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Home Opinion ‘हिंदी मेला’ का रजत जयंती वर्ष

‘हिंदी मेला’ का रजत जयंती वर्ष

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रविभूषण

वरिष्ठ साहित्यकार

ravibhushan1408@gmail.com

हिंदी प्रदेश में संस्कृति संबंधी चिंतन और कर्म की बेहद कमी है. एक प्रकार से यहां धर्म ने या तो संस्कृति को लील लिया है या उसे अपने अधीन कर लिया है. ये प्रदेश किसी अन्य अहिंदी प्रदेश से कुछ सीखने को तैयार भी नहीं हैं. वर्ष 1995 में कोलकाता में डॉ शंभु नाथ के नेतृत्व में ‘सांस्कृतिक पुनर्निर्माण मिशन’ के तहत हिंदी मेला का शुभारंभ हुआ था, जो ‘मातृभाषा प्रेम, साहित्य के लोकप्रियकरण और सांस्कृतिक पुनर्निर्माण’ के प्रति कृतसंकल्प है. यह वर्ष हिंदी मेला का रजत जयंती वर्ष है.

समय-समय पर इस वार्षिक मेले में भाग लेनेवाले हिंदी कवियों, लेखकों, कथाकारों, कॉलेज-विश्वविद्यालयों के अध्यापकों, आलोचकों और बुद्धिजीवियों ने बार-बार इस से प्रेरणा ग्रहण कर हिंदी भाषी राज्यों की राजधानियों में इस की तर्ज पर हिंदी मेला के आयोजनों की बात बार-बार कही है, पर यह बनारस, इलाहाबाद, पटना, लखनऊ, दिल्ली, भोपाल कहीं भी संभव नहीं हो सका है.

यहां कोई किसी से उन्नीस नहीं है और सामूहिकता तथा सांगठनिक एकता मात्र कहने भर के लिए है. निष्ठा, संकल्प, उत्साह, सक्रियता के बिना ऐसा आयोजन नहीं हो सकता.

प्रायः प्रत्येक वर्ष हिंदी मेला दिसंबर महीने के अंत में संपन्न होता रहा है- 26 दिसंबर से एक जनवरी तक. यह सात दिवसीय सांस्कृतिक युवा अभियान है. अपनी रचनाशीलता, सांस्कृतिक सक्रियता के कारण हिंदी मेला की अपनी एक राष्ट्रीय छवि बन चुकी है.

हिंदी भाषा में तो एकदम नहीं, दूसरी भाषाओं में भी ऐसे उदाहरण बहुत कम हैं. हिंदी भाषा, साहित्य और संस्कृति के प्रति निष्ठा हिंदी राज्यों में दम तोड़ रही है. पुरानी संस्थाएं लगभग नष्ट हो चुकी हैं. हिंदी मेला जैसे आयोजन छात्रों-छात्राओं और युवाओं को अधिक जीवंत और सक्रिय करते हैं. इस बड़े आयोजन की स्वागत समिति में लगभग 90 व्यक्ति हैं.

यह मेला अपनी भाषा, सांस्कृतिक विकास एवं संवर्धन के लिए है. इसका मकसद विचारहीन समाज को विचारवान बनाने में है, क्योंकि ‘विचार है तो समाज है’. हिंदी मेला का नारा है- ‘पढ़ना लड़ना है’. पढ़ाई का बुजदिली और कायरता से कोई संबंध नहीं होता. अध्ययन हमें विचारवान और विवेकशील बनाता है. सही अर्थों में शिक्षित मनुष्य कभी अपना सर नहीं झुकाते, आत्मसम्मान नहीं छोड़ते.

इस वर्ष 26 दिसंबर को हिंदी मेला का उद्घाटन सड़कों पर प्रदर्शन से हुआ- आह्वान से. लेखकों, युवाओं, शिक्षकों और बुद्धिजीवियों के हाथों में जो तख्तियां थीं, उनमें कई जरूरी नारे लिखे हुए थे.

