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ज्ञानाधारित हो आर्थिकी

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सभ्यता के प्रारंभ से ही मनुष्यता के विकास में शिक्षा का महत्वपूर्ण स्थान रहा है. आधुनिक युग में दशकों पहले विद्वानों ने इस तथ्य को रेखांकित किया था कि वृद्धि एवं उत्पादन को केवल पूंजी व श्रम के आधार पर विश्लेषित नहीं किया जा सकता है, इस प्रक्रिया में ज्ञान यानी उच्च कोटि की शिक्षा के तत्व की विशिष्ट उपस्थिति है. वर्तमान समय में ज्ञान और तकनीक से संबंधित उद्योग व उद्यम वैश्विक स्तर पर अर्थव्यवस्था के सिरमौर बने हुए हैं.

आज जब पारंपरिक उद्योग और वित्तीय तंत्र अनेक घरेलू और अंतरराष्ट्रीय कारकों के कारण गिरावट का सामना कर रहे हैं, भारतीय आर्थिकी की गति को बढ़ाने और उसे ठोस स्थायित्व देने के लिए इस पहलू पर ध्यान देना आवश्यक है. ज्ञान से जुड़ी सेवाओं के उत्पादन में अमेरिका की 33 और चीन की 10 प्रतिशत हिस्सेदारी है, लेकिन भारत का योगदान मात्र दो प्रतिशत ही है. उच्च तकनीक निर्माण में तो हमारी न के बराबर भागीदारी है.
यह सही है कि सूचना-तकनीक के क्षेत्र में उल्लेखनीय विकास ने भारतीय अर्थव्यवस्था को वृद्धि की राह पर अग्रसर करने में अग्रणी भूमिका निभायी है, लेकिन उसके लिए सस्ते श्रम की उपलब्धता के आयाम को अनदेखा नहीं किया जा सकता है. यह भी सनद रहे कि इस क्षेत्र में सॉफ्टवेयर कोडिंग कौशल के अलावा कोई विशेष कार्य नहीं हुआ है.
समुचित ज्ञानार्जन, शोध एवं अनुसंधान के अभाव में सूचना तकनीक का क्षेत्र भी आज हिचकोले खा रहा है. अमेरिका और चीन में समुचित ध्यान रहने के कारण नवोन्मेष की प्रक्रिया गतिशील बनी हुई है. ज्ञान के केंद्र विश्वविद्यालय व संस्थान होते हैं. उच्च शिक्षा में प्रगति के बाद भी हमारे शैक्षणिक संस्थान श्रेष्ठता में दूर-दूर तक दिखायी नहीं पड़ते. विज्ञान से जुड़े शोधों में भारत का योगदान पांच प्रतिशत से नीचे है.
वर्ष 2011 में हुए एक अध्ययन में पाया गया था कि अमेरिका के स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय ने लगभग 40 हजार कंपनियों की स्थापना में सीधे योगदान दिया है. उस समय इन कंपनियों का सम्मिलित राजस्व तीन ट्रिलियन डॉलर से थोड़ा ही कम था, जबकि हमारी कुल आर्थिकी का आकार अब इस स्तर पर पहुंचा है.
इस तथ्य से यह अनुमान लगाया जा सकता है कि ज्ञान से रोजगार और आय में व्यापक बढ़ोतरी की संभावना का द्वार खोला जा सकता है तथा देश को समृद्ध बनाने के सपने को साकार किया जा सकता है. चूंकि हमारी शिक्षा व्यवस्था लचर है और उसे आर्थिक आवश्यकताओं से नहीं जोड़ा जा सका है, इसीलिए भारत की असीम संभावनाओं के बावजूद वैश्विक अर्थव्यवस्था में भारत को बड़ी चुनौती के रूप में नहीं देखा जाता है.
ऐसा नहीं है कि हमारे देश में प्रतिभाओं की कोई कमी है. हमारे छात्रों व शोधार्थियों ने अवसर मिलने पर देश-विदेश में अपनी उत्कृष्टता की छाप छोड़ी है. आवश्यकता इस बात की है कि मेधा के विस्तार के लिए नीति, प्रबंधन और संसाधन की व्यवस्था करने की दिशा में सरकारें, समाज और उद्योग जगत प्रयासरत हों.
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