते हैं.

अपनी संस्कृति की इस सफलता के कारण हमें अहंकार नहीं करना चाहिए. चूंकि हमारी यह विशेषता दो-तीन पीढ़ियों में अधोमुखी होती दिखाई दे रही है. यानी हमारे प्रवासी अपनी सांस्कृतिक खूंटी को बचा नहीं पा रहे हैं.

हमारे सामने चुनौती है कि अपनी संस्कृति को पकड़े रहते हुए पलायन करें और उसको विश्व में फैलाएं. अपनी संस्कृति से मिली कर्मशीलता को पश्चिमी भोगवाद में स्वाहा नहीं करना चाहिए.

बहरहाल, वीजा फीस में वृद्धि से अमेरिका में श्वेत संस्कृति बचेगी, इसमें संदेह है. मान लिया जाये कि दूसरे लोगों के प्रवेश को रोकने में अमेरिका सफल होगा. परंतु पहले प्रवेश कर चुके लोग अधिक संख्या में संतानोत्पत्ति कर रहे हैं.

इससे श्वेतों की संख्या घटेगी ही. इसके अतिरिक्त एच1बी वीजा पर आ रहे सक्षम इंजीनियर आदि अमेरिकी अर्थव्यवस्था में भारी योगदान दे रहे हैं. इनके लगातार प्रवेश से अमेरिका को ग्लूकोज मिल रहा है, जिसके बंद होने पर अमेरिका की तकनीकी उत्कृष्टता एवं आर्थिक समृद्घता दोनों ही संकट में आयेगी. आर्थिक दृष्टि से कमजोर पड़ने पर उस संस्कृति का जज्बा स्वयं ही खत्म हो जायेगा.

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