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स्मार्ट सिटी योजना में सुधार हो

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दुनू राॅय
निदेशक, हजार्ड सेंटर, दिल्ली

स्मार्ट सिटी परियोजना को समझने के लिए इसकी पृष्ठभूमि की जानकारी होना बहुत जरूरी है. यह परियोजना पूर्ववर्ती जवाहरलाल नेहरू नेशनल अर्बन रिन्यूअल मिशन पर आधारित है. उस मिशन में कहा गया था कि हर शहर को आधुनिक बनाया जायेगा तथा उन्हें नियोजित किया जायेगा.
इसमें कई शहरों को चुना गया था, लेकिन अवधि पूरा होने के बाद जब मूल्यांकन किया गया, तो कुछ रिपोर्टों में कहा गया कि अच्छी प्रगति हुई है, पर सीएजी की रिपोर्ट में कई कमियों को रेखांकित किया गया. इस रिपोर्ट के अनुसार, मिशन के लिए आवंटित धन को पूरी तरह से खर्च नहीं किया गया और जो खर्च हुआ, उससे अपेक्षित परिणाम नहीं आया.
सीएजी रिपोर्ट से यह खुलासा होता है कि यह योजना सफल नहीं रही है. कोई भी ऐसा शहर नहीं है, जहां मिशन का काम ठीक से हुआ है. मिशन का एक काम था शहरी इंफ्रास्ट्रक्चर को विकसित करना और दूसरा काम गरीबों व कम आमदनी के लोगों के लिए बुनियादी सुविधाओं को सुनिश्चित करना.
पर ये दोनों लक्ष्य पूरे नहीं हो सके. लेकिन उसमें जो मूल धारणा थी कि चूंकि सरकार के पास शहरों के नवीनीकरण के लिए पर्याप्त धन नहीं है, तो व्यवस्था यह बनायी गयी कि योजना का आधा धन सरकार मुहैया करायेगी और आधा हिस्सा निजी क्षेत्र से जुटाया जायेगा. निजी क्षेत्र को ही सरकारी आवंटन को खर्च करने की जिम्मेदारी भी दी गयी और व्यवस्था सुधारने की कोशिश हुई.
सरकारी व निजी क्षेत्र की सहभागिता का नतीजा यह है कि सरकार का पूरा पैसा तो परियोजना में डाल दिया गया, बल्कि सरकार ने तय आवंटन से अधिक राशि ही मुहैया कराया, लेकिन जो निजी क्षेत्र से धन आनेवाला था, उसका छठा हिस्सा भी निवेशित नहीं हो सका.
इसका मतलब यह है कि नवीनीकरण के प्रयास में निजी क्षेत्र से अपेक्षित निवेश का लक्ष्य पूरा नहीं हुआ. स्मार्ट सिटी परियोजना उसी प्रक्रिया को आगे ले जाने की कोशिश है, जिसमें बुनियादी संरचना को बनाने की बात थी और बुनियादी सुविधाओं को उपलब्ध कराने का इरादा था.
इससे एक कदम आगे बढ़कर अब सरकार कह रही है कि पूरे शहर के विकास में निजी क्षेत्र की व्यापक भागीदारी होगी और जो राशि इस मद के लिए आयेगी, उसे एक कोष में रखा जायेगी. इस कोष को निजी क्षेत्र द्वारा इस्तेमाल किया जायेगा और शहर से जो राजस्व जमा होगा, वह भी जिम्मेदार कंपनियों के हाथ में जायेगी.
इसका मतलब यह है कि जो पहले नगरपालिका व नगर निगम का काम था, वह अब निजी क्षेत्र के जिम्मे होगा. यह स्मार्ट सिटी की अवधारणा है, जिसके लगभग पांच साल पूरे हो चुके हैं. इन पांच सालों सौ स्मार्ट सिटी बनाने का लक्ष्य था, पर अभी तक सभी सौ शहरों के लिए योजना भी नहीं बनायी जा सकी है.
कुल मिलाकर तीस ऐसे शहर हैं, जिनकी योजनाएं बनी हैं और उन पर सरकार की मुहर भी लग चुकी है. अब नीति आयोग द्वारा जारी सूचकांक में बीस शहरों के सबसे अच्छे प्रदर्शन की बात कही जा रही है. लेकिन ऐसा इसलिए नहीं कि ये शहर स्मार्ट बन गये हैं, बल्कि इसलिए कि उसमें योजना बन गयी है और उसे सरकार से स्वीकृत कर लिया है.
इस योजना के भी दो हिस्से हैं. पहले हिस्से में शहर के उन इलाकों, जो कहीं भी दस फीसदी से अधिक नहीं हैं और पहले से ही सुविधासंपन्न हैं, को पूर्ण रूप से विकसित करने का इरादा तय किया गया है.
ऐसे इलाकों को जान-बूझकर चुना जा रहा है. इनके लिए बजट का भी अधिक आवंटन किया गया है. बाकी शहर के लिए विकसित करने का लक्ष्य नहीं है, बल्कि उस छोटे हिस्से से जोड़ने और आने-जाने की सुविधा बेहतर करने पर जोर है यानी यातायात, परिवहन, सड़क, फ्लाइओवर आदि बनाने का इरादा है.
इसी परिकल्पना के आधार पर स्मार्ट सिटी परियोजना चल रही है और कहीं भी कोई ढंग का काम शुरू नहीं हुआ है. अब चूंकि इस परियोजना की सफलताओं को दिखाना भी है, तो सरकार की ओर से उन शहरों की सूची जारी की जा रही है, जो अनेक तरह से पहले से ही बेहतर हैं और जहां विकास कार्य हुए हैं.
उन्हीं के आधार पर इस परियोजना को कारगर बताने की कवायद हो रही है. जिन शहरों के अच्छे प्रदर्शनों की बात हो रही है, उनके भवनों व सड़कों को तो दिखाया जा रहा है, लेकिन वहां उपलब्ध पानी, बिजली और जल-निकासी की व्यवस्था के बारे में नहीं बताया जा रहा है.
एक तरह से यह साबित करने की कोशिश हो रही है कि यदि निजी क्षेत्र में शहरों को सौंप दिया जाये, तो शहरों में चमक आ जायेगी. अब जो अच्छे प्रदर्शन करनेवाले शहरों से खराब प्रदर्शन करनेवाले शहरों को जोड़ने की बात है, तो इसमें यही होगा कि जिन कंपनियों ने अच्छे शहरों की योजनाएं बनायी हैं, उनसे अन्य शहरों के लिए तैयारी करने में मदद मिल जायेगी.
यह सब अभी योजनाओं का खेल है, जो कागजों पर है. जो पैसा निर्धारित किया गया है, उसका आधा निजी क्षेत्र से आयेगा और वह भी मौजूदा स्थिति में आना संभव नहीं दिख रहा है. अभी जरूरत है कि स्मार्ट सिटी की दृष्टि पर पुनर्विचार हो और जरूरी लगे, तो वैकल्पिक योजना लायी जाये या उसमें सुधार की कोशिश की जाये.
(यह लेखक का निजी विचार है.)
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