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Home Opinion जयंती पर विशेष : वीर बुधू भगत के प्रति चेतना

जयंती पर विशेष : वीर बुधू भगत के प्रति चेतना

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जयंती पर विशेष : वीर बुधू भगत के प्रति चेतना

महादेव टोप्पो

टिप्पणीकार

mahadevtoppo@gmail.com

कुछ महीने पहले अरगोड़ा चौक, रांची में एक दुर्घटना से आदिवासी समाज आक्रोशित हो उठा था. घटना यह थी कि वीर बुधू भगत की स्मृति में जो पत्थर चौराहे के करीब लगाया गया था, उसे किसी ने गिरा दिया था. बात फैलते ही लोग तुरंत सक्रिय हुए और पत्थर को पुनः सम्मानपूर्वक स्थापित कर दिया गया. ऐसी तत्परता इसलिए हुई, क्योंकि पिछले चार-पांच सालों से वीर बुधू भगत का नाम आदिवासी समाज में बार-बार उभर रहा है और लोग उनके सम्मान और स्मृति में अनेक संस्थाएं बना चुकी हैं. यह प्रयास अब भी जारी है.

कुछ युवाओं को लग रहा था कि उस वीर को वह सम्मान नहीं मिला है, जो मिलना चाहिए. लोकगीतों में बुधू भगत की भरपूर चर्चा है. मांडर, चान्हो, कुड़ू के आसपास के युवा अपने बुजुर्गों से उनकी वीरता की कहानी सुनते रहे थे, गौरवान्वित होते रहे थे, लेकिन उनके बारे में अधिक कुछ लिखित इतिहास में नहीं है. शायद यही कारण है कि उनकी भूमिका के बारे दिल्ली से रांची तक शोध हो रहा है. उनकी संघर्ष-गाथा बताने के लिए ‘करम राज-9’ ने एक नागपुरी वीडियो- ‘राईज लगिन’ बनाया है. इस गीत के रचनाकार विश्वनाथ उरांव हैं.

इसमें वीर बुधू भगत को स्मरण करते हुए उनके संघर्ष का बखान किया गया है और संबंधित स्थलों- टिको मैदान, सिलागामी गांव के टोंगरी, कोयल नदी आदि को दर्शाया गया है. इसके अलावा अंग्रेजों से बुधू भगत के संघर्ष और ऐतिहासिक घटनाओं को चित्र द्वारा भी दिखाया गया है. इन चित्रों को लोधेर उरांव ने बनाया है.

घटनास्थलों पर शूटिंग भी की गयी है. इससे दर्शक उन जगहों से संबंधित घटनाओं के बारे जानकारी भी प्राप्त करते हैं. गीत में बुधू भगत के संघर्ष को बताते हुए आदिवासियों के वर्तमान सामाजिक, सांस्कृतिक और भाषिक अस्तित्व पर चिंता व्यक्त करते हुए आह्वान किया गया है कि वे इसके संरक्षण व संवर्धन के लिए चेतें, नहीं तो भविष्य में स्थिति और भयावह व संकटपूर्ण हो सकती हैं. गीत के चित्रण को कुछ और कलात्मक ऊंचाई दी जा सकती थी, पर अधिक दर्शकों तक पहुंचने के लिए पॉपुलर फॉरमेट को अपनाया गया है.

बुधू भगत का परिवार भारत के उन विरल स्वतंत्रता संग्रामियों में है, जहां पूरे परिवार ने स्वतंत्रता संघर्ष के लिए आहुति दी है. उनके दोनों बेटे- हलधर एवं गिरिधर भी युद्ध में शहीद हुए थे.

बताया जाता है कि स्थानीय संग्रामियों में दहशत पैदा करने के लिए उनके बेटों का सिर काट कर थाली में सजाकर अंग्रेज कप्तान को भेंट किया गया था. बुधू भगत को पकड़ने के लिए पटना, बनारस, बैरकपुर आदि से पैदल सैनिकों के अलावा तोप तथा घुड़सवार सैनिक बुलाये गये थे तथा 1830-31 के समय में उन्हें पकड़नेवाले को एक हजार रुपये के इनाम की घोषणा हुई थी, जो तब बहुत बड़ी इनामी राशि थी. झारखंड के इतिहास में बुधू भगत का संघर्ष अपनी सामाजिक एकजुटता के कारण प्रभावी था. ऐसा लगता है, तब उरांव आदिवासी समाज की धुमकुड़िया व पड़हा की परंपरा के कारण उनका सामाजिक संगठन बेहद मजबूत था.

यही कारण है कि उनकी रक्षा में तीन सौ से अधिक रक्षक मौजूद रहते थे. साथ ही, उनकी ग्रामीण सूचना प्रणाली अंग्रेजों की समझ से बाहर थी. कुड़ू, पिठोरिया के अलावा यह संग्राम सिंहभूम में भी ‘हो’, तमाड़ में ‘मुंडा’ और उनके सहयोगियों द्वारा लड़ा गया, जो ‘महान कोल विद्रोह’ के नाम से प्रसिद्ध है. यह इतना प्रभावी हुआ कि अंग्रेजों को विलंकिंसन रूल लागू करके आदिवासियों की पारंपरिक शासन-व्यवस्था को महत्व व मान्यता देने के लिए विवश होना पड़ा. बाद में यह एसपी एक्ट और सीएनटी एक्ट के लिए प्रेरक तत्व भी बना.

वीर बुधू भगत पर बनाया गया वीडियो गीत ‘राईज लगिन’ उन जैसे स्वाभिमानी योद्धा की एक झलक भर है. भविष्य में अन्य स्वतंत्रता सेनानियों के योगदान पर भी और फिल्में बनेंगी या उनके बारे किताबें लिखी जायेंगी.

दरअसल, उस समय के स्वतंत्रता सेनानी मात्र जल, जंगल, जमीन की रक्षा के लिए ही नहीं, बल्कि अपने जमीर, जीवन, जुबान, जज्बात और जड़ों की रक्षा के लिए भी संघर्ष कर रहे थे. आशा है, भविष्य में लोग इसे और गहराई से समझेंगे, तब तक वीडियो के गीत की इन पंक्तियों को दुहराएं –

राईज लगिन देलंय अपन जान, जान रे, वीर बुधू भगत महान

माटी लगिन देलंय अपन जान, जान रे, वीर बुधू भगत महान।

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