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बिजूका की याद

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क्षमा शर्मा
वरिष्ठ पत्रकार
kshamasharma1@gmail.com
पिछले दिनों शताब्दी एक्सप्रेस से चंडीगढ़ जाना हुआ था. खेत, खलिहान, हरियाली जैसे बिल्कुल आपके बाजू से गुजर रही थी. खेती-किसानी में क्या बदलाव हो रहा है, यह भी पता चल रहा था.
दूर-दूर तक गेहूं के हरे पौधों से भरे खेत, उनके बीच में कहीं सरसों के फूलों का गोल घेरा तो कहीं, वर्ग जैसे किसानों ने भी तय कर लिया कि वे अपने खेतों को भी बगीचे की तरह सजाकर रहेंगे. सरसों के पीले फूल जैसे जोर-जोर से घोषणा कर रहे थे कि वसंत आ गया. वसंत पंचमी अभी तो गुजरी है.
इनके बीच में घूमते सफेद बगुले. यह देखकर बहुत अच्छा लगा कि वर्षा जल को बचाने के लिए किसान प्रयास कर रहे हैं. कई खेतों में पोखरें और तालाब दिखायी दिये. इनके आसपास भी बगुले, मछलियों के इंतजार में डेरा जमाये थे. इन पोखरों- तालाबों से खेतों के लिए पानी की जरूरत तो पूरी होती ही है. किसान इनमें कमल ककड़ी, सिंघाड़े उगाकर और मछली पालकर एक पंथ दो काज करते हैं.
पानी का पानी और इन चीजों को बेचकर दोहरी आय भी. कई तालाबों में कमल के फूल भी नजर आये. यही नहीं लाल, पीले गेंदे के फूल भी हवा में इधर से उधर झूमते हुए पास आने का आमंत्रण दे रहे थे. भागती रेल के कारण जब वे पीछे छूट जाते तो नजर वैसा ही कुछ और ढूंढ़ने लगतीं.
यूकेलिप्टस के पेड़, आम के बगीचे, रेलवे स्टेशन पर लगी बेशरम बेल और भी तरह-तरह के पेड़-पौधे, खेतों की पगडंडियों पर दौड़ लगाती बकरियां, धीरे-धीरे चलते ट्रैक्टर भी थे. अब कहीं भी बैल और बैलगाड़ियां नजर नहीं आते. एक समय में बैल हमारी ग्रामीण अर्थव्यवस्था की कितनी बड़ी जरूरत थे कि देश की सबसे बड़ी पार्टी कांग्रेस का चुनाव चिह्न थे. गोधूलि का समय हो गया इसे बैल, गायों और भैंसों की गले में पड़ी घंटियों की आवाजों से समझा जा सकता था. जब ये पशु घर की ओर लौटते थे, तो इन घंटियों की आवाजें पता देती थीं कि शाम हो गयी.
भागती हुई रेल से एक चीज बार-बार नजर आ रही थी खेत में गड़े डंडे और उनसे लिपटे सफेद कपड़े. समझ में नहीं आ रहा था कि सफेद कपड़े से लटके ये डंडे क्यों लगाये गये हैं. साथ बैठे सरदार जी से पूछा उन्हें भी कुछ मालूम नहीं था.
तभी कुछ दूर बैठे सज्जन की बातें सुनायी पड़ीं. वह बातचीत में बार-बार गांव-गांव कह रहे थे. उनसे पूछा, वह बोले यह चिड़ियों को भगाने के लिए है.
यदि उनकी बात सही है तो यह वही बिजूका है, जिसे हम बचपन से खेतों के बीच लगा देखते आये हैं. इसे घास-फूस से मनुष्य के आकार का बनाया जाता था. हंडिया लगाकर इसका सिर बनाया जाता था. आदमी का यह पुतला पंछियों को भरमाने के लिए होता था, तो क्या अब लोग बिजूका बनाना भूल गये या पंछियों ने उस तरह पुतले से डरना छोड़ दिया. आनेवाली पीढ़ियां तो शायद यह भी भूल जायेंगी कि बिजूका कैसे बनता था, कहां लगाया जाता था.
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