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Home Opinion शहीद दिवस : राष्ट्रपिता महात्मा गांधी से दूर होती हमारी राजनीति

शहीद दिवस : राष्ट्रपिता महात्मा गांधी से दूर होती हमारी राजनीति

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शहीद दिवस : राष्ट्रपिता महात्मा गांधी से दूर होती हमारी राजनीति
शशिकांत झा
टिप्पणीकार
delhi@prabhatkhabar.in
गांधी के जीवन काल में ही राजनीति के क्षेत्र में वाणी का अवमूल्यन और सिद्धांतहीन शिखर राजनीति का खेल प्रारंभ हो चुका था. सत्य और अहिंसा जैसे पवित्र साधनों के जरिये शुभ लक्ष्यों की प्राप्ति का उदाहरण प्रस्तुत करनेवाले गांधी ने यह कभी नहीं सोचा होगा कि उनके नाम पर जनमत बटोरनेवाले नेता यह कहते फिरेंगे कि राजनीति में कुछ भी बुरा नहीं होता है.
राजनीति को इतना पतनोन्मुख कर लिया है कि अब लोग इसे भले आदमी का काम मानने से ही इनकार करने लगे हैं. गांधी के सपनों का भारत राजनीतिक स्वार्थ का शिकार हो गया. देश निर्धन और अशिक्षित बना रहा, लेकिन सांप्रदायिक दंगों के साथ जातीय दंगे भी देश के भाग्य-लेख बना दिये गये. देश जुड़ने के बदले भाषाई और धार्मिक आधारों पर टूटता रहा. अगड़ों, पिछड़ों, दलितों, हिंदुअों और मुसलमानों की भीड़ में गांधी का हिंदुस्तान खो गया. बिहार है, पंजाब है, पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु भी है, किंतु भारत की पहचान कम होती गयी.
सत्ता की लड़ाई में सभी तरह की नैतिकता को ताक पर रखकर सस्ते नारे उछाले जाने लगे और देश की गरीबी, अशिक्षा तथा पिछड़ेपन से लड़ी जानेवाली लड़ाई का रुख देश को कमजोर करनेवाली बातों की ओर मोड़ दिया गया. सत्ता ‘जन’ के हाथ से छीनकर कुछ व्यक्तियों या सरकार के हाथ में सौंप दी गयी. गांधी का सत्ता के विकेंद्रीकरण की कल्पना धूमिल हो गयी.
गांधी ने देश को ऐसा स्वराज देने का प्रयत्न किया, जहां छोटे से छोटा आदमी भी यह महसूस करे कि देश नीति, निर्माण और उनके क्रियान्वयन में उसकी भी भूमिका है. लेकिन, आज आम आदमी ऐसा नहीं महसूस कर पा रहा है कि जो सरकारें बनती हैं, वे उसकी या उसके द्वारा बनायी गयी हैं.
देश में स्वराज तो आया, लेकिन सही मायने में जनसत्ता कायम करने का प्रयास दलगत राजनीति के गोटीबाजों ने नहीं किया. जोड़-तोड़ और पैसे के बल पर की जानेवाली राजनीति दुखी जनता के आगे प्रजातंत्र और प्रगति का भ्रमजाल ही फैला सकी. ‘तंत्र’ प्रमुख रहा और ‘जन’ अपने भाग्य पर रोने के लिए पीछे छोड़ दिया गया.
गांधी का रास्ता त्याग और सहिष्णुता का रास्ता था, गांधी का सत्ता महान लक्ष्यों को नैतिक बल द्वारा प्राप्त करने का रात्ता था, गांधी का रास्ता कथनी और करनी को एकरूपता प्रदान करने का रास्ता था. गांधी का रास्ता अपने को किसी का प्रतिनिधि मात्र मानकर राज-काज देखनेवाले भरत के समान रामराज्य स्थापित करने का रास्ता था.
आज की राजनीति इन बातों के ठीक विपरीत चलनेवाली स्वार्थ और सत्तालोलुपता तथा कथनी और करनी में भेद करनेवाली राजनीति है. गांधी जो कहते थे, उसे जान पर खेलकर पूरा भी करते थे, लेकिन आज की चुनावी घोषणाएं, लेखन और भाषण की कला बनकर रह जाती हैं.
वादे केवल किये भर जाते हैं. सहिष्णुता का यह हाल है कि विरोधियों को रास्ते से हटाने के लिए भी हिंसक साधन से परहेज नहीं किया जाता है. राजनीति और नैतिकता का संबंध बस इतना ही है कि जन प्रतिनिधियों की सूची में हत्या और बलात्कार के अभियुक्तों, तस्करी और धोखाधड़ी के आरोपों में फंसे बदनाम लोगों के नाम भी आसानी से ढूंढ़े जा सकते हैं.
यदि आज गांधी जीवित होते, तो उनका अनशन कभी समाप्त होने का आश्वासन नहीं पाता. महिलाअों को जिंदा जलाये जाने से रोकने में असमर्थ राजनीति गांधी को कोई संतोष नहीं दे पाती. गांधी यह देखकर रो देते कि वोट पाने के लिए रचनात्मक कार्यक्रम का सहारा नहीं लेकर जातीयता, रिश्वत, शराब और दुष्प्रचार का सहारा लिया जा रहा है. वोट के लिए राष्ट्रभाषा का अपमान कर सांस्कृतिक दासता के प्रतीक अंग्रेजी की वकालत की जा रही है.
गांधी को गुलामी की पीड़ा से भी अधिक इस बात से पीड़ा होती कि बेकारी और अभावग्रस्तता से उत्पन्न जन-आक्रोश को अब भी ‘ताकत’ से ही दबाया जा रहा है. हम रोज उनके आदर्शों की हत्या कर रहे हैं.
भारतीय राजनीति के इस विकृत स्वरूप की चर्चा से यह नहीं समझना चाहिए कि यह गांधी या उनके सिद्धांतों की हार है. गांधी द्वारा दिखाये गये रास्ते से भटकने के कारण उत्पन्न दुखद स्थितियों से गांधी के प्रति हमारी आस्था और भी बढ़ जाती है. प्रत्येक अग्नि परीक्षा में सोने के समान चमक कर वक्त की कसौटी पर गांधी और खरे उतरते हैं.
यह विश्वास अटल हो जाता कि मानवता के लिए कोई आशा शेष नहीं रह जायेगी, लेकिन तब भी गांधी अबुझ दीप-शिखा की तरह हम सबको रोशनी देते रहेंगे. राजनीति को घूम-फिर कर गांधी के साथ ही आना होगा, नहीं तो खून के छींटों से विश्व मानव का चेहरा ही नहीं पहचाना जा सकेगा. दुनिया को गांधी की यह बात माननी ही होगी कि धरती मनुष्य की जरूरतों को पूरा कर सकती है, लालच को नहीं.
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