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Home Opinion संविधान को जानेंगे, तभी तो मानेंगे

संविधान को जानेंगे, तभी तो मानेंगे

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सुभाष कश्यप
संविधान विशेषज्ञ
delhi@prabhatkhabar.in
यह बड़ी विडंबना वाली बात है कि भारत में संविधान को लेकर भयंकर निरक्षरता व्याप्त है. ज्यादातर लोग तो जानते ही नहीं हैं कि हमारा संविधान क्या कहता है, नागरिकों के अधिकार क्या हैं और बाकी अधिकार क्या-क्या हैं. संविधान में एक ऐसा भाग है, जो सभी नागरिकों के मूल कर्तव्यों के बारे में है.
हममें से ज्यादातर लोगों को तो पता ही नहीं है कि नागरिकों के मूल कर्तव्य क्या हैं. अगर सबसे पहला मूल कर्तव्य संविधान में है, तो वह कहता है कि देश के प्रत्येक नागरिक का यह मूल कर्तव्य होगा कि वह संविधान का अनुपालन करे और उसके द्वारा स्थापित संस्थाओं एवं आदर्शों का सम्मान करे. तो जब हम यह बात जानते ही नहीं हैं कि संविधान के आदर्श क्या हैं और संवैधानिक संस्थाएं कौन-कौन सी हैं, तो फिर हम उनका आदर कैसे करेंगे? इसलिए सबसे पहले आवश्यकता इस बात की है कि देशभर में एक ऐसा अभियान चलाया जाये, जिसमें संविधान की शिक्षा को प्राथमिकता दी जाये और लोगों को संविधान के प्रति जागरूक किया जाये कि सचमुच हमारा संविधान हमारे बारे में क्या कहता है.
मेरा शुरू से यह मानना रहा है कि हमारे देश की शिक्षा व्यवस्था में सभी कक्षाओं के पाठ्यक्रमों में (प्राथमिक विद्यालयों से लेकर कॉलेज-विश्वविद्यालयों तक) संविधान की शिक्षा को अनिवार्य विषय के रूप में शामिल कर दिया जाये. वर्तमान समय की यह सबसे बड़ी जरूरत है. सरकार को यह काम जरूर करना चाहिए.
हमारा संविधान अब देश की एकता, अखंडता और अस्मिता की पहचान बन गया है. क्योंकि आज जो असंवैधानिक काम करनेवाले लोग हैं, वे सब भी इसी संविधान की दुहाई देते हैं. देश के एक कोने से लेकर दूसरे कोने तक, सभी धर्मों और जातियों के लोग, सभी प्रांतों के लोग, अमीर और गरीब तक सभी संविधान की ही दुहाई देते हैं.
हालांकि, संविधान की दुहाई देने में सब अपने-अपने अलग-अलग मायने भी देखते हैं. और साथ ही संविधान के साथ रोज बेअदबी भी होती है. हमारी न्यायपालिका, कार्यपालिका और विधानपालिका, इन तीनों के अपने-अपने कार्यक्षत्र हैं और इन्हें अपने-अपने क्षेत्र में ही अपने मूल दायित्वों के साथ अपना काम ईमानदारी से करना चाहिए. इन तीनों को एक-दूसरे के कार्यक्षेत्र में दखल देने की कोई जरूरत ही नहीं है.
लेकिन, अक्सर देखने को मिलता है कि ये तीनों अपना-अपना काम उतनी ईमानदारी से नहीं करती हैं, जितनी कि संविधान के दायरे में इनसे काम की अपेक्षा रहती है.
कार्यपालिका एक तरफ न्यायपालिका पर दबाव बनाने का काम कर रही है, तो वहीं न्यायपालिका अदालतों में लंबित मामलों को निबटाने के बजाय कार्यपालिका के अधिकार क्षेत्र में हस्तक्षेप कर रही है. इसलिए कभी-कभी बड़ा अफसोस होता है कि संविधान की दुहाई देकर लोग किस तरह से असंवैधानिक कार्यों में संलिप्त हो जाते हैं. हमारे संविधान की विशिष्टता यही है और उपलब्धि भी कि जो लोग संविधान का उल्लंघन करते रहते हैं, वही संविधान की दुहाई भी देते रहते हैं.
