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किये-कराये पर पानी फेरना

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सुरेश कांत

वरिष्ठ व्यंग्यकार

drsureshkant@gmail.com

‘किया’ वह क्रिया है, जो भूतकाल में कुछ किये जाने का बोध कराती है. लेकिन बोध कराने का यह मतलब नहीं है कि वह किये जाने का प्रमाण भी होती हो. किये जाने का बोध कराना एक अलग चीज है और किया जाना बिलकुल अलग.

किये जाने का बोध बिना किये भी कराया जा सकता है, जैसा कि आजकल देखने में आ रहा है. बिना किये ही नेता कह देते हैं कि हमने किया. यह किया, वह किया. सिर्फ यह नहीं किया, बल्कि वह भी किया. यह नहीं, तो वह किया और वह नहीं तो यह किया. जब यह करना था, तो वह किया और जब वह करना था, तो वह को छोड़कर यह किया. इस तरह किये जाने के चक्कर में चाहे न यह हुआ, न वह हुआ. हुआ या नहीं हुआ, पर किया अवश्य.

नेता यह करके ही रुक नहीं गये, बल्कि वह भी कर दिया. करने का दम भी भरा कि दूसरे जो साठ-सत्तर सालों में नहीं कर सके, वह हमने साठ-सत्तर दिनों में कर दिया.

‘किया’ इस तरह ‘कर दिया’ का रूप धारण कर लेता है, बिना किये भी. कई बार दूसरों के किये को भी अपना बता दिया, और जब उस किये पर उंगली उठने लगी, तो कह दिया कि यह तो उन्होंने किया था. क्योंकि हम तो जो करते हैं, हमेशा सही करते हैं और दूसरे हमेशा गलत. यों दूसरों का गलत भी हमारे हाथ में आकर सही हो जाता है, फिर चाहे वह कोई काम हो या आदमी.

‘किया’ जैसा ही है ‘कराया’, जिसका अर्थ है खुद नहीं किया, बल्कि दूसरे से कराया. ‘किया’ के साथ जुड़ने से यह ‘कराया’ भी ‘किया’ का ही अर्थ देने लगता है, जबकि अलग रहने पर उसका अलग ही अर्थ होता है.

अलग रहने और जुड़ने का असर. कुछ वैसा ही, जैसे भाजपा शिवसेना से अलग होकर सरकार बनाने से चूक जाये और शिवसेना कांग्रेस और एनसीपी से जुड़कर सरकार बना ले. ‘किया’ से गठबंधन करके ‘कराया’ भी ‘किया’ ही बन जाता है और सरकार बना लेता है और फिर ‘किया-कराया’ हो जाता है.

इस ‘किये-कराये’ का पानी से गहरा ताल्लुक है. पानी किये-कराये पर फेरे जाने के काम आता है. यह पानी का एक ऐसा प्रयोग है, जिसे सृष्टि में सिर्फ आदमी ही जानता है.

बहुत-से लोग पानी से पीने का कम और दूसरों के किये-कराये पर फेरने का काम ज्यादा लेते हैं. पानी अब तक दूसरों के किये-कराये पर ही फेरा जाता रहा है. लेकिन अब इसके आयाम बदले हैं. अब पानी दूसरों के किये-कराये पर ही नहीं, अपने किये-कराये पर भी फेरे जाने की नौबत आ गयी है.

कल मेरे एक कवि-मित्र ने बताया कि उसने एक ऐसा सार्वजनिक शौचालय देखा, जिसमें अपने किये-कराये पर पानी अवश्य फेरकर जाने की गुजारिश की गयी थी.

वैसे देश के ज्यादातर शौचालयों का यही हाल है. जिम्मेदार नागरिक उनमें कर-करा तो जाते हैं, लेकिन उस पर पानी नहीं फेरते. इसका बड़ा कारण यह भी होता है कि वहां फेरे जाने के लिए पानी ही नहीं होता. हो भी कैसे, जब सारा पानी नेताओं ने पिछले नेताओं के सब किये-कराये पर फेरने के लिए कब्जा लिया हो!

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