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Home Opinion गुण-दोष हो कानून के विरोध का आधार

गुण-दोष हो कानून के विरोध का आधार

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शेषाद्रि चारी
पूर्व संपादक, ऑर्गेनाइजर
delhi@prabhatkhabar.in
देश में कोई भी सरकार संविधान की शपथ लेकर सत्ता पर काबिज होती है और उसी के अनुरूप काम करती है. ऐसे में सरकार संविधान की मर्यादाओं का पालन करते हुए काम करने की कोशिश करती है.
सरकार द्वारा लाये गये किसी कानून या नीति का गुण-दोष के आधार पर विरोध किया जा सकता है. सरकार कोई कानून या नीति संविधान के खिलाफ नहीं बना सकती है. सिर्फ विरोध के नाम पर किसी कानून को संविधान विरोधी कहना सही नहीं हो सकता है. पहले की सरकाराें में ऐसे कानून बने हैं, जिसका विरोध हुआ, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि संविधान खतरे में आ गया. इस देश का संविधान और लोकतंत्र आम लोगों से चलता है और कोई भी सरकार अपने लोगों के खिलाफ जाने की हिम्मत नहीं कर सकती है. पूर्व में ऐसा करनेवाली सरकारों को लोगों ने सबक सिखाया है. ऐसे में सरकार पर संविधान को खतरे में डालने का आरोप राजनीति से प्रेरित है.
मुद्दों के आधार पर विरोध करना लोकतंत्र में जरूरी है, लेकिन बिना तर्क और तथ्यों के विरोध को जायज नहीं ठहराया जा सकता है. ऐसा ही नागरिकता संशोधन कानून के मामले में दिख रहा है.
केंद्र सरकार ने हाल ही में नागरिकता संशोधन विधेयक संसद से पारित किया और राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद वह कानून बन चुका है. संसद के दोनों सदनों में लंबी बहस के बाद तमाम प्रक्रियाओं का पालन करने के बाद ही इस कानून को लागू किया गया है. संसद से कानून बनने के बाद कुछ विपक्षी दल और संगठन इस कानून को असंवैधानिक बता कर सड़कों पर प्रदर्शन कर रहे हैं. अगर किसी को यह लगता है कि कानून संविधानसम्मत नहीं है, तो वह सुप्रीम कोर्ट में इसके खिलाफ याचिका डाल सकता है. संविधान के तहत लोगों को यह अधिकार प्राप्त है. पहले भी अनेक कानूनों को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी जाती रही है.
जब शाहबानो मामले में सुप्रीम कोर्ट ने मुस्लिम महिला के पक्ष में फैसला सुनाया, तब भी कुछ संगठनों ने सड़कों पर उतर कर विरोध जताया कि यह धर्म के खिलाफ है. ऐसे लोगों के दबाव में आकर सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले को संसद से अमान्य बना दिया.
सरकार के इस फैसले के खिलाफ भी प्रदर्शन हुआ और सुप्रीम कोर्ट में याचिका भी दाखिल की गयी. लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि संसद को ऐसा करने का अधिकार है और पूरा मामला खत्म हो गया. ऐसे में संसद से बने कानून को लेकर किसी को आपत्ति है, तो उसे सड़कों पर अराजकता फैलाने के बदले सुप्रीम कोर्ट में दाखिल याचिकाओं पर आनेवाले फैसले का इंतजार करना चाहिए. अराजकता फैलाना भी संविधान विरोधी काम है.
नागरिकता संशोधन कानून संविधान और देश के धर्मनिरपेक्ष मूल्यों के खिलाफ है, यह कहना बिल्कुल सही नहीं है. इस कानून से देश के नागरिकों के किसी अधिकारों का हनन नहीं होता है और किसी की नागरिकता पर कोई खतरा नहीं है. इस कानून के जरिये सिर्फ पाकिस्तान, अफगानिस्तान, बांग्लादेश में धार्मिक उत्पीड़न के शिकार अल्पसंख्यकों को नागरिकता देने का प्रावधान किया गया है.
