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कर, छूट व बचत

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बजट में आयकर के लिए दो प्रणालियों के प्रस्ताव को लेकर व्यापक बहस जारी है. कर दरें कम होने, कराधान सरल होने तथा करदाताओं के हाथ ज्यादा नगदी बचने से उपभोग को बढ़ावा मिलने के आधार पर नयी व्यवस्था की सराहना हो रही है. परंतु किसी भी ऐसे निर्णय का प्रभाव सीमित नहीं होता है क्योंकि आर्थिक गतिविधियां एक-दूसरे से गहरे से जुड़ी होती हैं. आमदनी और खर्च के साथ बचत भी एक अहम पहलू है.

एक ओर बचत करने के इरादे से लोग निवेश करते हैं और पुरानी प्रणाली के तहत उन्हें करों में कुछ छूट भी हासिल हो जाती है. नयी व्यवस्था में ऐसी राहत नहीं है. अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए उपभोग को बढ़ावा देना बेहद जरूरी है और इसके लिए लोगों के पास नगदी होना चाहिए. परंतु आर्थिकी के कई क्षेत्र भी नकदी की कमी से जूझ रहे हैं, जिनमें रियल इस्टेट और बीमा सेक्टर भी शामिल हैं. अब सवाल यह उठता है कि छूट खत्म हो जाने से लोग घर खरीदने और बीमा कराने में पहले जैसी दिलचस्पी लेंगे या नहीं. इस संबंध में हमें बचत दर के आंकड़ों को देखना चाहिए. सकल घरेलू उत्पादन (जीडीपी) के अनुपात में निर्धारित यह दर देश में सरकार व निजी क्षेत्र के लिए निवेश हेतु उपलब्ध धन के बारे में इंगित करती है.

यदि अर्थव्यवस्था को लंबे समय तक उच्च वृद्धि दर हासिल करनी है, तो बचत दर जीडीपी का 36 से 40 फीसदी होना चाहिए. बीते छह सालों में यह दर लगातार गिरती जा रही है. साल 2012 में जब बढ़ोतरी का दौर उच्च स्तर पर था, तब बचत दर 36 फीसदी के आसपास थी. यह अभी 30 फीसदी है. नब्बे के दशक में यह आंकड़ा 23-24 फीसदी के आसपास था. पारिवारिक बचत दर का हिसाब तो और भी चिंताजनक है. साल 2012 में यह दर 23 फीसदी थी, जो 2018 में घटकर 17 फीसदी पर आ गयी. उल्लेखनीय है कि बचतकर्ताओं की चार श्रेणियों- सरकार, सार्वजनिक क्षेत्र, निजी क्षेत्र और परिवार- में केवल परिवार ही ऐसा है कि जो सही मायने में बचत करता है.

इस श्रेणी में आम परिवारों के साथ अनौपचारिक क्षेत्र के अपंजीकृत कारोबार भी गिने जाते हैं. आयकर की दरों में कटौती के पीछे मुख्य तर्क यह होता था कि इससे लोग अधिक बचत कर सकेंगे क्योंकि उनके पास नकदी बच रही है. ऐसे बचत से जुटायी गयी राशि लंबी अवधि की परियोजनाओं के लिए काम में लायी जा सकती थी. पर, कराधान की नयी प्रणाली ऐसी संभावनाओं पर पानी फेर सकती है. परिवारों के लिए आवास, बीमा या जमा केवल निवेश या बचत के माध्यम ही नहीं होते, इससे बुनियादी और बड़ी जरूरतें भी पूरी होती हैं तथा भविष्य के लिए भरोसा पैदा होता है. साथ ही, छूट से खर्च की कुछ गुंजाइश भी बन जाती है. ऐसे में बचत को लेकर ठोस पहलकदमी की जरूरत है क्योंकि अर्थव्यवस्था को आधार देने में इसका बहुत योगदान है.

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