संविधान के अनुच्छेद 11 में स्पष्ट लिखा है कि नागरिकता के बारे में कानून बनाने का अधिकार सिर्फ और सिर्फ देश की संसद को है. नागरिकता का कानून बनाने में राज्यों का कोई लेना-देना नहीं है. क्योंकि, हम सभी भारतवासी एक हैं और भारत की नागरिकता भी एक है. अमेरिका की तरह अलग-अलग राज्यों की नागरिकता भारत में नहीं है.
इसलिए भारत में राज्यों को नागरिकता के बारे में कानून बनाने का कोई अधिकार नहीं है और इसलिए संसद द्वारा बनाये गये नागरिकता कानून काे न लागू करने की बात भी राज्यों को नहीं करनी चाहिए. केंद्र के कानून को राज्य द्वारा न माना जाना या उस कानून की अवहेलना पूरी तरह से असंवैधानिक है.
देश की संसद जो भी कानून बनाये, वह पूरे देश में लागू होता है, इसलिए राज्य सरकारों के पास नहीं है कि वे उसे लागू करने से इनकार करें. यह इनकार संविधान का उल्लंघन होगा और नितांत असंवैधानिक होगा. संविधान की सातवीं अनुसूची, जो संघ (राज्यों का) की सूची है, में सत्रहवें नंबर पर नागरिकता है, जिसके अनुसार भी नागरिकता संघ के क्षेत्राधिकार में है. राज्य सूची में नागरिकता का कोई उल्लेख नहीं है.
संसद द्वारा बनाये गये किसी कानून को लेकर राज्यों की विधानसभाओं में लाये गये प्रस्तावों का जहां तक सवाल है, तो ऐसे प्रस्ताव अभिव्यक्ति मात्र हैं. विधानसभाएं अपनी अभिव्यक्ति को जाहिर कर सकती हैं, प्रस्ताव पास कर सकती हैं, लेकिन कानून नहीं बना सकतीं.
किसी कानून को असंवैधानिक मानने का अधिकार सिर्फ सुप्रीम कोर्ट को है, राज्यों को नहीं. इसके लिए राज्य सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटा सकते हैं.
जहां तक समानता का अधिकार वाले अनुच्छेद 14 का प्रश्न है, सुप्रीम कोर्ट ने अपने कई फैसलों में इसकी व्याख्या करते समय यह कहा है कि यह एब्सोल्यूट राइट (पूर्ण अधिकार) नहीं है, और इसके अंदर तर्कसंगत वर्गीकरण (रीजनेबल क्लासिफिकेशन) किया जा सकता है. सीएए को लेकर मामला सुप्रीम कोर्ट में है. देखना यह है कि सीएए को सुप्रीम कोर्ट तर्कसंगत या न्यायसंगत मानता है या नहीं.
देश की जनता द्वारा निर्वाचित प्रतिनिधि संसद में जब कोई कानून बनाते हैं और उसके बाद अगर किसी व्यक्ति को लगता है कि वह कानून असंवैधानिक है, तो इसको संवैधानिक बनाने के दो रास्ते हैं. एक तो यह कि वह व्यक्ति सुप्रीम कोर्ट में उस कानून को चुनौती दे और सुप्रीम कोर्ट उसका निर्णय करे कि वह कानून संवैधानिक है या नहीं. दूसरा रास्ता यह है कि संसद में ही उस कानून का संशोधन लाया जाये. ये दोनों संवैधानिक रास्ते हैं किसी कानून पर पुनर्विचार करने के लिए.
संविधान की प्रस्तावना में सेक्युलर और सोशलिस्ट शब्द आपातकाल के समय जोड़ा गया था. यह उस वक्त पॉलिटिकल पोस्चरिंग ज्यादा थी. अगर सोशलिज्म शब्द के अर्थ की गहराई में जायें, तो भारत इस पर खरा नहीं उतरता है. साल 1991 में उदारीकरण आने के बाद भारत सरकार की जो भी नीतियां रही हैं, वे किसी भी तरह सोशलिस्ट नहीं कही जा सकती हैं.
तो क्या यह माना जाये कि भारत सरकार संविधान की प्रस्तावना का उल्लंघन करती आ रही है?‍ बीते तीस वर्षों में भारत में सरकारों की जो नीति रही है, वह सोशलिस्ट कभी नहीं रही. देश में चाहे कांग्रेस की सरकार रही हो या भाजपा की, किसी की भी नीति समाजवादी नहीं रही है.
यह लेखक के निजी विचार हैं
(वसीम अकरम से बातचीत पर आधारित)
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