इसमें हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, इसाई सभी शामिल है. इन देशों में बहुसंख्यक लोगों के साथ धार्मिक आधार पर उत्पीड़न नहीं हो सकता है. यह जगजाहिर बात है कि इन देशों में अल्पसंख्यकों का धार्मिक उत्पीड़न हो रहा है और अक्सर ऐसी खबरें सामने आती रहती हैं. ऐसे में हमारा दायित्व है कि ऐसे लोगों को भारत की नागरिकता दी जाये. देश बंटवारे के समय भी महात्मा गांधी ने ऐसा वचन दिया था.
कई गणमान्य लोगों ने भी ऐसी बात कही थी. ऐसे में अगर सरकार ऐसे लोगों को नागरिकता देने का काम कर रही है, तो इसे संविधान विरोधी नहीं कहा जा सकता है. यह हमारा नैतिक दायित्व है कि ऐसे लोगों को नागरिकता मिले. देश में ऐसे लाेग लंबे समय से शरणार्थी की जिंदगी गुजार रहे हैं. यही नहीं, भारत के मुसलमानों पर इस कानून का रत्ती भर भी असर नहीं पड़नेवाला है. कुछ दल भ्रम फैला कर एक खास समुदाय को बरगलाने का काम कर रहे हैं. ऐसा सिर्फ राजनीतिक फायदे के लिए किया जा रहा है. क्या यह गैर-संवैधानिक काम नहीं है कि लोगों को झूठ बोलकर भड़काया जाये?
सरकार कानून को लेकर लोगों के भ्रम को दूर करने में असफल रही है, यह कहना गलत है. सरकार ने कानून को लेकर अपना विचार संसद में विस्तार से रखा. सदन के बाहर भी कई माध्यमों से लोगों को नागरिकता संशोधन कानून की सही जानकारी देने का काम किया जा रहा है.
लेकिन सरकार देश के सभी नागरिकों को इससे जुड़े शंका का जवाब नहीं दे सकती है. यह काम मीडिया का है, वह कानून से जुड़ी शंकाओं को दूर करने का काम करे. अपनी बात को रखने के लिए संस्थाएं है.
सुप्रीम कोर्ट और संसद में अपनी बात रख सकते हैं. सिर्फ संविधान विरोधी आरोप लगाने से काम नहीं होनेवाला है. समस्या यह है कि लोग अधिकारों की बात तो करते हैं, लेकिन कर्तव्यों को लेकर मौन हो जाते हैं. अधिकार के साथ हमें अपने कर्तव्यों का भी जिम्मेदारी से पालन करना चाहिए. तभी हम संविधान की मूल आत्मा का सम्मान कर पायेंगे.
यह आरोप भी हास्यास्पद है कि सरकार संघ के एजेंडे को आगे बढ़ा रही है. संघ राष्ट्र निर्माण की बात करता है, देश तोड़ने की नहीं. सरकार कानूनी प्रक्रियाओं का पालन करते हुए कानून बनाने और फैसले लेने का काम करती है.
इसी पहलू पर सरकार के काम-काज का आकलन किया जाना चाहिए. जहां तक राष्ट्रवाद की बात है, तो यह मुद्दा कभी समाप्त नहीं हो सकता है. यह कहना कि सरकार गरीबी, महंगाई, आर्थिक मंदी से ध्यान हटाने के लिए राष्ट्रवाद का सहारा लेती है, बेतुकी बात है. क्या गरीब राष्ट्रवादी नहीं होता है? कुछ बुद्धिजीवी लोग ही ऐसे आरोप लगाते हैं. हमारा मानना है कि भारत को एक समृद्ध और बलशाली देश होना चाहिए, ताकि पूरे विश्व में देश का परचम लहरा सके. शक्तिशाली का मतलब सिर्फ आर्थिक और सामरिक तौर पर मजबूत होना नहीं, बल्कि हमारी जो मूलभूत ताकत है, सभ्यता और संस्कृति उसके जरिये पूरी दुनिया को शांति और एकता का संदेश देना है.
इस काम में भारत के सभी नागरिकतों की सहभागिता रहे, ऐसे गणतंत्र का संदेश देना हमारा मकसद होना चाहिए. संविधान पर खतरे की बात राजनीतिक फायदे के लिए उठायी जा रही है और जनमानस पर इसका कोई असर नहीं हो रहा है. हिंदुत्व के विचार की बात करना संविधान विरोधी बात नहीं है. यह हमारी जीवनशैली का हिस्सा है.
(ये लेखक के निजी विचार हैं)
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