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स्वास्थ्य में निवेश

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भारत उन देशों में शामिल है, जहां स्वास्थ्य के मद में सकल घरेलू उत्पादन (जीडीपी) के अनुपात में सबसे कम खर्च किया जाता है. हमारे देश में यह आंकड़ा सवा फीसदी के आसपास है.

पिछले कुछ सालों से स्वास्थ्य सेवा को बेहतर बनाने की दिशा में अनेक पहलें की गयी हैं और सरकार ने आगामी कुछ वर्षों में इस क्षेत्र में खर्च को बढ़ा कर जीडीपी का ढाई फीसदी करने का लक्ष्य निर्धारित किया है. केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने 15वें वित्त आयोग के सामने पेश आकलन में बताया है कि प्राथमिक स्वास्थ्य सेवा के लिए अगले पांच सालों में 5.38 लाख करोड़ रुपये की जरूरत है. इस निवेश से इस सेवा की 90 फीसदी मांगों को पूरा किया जा सकेगा. नीति-निर्धारण में एक बड़ी कमी यह रही है कि ज्यादा जोर इलाज पर होता है, रोकथाम और जागरूकता के प्रसार पर कम ध्यान दिया जाता है.

इसे रेखांकित करते हुए मंत्रालय ने कहा है कि इस वजह से गैर-संक्रामक रोगों के मामले बहुत तेजी से बढ़ते जा रहे हैं. कैंसर, दिल की बीमारियां, डायबिटीज और सांस के रोग पुरुषों की 62 फीसदी और स्त्रियों की 52 फीसदी मौतों के लिए जिम्मेदार हैं. इनमें से 56 मौतें असमय होती हैं. यदि प्राथमिक स्वास्थ्य की समुचित व्यवस्था रहे, तो इन मौतों को बहुत हद तक रोका जा सकेगा. इससे इलाज पर होनेवाले खर्च में भी भारी कटौती करने के साथ ऊपरी अस्पतालों पर मौजूदा दबाव को भी कमतर किया जा सकता है. आबादी का बड़ा हिस्सा गरीब और कम आमदनी के तबकों का है. इलाज के बड़े खर्च के कारण लाखों लोग हर साल गरीबी रेखा से नीचे चले जाते हैं.

इस तरह से गरीबी और बीमारी का दुश्चक्र चलता रहता है. मामूली परामर्श व दवाओं से ठीक होनेवाले रोग भी हर साल लाखों लोगों की जान ले लेते हैं. नेशनल हेल्थ प्रोफाइल रिपोर्ट के अनुसार, करीब 11 हजार लोगों के लिए एक सरकारी एलोपैथिक डॉक्टर है. ऐसे में सरकारी चिकित्सा केंद्रों और अस्पतालों की संख्या भी बढ़ाने की जरूरत है.

देश में 675 लोगों के लिए एक सहायक कर्मी की उपलब्धता है, जबकि हजार लोगों के लिए तीन कर्मियों का अनुपात होना चाहिए. कुछ माह पहले प्रकाशित अमेरिकी संस्था सेंटर फॉर डिजीज डाइनामिक्स, इकोनॉमिक्स एंड पॉलिसी की रिपोर्ट में तो डॉक्टरों की कमी छह लाख और सहायक कर्मियों की कमी 20 लाख तक आंकी गयी थी. ग्रामीण और दूर-दराज के क्षेत्रों में स्थिति बहुत खराब है.

इस अभाव के साथ जागरूकता व पैसे की कमी की वजह से अक्सर लोग रोग के शुरुआती चरण में उपचार नहीं कराते, जिससे रोग बढ़ता जाता है. मंत्रालय ने अपने आकलन में चिकित्साकर्मियों की कमी दूर करने और संसाधनों की उपलब्धता सुनिश्चित करने को प्राथमिकता दी है. उम्मीद की जानी चाहिए कि सरकार के उद्देश्यों व लक्ष्यों का संज्ञान लेते हुए स्वास्थ्य के मद में वित्त आयोग पर्याप्त आवंटन की स्वीकृति देगा और इसकी झलक आगामी बजट में भी देखने को मिलेगी.

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