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Home Opinion ‘सहियापन’ की ओर लौटा झारखंड

‘सहियापन’ की ओर लौटा झारखंड

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डॉ अनुज लुगुन

सहायक प्रोफेसर, दक्षिण बिहार केंद्रीय विवि, गया

anujlugun@cub.ac.in

झारखंड विधानसभा चुनाव के परिणाम भारतीय जनता पार्टी के लिए बेहतर साबित नहीं हुए और जेएमएम-कांग्रेस-राजद गठबंधन ने अच्छा प्रदर्शन करते हुए बढ़ोतरी हासिल की है.

इस चुनाव परिणाम पर इस सवाल के साथ लोगों की नजर थी कि जिस मजबूती से भाजपा केंद्र में खड़ी है, क्या उसी तरह से वह झारखंड में भी अपना प्रभाव बरकरार रखेगी? चूंकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भाजपा के ब्रांड नेता माने जाते हैं और पार्टी उन्हीं के नाम पर यहां की जनता को भी लुभाने का प्रयास कर रही थी, इसलिए यह सवाल रोचक बन गया था. चुनाव के दौरान भाजपा प्रधानमंत्री मोदी और सीएम रघुवर दास को अपने सफल नेता के रूप में प्रस्तुत कर रही थी.

स्वाभाविक सी बात है, अगर भाजपा गठबंधन से आगे निकलती, तो मीडिया ‘चल गया मोदी का जादू’ वाला कैप्शन जरूर देता. लेकिन चूंकि अब भाजपा गठबंधन की तुलना में न केवल पीछे चली गयी है, बल्कि उसका वोट प्रतिशत भी कम हुआ है, तो क्या ऐसे में कहा जायेगा कि यहां मोदी का जादू नहीं चला? इस सवाल को राष्ट्रीय और क्षेत्रीय मुद्दों के आधार पर देखा जा सकता है.

इस चुनाव में भाजपा के पास अपना कोई निश्चित क्षेत्रीय मुद्दा नहीं था. जिस तरह से भाजपा केंद्र में पूरी दबिश के साथ अपने मनोनुकूल अधिनियमों को पारित करती जा रही है, उससे उसे यह लग गया था कि वह केंद्र में उसके द्वारा किये जा रहे नये बदलावों से झारखंड की जनता को भी प्रभावित कर लेगी. राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर, बाबरी मस्जिद का फैसला और नागरिकता संशोधन कानून आदि को उसने झारखंड की जनता के सामने रखने की कोशिश की थी.

यहां तक कि झारखंड चुनाव के दौरान प्रधानामंत्री ने अपने संबोधन में जो भी भी बातें कहीं, उन सबका संदर्भ राष्ट्रीय था. उन्होंने खूंटी में कहा था कि जब ‘भगवान राम’ संकट में थे, तब आदिवासियों ने ही उनकी मदद की थी. लेकिन खूंटी में ही आदिवासियों के पत्थलगड़ी आंदोलन के दमन उन्होंने कुछ नहीं कहा और बात ‘भगवान राम’ पर केंद्रित हो गयी. इसी तरह उन्होंने दुमका में विरोधियों पर हमला करते हए कहा था कि पाकिस्तान के पैसे से जो देशविरोधी काम होता था, वही काम कांग्रेस कर रही है. इस तरह हम देख सकते हैं कि भाजपा का केंद्रीय सरोकार स्थानीय मुद्दों को लेकर नहीं था.

मोदी जी ने ही कहा था कि उनकी सरकार का कोई रिमोट कंट्रोल नहीं है, जबकि रघुवर दास की जो लॉबी थी, उसमें दिल्ली की भी बड़ी भूमिका रही है. इस वजह से भाजपा के अंदर अंदरूनी बिखराव शुरू हुआ, जो कि सरयू राय के रूप में सामने आया. अपने वरिष्ठ नेता सरयू राय की अनदेखी का परिणाम यह हुआ कि पार्टी कार्यकर्ता निराश हुए.

सरयू राय ने रघुवर दास के खिलाफ चुनाव लड़ा और उन्हें हरा दिया. भाजपा के अंदर जो आंतरिक कलह दिखी, उसका विस्तार सिर्फ जमशेदपुर तक नहीं था. अर्जुन मुंडा को केंद्र में भेज कर उन्हें क्षेत्रीय परिदृश्य से बाहर रखने की कोशिश हुई.

अर्जुन मुंडा के अपने पुराने क्षेत्र खरसावां से भी भाजपा को पराजय का सामना करना पड़ा. दूसरी बड़ी बात यह थी कि झारखंड में सीएम के आदिवासी होने की भावनात्मक मांग पुरानी है, जबकि रघुवर दास आदिवासी नहीं हैं. इस बार भी भाजपा ने अपनी तरफ से इस तरह की किसी भी संभावना को खत्म कर दिया था. यह कहा जा सकता है कि भाजपा केंद्र में अपने प्रदर्शन को देखते हुए इस हद तक आत्ममुग्ध हो गयी थी कि सीट बंटवारे में उसने अपने सहयोगियों को नजरंदाज तो किया ही, उसे अपना आंतरिक कलह भी नहीं दिखा.

इसके ठीक विपरीत जेएमएम-कांग्रेस-राजद गठबंधन ने सीधे जमीन पर उतर कर अपनी बात शुरू की. रघुवर सरकार द्वारा जो भी नीतियां लागू की गयी थीं, उन्हें झारखंडी हित के खिलाफ बताया. पत्थलगड़ी आंदोलन इसका ज्वलंत उदाहरण है.

जिस तरह से इस आंदोलन के समर्थकों के खिलाफ दमनात्मक कार्रवाई की गयी थी, आदिवासियों के बीच उसका बहुत नकारात्मक संदेश गया. उसे आदिवासी अस्मिता पर हमला माना गया था. भूमि अधिग्रहण का मसला, सीएनटी-एसपीटी, और स्थानीय मुद्दे हमेशा से झारखंड की जनता के भावनात्मक मुद्दे रहे हैं. इन मुद्दों पर पिछली सरकार की नीतियों से यहां की जनता नाराज थी ही. धर्मांतरण कानून, मॉब लिंचिंग जैसे गंभीर मुद्दे झारखंड की सहिया संस्कृति के खिलाफ थे. झारखंड की ‘सहिया संस्कृति’ में कभी मॉब लिंचिंग जैसी बर्बर घटनाएं नहीं हुई थीं.

यहां की जनता इस बात को महसूस कर रही थी. ये सारे मुद्दे आदिवासियों, अल्पसंख्यकों और ईसाई समुदाय से सीधे जुड़े हुए थे. इन स्थानीय मुद्दों पर भाजपा ने जहां असंवेदनशीलता दिखायी, वहीं गठबंधन ने इस दिशा में थोड़ी वैचारिक पहल की, जिसका परिणाम यह हुआ कि उसने चुनाव के परिणाम को अपने पक्ष में कर लिया. झारखंड के चुनाव में आदिवासी वोटर निर्णायक होते हैं.

भाजपा को उम्मीद थी कि उसे गैर-ईसाई आदिवासी बनाम ईसाई आदिवासी का भी फायदा मिलेगा. लेकिन ‘झारखंडीपन’ की भावना के सामने यह संभव नहीं हो सका. कहा जा सकता है कि झारखंड का यह चुनाव परिणाम अपने झारखंडी ‘सहियापन’ की ओर लौट आया है.

(यह लेखक के निजी विचार हैं.)

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