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Home Opinion विदेश नीति के मोर्चे पर चुनौतियां

विदेश नीति के मोर्चे पर चुनौतियां

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प्रो सतीश कुमार

अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार
singhsatis@gmail.com
एक बार फिर चीन की घुसपैठ लद्दाख में हुई है. चीन ने यहां पर वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) के करीब बड़े पैमाने पर सैन्य ढांचे का निर्माण शुरू किया है. भारतीय रक्षा मंत्रालय के सूत्रों के अनुसार, चीनी सेना ने यहां तंबू लगाकर अंदर ही अंदर भूमिगत सुरंगें बना ली हैं और पांगोंग झील के करीब विवादित फिंगर-8 क्षेत्र में भी सुरंगों का जाल बिछा रही है.
उल्लेखनीय है कि 2017 में पांगोंग झील के उत्तरी हिस्से में दोनों देशों के बीच सैन्य मुठभेड़ हुआ था. इस झील का करीब दो-तिहाई हिस्सा चीन के कब्जे में है. लगता है कि इस साल भारत की विदेश नीति की चुनौतियाें में चीन सबसे ऊपर होगा.इस साल आंतरिक राजनीति में उलट-फेर से भी भारत के पड़ोसी देशों के साथ तल्खी की संभावना है, विशेषकर बांग्लादेश के साथ. पाकिस्तान का निरंतर विरोधी रुख भारत को कम, खुद पाकिस्तान को खोखला कर रहा है.
चूंकि पाकिस्तान आज अपने अस्तित्व की जंग लड़ रहा है. वहीं अमेरिका में इस वर्ष राष्ट्रपति चुनाव है. इस तरह देखा जाये तो बहुत सारे निर्णय चुनाव को देखते हुए भी लिये जा रहे है, क्योंकि भारत के लिए भी यह बहुत महत्वपूर्ण है.बीते वर्ष में भारत की विदेश नीति की सफलता संतोषजनक रही है. चूंकि वह चुनावी वर्ष था, और पहली बार विदेश नीति का मुद्दा लोकसभा चुनाव में भी छाया रहा. भाजपा की केंद्र में अप्रत्याशित जीत के बाद जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 को हटाया गया, उस समय भारत की कारगर कूटनीति सफल होती हुई दिखायी दी.
सबसे महत्वपूर्ण उदाहरण ब्रिटेन का है. ब्रेक्जिट को लेकर इस बात के कयास लगाये जा रहे थे कि शायद ब्रिटेन में लेबर पार्टी की सरकार बन सकती है. लेबर पार्टी के सांसदों ने कश्मीर मुद्दे को ब्रिटेन के संसद में उठाया था, जिसका विरोध प्रवासी भारतीयों ने जमकर किया.
भारतीय लोगों के रुख को भांपते हुए कंजर्वेटिव पार्टी के नेता ने कश्मीर के मुद्दे पर भारत की नीतियों की प्रशंसा की और वह ब्रिटेन का चुनाव भी जीत गये. यहां पर इस बात की चर्चा जरूरी है कि ब्रिटेन और अमेरिका में प्रवासी भारतीयों की राजनीतिक सक्रियता पिछले पांच सालों में तेजी से बढ़ी है.
पिछले वर्ष जब भारत के प्रधानमंत्री अमेरिका गये, तो पूरा विश्व हाउदी मोदी की गूंज से कंपित हो गया. प्रधानमंत्री की पहचान दुनिया के सबसे ताकतवर नेता के रूप में की जाने लगी. बीते साल जापान, फ्रांस और ऑस्ट्रेलिया के बीच भारत के संबंध और मजबूत हुए.
भारतीय विदेश नीति की सफलता के बावजूद, कुछ चुनौतियां भी हैं. पिछले महीने चीन का नौसैनिक जहाज शियान-1 भारत के अंडमान निकोबार में गस्त लगाते हुए पकड़ा गया. जब इस बात की खोज-खबर ली गयी, तो चीन ने यह बात कही कि वह समुद्री रिसर्च के नये आयाम को ढूंढ रहा था.
समुद्री नियमों के अनुसार ऐसा करना अपराध की श्रेणी में नहीं आता. यहां भारत के लिए चुनौती यह है कि सुपर पावर की कतार में चीन नंबर वन बनना चाहता है. जबकि भारत की मरीन नीति चीन की तुलना में बहुत कमजोर है. हमारे कोस्टल एरिया में चीन की शिरकत भारत के लिए चिंता का विषय है.
नेपाल में चीन का विस्तार भी कम खतरनाक नहीं है. भारत की सीमाओं पर चीन का हस्तक्षेप बढ़ गया है. भूटान के साथ ही हमारा जम्मू-कश्मीर भी इस बदलाव का शिकार बना.
चीन ने हिमालय की तलहटियों से उतरते हुए अपने पंख भारत की समुद्री ठिकानों पर फैलाने शुरू कर दिये हैं. दक्षिण एशिया से लेकर मध्य एशिया और अफ्रीका तक चीन का विस्तार होने लगा है. साल 2013 में चीन ने वैश्विक आर्थिक विकास के नाम पर ओबीआर की शुरुआत की थी. तब चीन ने बताया कि वह ऐतिहासिक शिल्क रूट की शुरुआत करने जा रहा है.
लेकिन, बाद में यह आर्थिक ढांचा सैनिक समीकरण में बदलने लगा. चीन ने अमेरिकी तर्ज पर विदेशी भूमि पर सैनिक छावनी बनाने की पहल कर दी. वहीं अपने आर्थिक व्यापार की सुरक्षा के नाम पर चीन ने दक्षिण एशिया और हिंद मसागर के कई मुहानों पर अपने सैनिक बंदोबस्त को खड़ा कर दिया.
पिछले दिनों अफगानिस्तान में हुए राष्ट्रपति चुनाव में अशरफ गनी का दूसरी बार राष्ट्रपति बनना भारत के लिए शुभ समाचार रहा. लेकिन, जिस तरीके से अमेरिका और रूस तालिबान को मजबूत बनाने की जुगत में हैं, वह भारत के लिए अच्छा नहीं है. श्रीलंका में सत्ता परिवर्तन भी भारत के लिए चिंता का कारण रहा, जिसे इस साल देखा और समझा जाना बाकी है.
विश्व राजनीति में परिवर्तन कई बार अपने अनुकूल नहीं होता है. उस देश की आंतरिक राजनीति ही विषयों का निर्धारण करती है. लेकिन, यह भी सच है कि किसी देश का वजूद निरंतर मजबूत बनता जाये, तो वैश्विक राजनीति उस देश के अनुकूल हो जाती है. भारत का अंतरराष्ट्रीय ग्राफ पिछले छह सालों में तेजी से ऊपर बढ़ा है. इस बात को चीन ने भी माना है.
रूस के लिए भारत एक महत्वपूर्ण मित्र है, इस बात का एहसास पुतिन को है. भारत के पड़ोसी देश अपने राजनीतिक रंग में फेरबदल से भारत को नाराज नहीं कर सकते, यह बात श्रीलंका के नये राष्ट्रपति ने भी कही है. अब देखना यह है कि यह साल हमारी विदेश नीति की सफलता में कितना योगदान देता है.
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