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Home Opinion अशफाक उल्लाह खां की शहादत

अशफाक उल्लाह खां की शहादत

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कृष्ण प्रताप सिंह
वरिष्ठ पत्रकार
kp_faizabad@yahoo.com
आजादी की लड़ाई के दौरान क्रांतिकारियों द्वारा नौ अगस्त, 1925 की रात लखनऊ के पास काकोरी रेलवे स्टेशन पर अंजाम दिये गये ऐतिहासिक काकोरी कांड के ‘कुसूर’ में 19 दिसंबर, 1927 को अशफाक उल्लाह खां फैजाबाद की जेल में शहीद कर दिये गये.
उनको विदेशी तो क्या ऐसी जम्हूरी सल्तनत भी कुबूल नहीं थी, जिसमें कमजोरों के हक को हक न समझा जाये, जो हुकूमत के सरमायादारों व जमींदारों के दिमागों का नतीजा हो, जिसमें मजदूरों व काश्तकारों का बराबर हिस्सा न हो या जिसमें ‘बाहम इम्तियाज व तफरीक रखकर हुकूमत के कवानीन बनाये जायें’.
लेकिन आज, देश में जो ‘जम्हूरी’ निजाम (लोकतांत्रिक व्यवस्था) है, उसके निकट गैरबराबरी से ज्यादा असुविधा का बाइस यह है कि अशफाक के शहादत दिवस पर शायद ही कोई उन्हें श्रद्धांजलि देने उनके उक्त जेल स्थित शहादतस्थल पर पहुंच जाये. इससे भी ज्यादा दुखद यह है कि इस साल प्रदेश सरकार ने वहां दशकों से होते आ रहे पारंपरिक श्रद्धांजलि समारोह की भी इजाजत देने से साफ इनकार कर दिया है.
प्रसंगवश, 22 अक्तूबर, 1900 को उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर में बेगम मजहूरुन्निशा और मुहम्मद शफीक उल्लाह खां की सबसे छोटी संतान के रूप में जन्मे अशफाक ने अपनी जेल डायरी में लिखा है कि अगर आजादी का मतलब इतना ही है कि गोरे आकाओं के बजाय हमारे वतनी भाई सल्तनत की हुकूमत की बागडोर अपने हाथ में ले लें और तफरीक-व-तमीज अमीर व गरीब, जमींदार व काश्तकार में कायम रहे, तो ऐ खुदा मुझे ऐसी आजादी उस वक्त तक न देना, जब तक तेरी मखलूक में मसावात यानी बराबरी कायम न हो जाये.
क्रांतिकारी आंदोलन के पुनर्पाठ को समर्पित वरिष्ठ लेखक सुधीर विद्यार्थी के प्रयत्नों से प्रकाशित अपनी अरसे तक गुमनाम रही डायरी में अशफाक ने लिखा है कि उनके खयालों के लिए उनको इश्तिराकी यानी कम्युनिस्ट समझा जाये, तो भी उन्हें इसकी फिक्र नहीं.
अपनी फांसी के वक्त देशवासियों के नाम अपने संदेश में उन्होंने देश में सक्रिय वामपंथी समूह से गुजारिश की कि वह जेंटिलमैनी छोड़कर देहात का चक्कर लगाये और ऐसी आजादी के लिए काम करे, जिसमें गरीब खुश और आराम से रहें और सब बराबर हों. उनकी कामना थी कि वह दिन जल्द आये, जब छतरमंजिल लखनऊ में अब्दुल्ला मिस्त्री और धनिया चमार, किसान भी मिस्टर खलीकुज्जमा और जगतनारायण मुल्ला व राजा महमूदाबाद के सामने कुर्सी पर बैठे नजर आयें.
इस जेल डायरी में क्रांतिकारी के तौर पर अशफाक की ईमानदारी व संघर्ष की संपदा तो है ही, कलम की शक्ति भी दिखायी देती है.काकोरी कांड के बाद गोरों की पुलिस ने पूरे उत्तर भारत में संदिग्धों के घरों-ठिकानों पर छापे डालने शुरू किये, तो अशफाक ने खुद को एक गन्ने के खेत में छिपकर बचा लिया था. उसके बाद नेपाल चले गये थे और लौटकर कानपुर में ‘प्रताप’ के संपादक गणेश शंकर विद्यार्थी के यहां शरण ली थी, जो उन दिनों प्रायः स्वतंत्रता सेनानियों का अघोषित अड्डा था. बाद में विद्यार्थी जी ने उन्हें बनारस भेज दिया था, जहां से वे चोरी-छिपे तत्कालीन बिहार के पलामू स्थित डाल्टनगंज चले गये थे.
पंजाब के क्रांतिकारी लाला केदारनाथ सहगल ने अशफाक को देश से बाहर भेजने का प्रस्ताव दिया, तो उन्होंने यह कहकर ठुकरा दिया कि ‘मैं देश से भागना नहीं, बल्कि देशवासियों के साथ रहकर आजादी के लिए लड़ना चाहता हूं.’
लड़ने के संकल्प के साथ वह दोबारा कानपुर आ धमके, तो विद्यार्थी जी ने पुलिस की पहुंच से दूर रखने के लिए उन्हें भोपाल भेज दिया, लेकिन वहां से वह एक दोस्त के साथ दिल्ली चले गये, जहां उसके विश्वासघात के शिकार हो गये और गिरफ्तारी के बाद पूरक मुकदमे का नाटक कर उन्हें फांसी की सजा सुना दी गयी.
अपनी डायरी में अशफाक ने सर वाल्टर स्काॅट की नज्म ‘लव आॅफ कंट्री’ के साथ स्पार्टा के वीर होरेशस के किस्से को अपने क्रांतिकारी जीवन की सबसे बड़ी प्रेरणा बताते हुए लिखा है कि जब वे आठवीं पास होकर आये और उनके अध्यापक ने अपने देश को बचाने के लिए होरेशस के टाइबर नदी पर बना पुल तोड़कर दुश्मन सेनाओं को आने से रोकने और तब तक संकरे रास्ते पर तीन साथियों के साथ खड़े होकर लड़ने का वाकया सुनाया, तो भावावेश में वे रोने लगे थे.
यों, एक जगह अशफाक ने यह भी लिखा है कि उनकी नाउम्मीदियों ने ही उन्हें क्रांतिकारी बनाया. उन्होंने न अपनी हसरतों को दबाया या छिपाया है और न ही जिंदगी को.
इस तथ्य को भी नहीं कि क्रांतिकारी गतिविधियों के लिए धन जुटाने हेतु काकोरी में टेन से ले जाया जा रहा सरकारी खजाना लूटने के आॅपरेशन की योजना बनी, तो अशफाक ने क्रांतिकारियों की केंद्रीय समिति में पेश बिस्मिल के इस आशय के प्रस्ताव का कड़ा विरोध किया था. लेकिन, उनका ऐतराज नहीं माना गया, तो भी उन्होंने खुद को ऑपरेशन को सफल बनाने के लिए समर्पित किया. उन्होंने लिखा है, ‘ऐ वतनी मुहब्बत! तेरी अदाएं भी निराली और अनोखी हैं. वरना यह आसान काम नहीं कि कोई इंसान मौत का मुकाबला करने के लिए अपने को इतनी खुशी से पेश करे.’
साफ है कि उनकी शहादत में वतन से मुहब्बत के कई इंद्र-धनुष झिलमिलाते हैं और युवाओं से उनका यह आह्वान अाज भी उतना ही प्रासंगिक है- ‘उठो-उठो, सो रहे हो नाहक!’
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