उनमें ‘देश की एकता और अखंडता के प्रति प्रतिबद्धता’ थी, ‘डर के विरुद्ध शब्द की दहाड़’ थी और मौन अत्याचारों को बंद करने का आह्वान था. कोलकाता के इस हिंदी मेला से हिंदी राज्यों के छात्र-छात्राओं, रिसर्च स्कॉलरों, युवाओं को ही नहीं, कॉलेज-विश्वविद्यालयों के हिंदी अध्यापकों को भी बहुत कुछ सीखने-समझने की जरूरत है. इस मेला में छात्र-छात्राओं के लिए अनेक प्रतियोगिताएंं आयोजित की जाती हैं.

लघुनाटक प्रतियोगिताओं में नाटक की स्क्रिप्ट देकर भाग लिया जाता है और प्रस्तुत नाटक का उद्देश्यपरक होना अनिवार्य है. हिंदी मेला का एक उद्देश्य है- सांस्कृतिक पुनर्निर्माण का, जिसकी आज देश को अधिक जरूरत है.

काव्य- आवृत्ति का चलन हिंदी प्रदेश में नहीं है. यहां काव्य-आवृत्ति प्रतियोगिता में जिन 22 कवियों की कविताओं की आवृत्ति है, उनमें निराला, दिनकर और अज्ञेय, मुक्तिबोध से लेकर कात्यायनी और अनामिका तक हैं. हम विश्वविद्यालयों में भी ऐसी पहल नहीं कर पाते. हिंदी ज्ञान प्रतियोगिता में जहां ‘हिंदी साहित्य का इतिहास’ विषय है, वहां काव्य-संगीत प्रतियोगिता में भक्तिकाल और आधुनिक काल के प्रमुख हिंदी कवियों में से प्रतिभागी अपनी रुचि के अनुसार किसी एक के एक गीत का गायन वाद्ययंत्र एवं वादक के साथ करते हैं.

सब कुछ खड़ी बोली ही नहीं है, इसलिए लोकगीत प्रतियोगिता में हिंदी की विविध बोलियां आदि शामिल की जाती हैं. यहां एक अनुशासन है, आयोजकों के पास लोकगीत की एक प्रतिलिपि देना अनिवार्य है.

सिनेमा और सस्ते सिनेमा और सस्ते गीतों के लिए हिंदी मेला में कोई जगह नहीं है. यहां स्तरीयता, रचनाशीलता, विविधता और मौलिकता का सम्मान है. काव्य-नृत्य प्रतियोगिता में भारतीय भाषाओं में रचित कविताओं पर नृत्य है, जिसकी पृष्ठभूमि में संगीत आवश्यक है. इसी प्रकार एक प्रतियोगिता कविता-पोस्टर की है. चित्रांकन प्रतियोगिता भी है, जिसका विषय इस वर्ष पर्यावरण और मनुष्यता है. यह बच्चों के लिए है. एक पुरस्कार रचनात्मक लेखन के लिए भी है, जो 30 वर्ष से कम उम्र के लोगों की रचनाशीलता को पुरस्कृत करता है.

युवा काव्य उत्सव, भाषण प्रतियोगिता और वाद-विवाद प्रतियोगिता भी है. यहां काव्य संगीत, लोकगीत, नृत्य और काव्य आवृत्ति के लिए ऑडिशन जरूरी है. दस प्रतियोगिताओं में विजयी को मोहन राकेश, अज्ञेय, निराला, मीरा, रेणु, महादेवी और भीष्म साहनी के नाम पर आठ पुरस्कार दिये जाते हैं. रजत जयंती वर्ष का यह कार्यक्रम अधिक उल्लेखनीय है और प्रेरणादाई भी है. राष्ट्रीय संगोष्ठी में इस वर्ष विषय है- ‘छायावाद के सौ साल’.

हिंदी मेला का सारा श्रेय शंभूनाथ और उनकी टीम को जाता है. मिल-जुल कर सब आर्थिक सहयोग करते हैं. हिंदी प्रदेश यह सब क्यों नहीं सीखता? वह इतना संस्कृत विमुख क्यों है? हिंदी मेला एक उदाहरण है और एक संदेश भी.

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