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बॉलीवुड की फिल्मी बेईमानी

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तरुण विजय
वरिष्ठ नेता, भाजपा
tarunvijay55555@gmail.com

किसी के जीवन का अतिशय दारुण दुख बॉलीवुड के मसाले में लिपटकर जो पाखंडी चरित्र अपना लेता है, वह उस अतिशय दुख से भी बढ़कर चुभनेवाला सिद्ध होता है. फिल्म छपाक एक ऐसी लड़की की कारुणिक और बहादुरी मिश्रित कथा है, जो समाज के राõक्षसों से लड़ते हुए जिंदगी से हारी नहीं, बल्कि उसने जीत का प्रेरक परचम भी फहराया.
दीपिका पादुकोण इस फिल्म की नायिका है, जिसने तेजाब से अपना चेहरा विकृत करा बैठी लõक्ष्मी अग्रवाल का चरित्र निभाया है. लõक्ष्मी अग्रवाल दिल्ली की है और जिस दरिंदे ने उस पर तेजाब फेंका था, उसका नाम नदीम खान था. यह एक ऐसी कथा है, जिसको सामान्यत: हर संवेदनशील व्यक्ति देखता और इससे कुछ सीखता भी.
लेकिन, जो दीपिका पादुकोण माओत्से तुंग और पोलपोट की खूनी विरासत के नवीन उन रहनुमाओं के बीच सहानुभूति प्रकट करने जेएनयू जा पहुंची, जिन्होंने कभी कारगिल वीरों का अपमान किया था और आज तक नक्सली आतंक की भर्त्सना नहीं की, उसी दीपिका और उनके इर्दगिर्द बसे बॉलीवुड संसार की नीयत भी संदिग्ध दिखती है.
वैसे यह मौसम भी खुलकर हिंदुओं के प्रतीकों और उनकी संवेदनाओं पर तेजाब छिड़कने का है और वह भी उन लोगों द्वारा जो अन्यथा खुद को देश से विदेश तक ‘डरे हुए लोग’ बताने से नहीं अघाते. भाई नागरिकता कानून का विरोध करो, कौन रोकता है. पर नागरिकता कानून के विरोध का हनुमान मंदिर तोड़ने, हिंदुओं द्वारा पूजित तथा बिहार राज्य सरकार के शासकीय प्रतीक चिह्न में अंकित स्वस्तिक को हिटलरी सलाम देने या स्वस्तिका को तोड़कर उस पर अनाप-शनाप लिखने से क्या संबंध हो सकता है?
नागरिकता कानून जिसने भी पढ़ा है, वह जानता है कि उसका किसी भी भारतीय नागरिक से कोई संबंध नहीं है, भले ही वह किसी भी आस्था को माननेवाला क्यों न हो. फिर इस कानून के विरोध में हिंदुओं को गाली देने की बात कहां से आ गयी? जो वामपंथी छात्राएं प्रदर्शन में उतरी थीं, उन्होंने अपने चेहरे पर उल्टी-सीधी बातें लिखी थीं.
यह अच्छा सेक्युलरवाद परोसा जा रहा है. हिंदू तो सभी पार्टियों में हैं. हिंदू धर्म किसी एक पार्टी या संगठन का प्राइवेट लिमिटेड कारोबार नहीं है. दस अंगुलियों में बारह अंगूठियां, तांत्रिकों से हवन और बलि, पूजा-पाठ, मत्था टेकना, छठ और दीवाली, यह सिर्फ एक दल और संगठन का त्यौहार कर्म थोड़े ही है.
उन हिंदुओं के सीने पर हिंदुओं को गाली देकर नागरिकता कानून का विरोध करनेवाली आवाजें सुनकर कोई तड़प नहीं पैदा होती. मुंबई में गेट वे ऑफ इंडिया पर नागरिकता कानून और जेएनयू वगैरह के बारे में गुस्सा व्यक्त करने जो लोग आये, उनमें फ्री कश्मीर के पोस्टर का क्या मतलब था? पर हिंदू शिरोमणि सत्ता के कारोबारी उस पर भी खामोश रह गये और लड़की को बचाने के बयान देने लगे.
गेट वे ऑफ इंडिया की भीड़ और यह पोस्टर पाकिस्तानी फौज के डायरेक्टर जनरल ने ईद मनाते हुए खूब ट्वीट किया और वाशिंगटन पोस्ट तक यह देखकर चमक गया कि भारत के छात्र विद्रोह पर उतर आये हैं. उन्हें लगा कि यहां भी अरब देशों की तरह कुछ ‘स्प्रिंग’ जैसा विद्रोह हो रहा है. जबकि पैंतीस लाख से ज्यादा भारतीय छात्रों में से कुछ सौ छात्रों का सड़क पर उतरना क्या अर्थ रखता है, यह केवल भारतीय अखबार ही समझा सकते हैं.
इस कोलाहल में दीपिका पादुकोण की फिल्म बॉलीवुड छाप बाजारू सेक्युलरवाद की जो नुमाइश एक तेजाब पीड़ित लड़की की कारुणिक कथा को भुनाते हुए कर रही है, वह स्तब्धदायक है. समाज में जो सच घटा होता है, फिल्म में उसको वैसा ही दिखाना चाहिए.
यह बेईमानी क्यों की जाती है कि हिंदुओं पर हो रहे शाब्दिक एवं प्रतीकात्मक हमलों पर मीडिया और बॉलीवुड खामोश रहे? यदि भीड़ द्वारा कुचलने की कोई घटना हो या किसी के बाल तक को ‘टच’ करने का मामला हो, तो अपने ही मादरे वतन के खिलाफ देश-विदेश में जहर उगलने से परहेज नहीं किया जाता. यह एकतरफापन ‘सॉफ्ट टेररिज्म’ और शब्द हिंसा का मारक आक्रमण है, जो लोहे के खड्ग के प्रहार की तरह ही मारक होता है.
किसी अच्छी कलात्मक और संवेदनशील प्रस्तुति में यदि बेईमानी और पाखंड का छींटा लग जाये, तो पूरी सफेद चादर खराब हो जाती है. बॉलीवुड की यह बेईमानी भरी यात्रा हमारे इस समय पर एक बड़ा धब्बा है जो धूर्तता, संवेदनहीनता एवं हिंदुओं के प्रति घनीभूत घृणा का आश्चर्यजनक उदाहरण है.
घनीभूत घृणा शब्द का इसलिए इस्तेमाल किया, क्योंकि ननकाना साहिब से लेकर पेशावर तक जो हिंदू और सिख हर दिन भयानक त्रासदियों का शिकार हो रहे हैं, जेएनयू से गेटवे ऑफ इंडिया तक गुस्से में तनी मुट्ठियां उनको शरण देने के खिलाफ ही नहीं हैं, बल्कि अपने आंदोलन में हिंदू विरोध और भारत तोड़ने के नारे शामिल करके देशभक्त मुसलमानों को भी जलील कर रही हैं. जेएनयू से गेटवे ऑफ इंडिया तक दीपिका पादुकोण के बॉलीवुड की फिल्मी बेईमानी ने घाव पर नमक ही छिड़का है.
(ये लेखक के निजी विचार हैं.)
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