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अवसरवादी लेखक!

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अंशुमाली रस्तोगी
वरिष्ठ व्यंग्यकार
anshurstg@gmail.com

यह बात मैं किसी लेखक से ‘डिस्कस’ कर नहीं सकता, तो सोचा अपनी पत्नी से ही डिस्कस किया जाये. जब मैंने उसे बताया कि मैं ‘ईमानदार’ लेखक न बनकर ‘अवसरवादी’ लेखक बनने जा रहा हूं, तो यह सुनकर वह बहुत प्रसन्न हुई.मुझे कई किस्म की दुआएं दीं. मेरा उत्साह भी बढ़ाया और कहा- ‘तुमने यह निर्णय लेकर मेरे मन का बोझ हल्का कर दिया. ध्यान रखना, समाज में इज्जत ईमानदार लेखक की कम, अवसरवादी लेखक की अधिक होती है.’
हालांकि, मुझे यकीन नहीं था कि मेरी पत्नी मेरे निर्णय पर सहमति देगी. लेकिन, उसने दी. मुझे और क्या चाहिए.
आपको यह बताता चलूं कि अवसरवादी लेखक बनने का यह निर्णय ऐसा नहीं कि मैंने रातभर में ले लिया हो. यह विचार मेरे मन में कई सालों से चल-फिर रहा था. बस थोड़ी हिम्मत नहीं कर पा रहा था कि लोग और लेखक बिरादरी क्या कहेगी. मगर, किसी के कहे का खयाल रखकर मैं अपनी लेखकीय जिंदगी तो बरबाद नहीं कर सकता न. अतः ईमानदार लेखक होने का तमगा नोचकर फेंक दिया.
और फिर मुझे क्यों नहीं बनना चाहिए अवसरवादी लेखक? आज की तारीख में हर कोई तो अवसरवाद की तरफ भाग रहा है. क्या नेता, क्या अफसर, क्या पूंजीपति, क्या कवि सब अवसरवादी हुए जा रहे हैं. पत्नी ने तो बाकायदा महाराष्ट्र का उदाहरण देकर मुझसे कहा, ‘जब सत्ता की खातिर तीन अलग-अलग विचारधारा के दल आपस में तालमेल कर सरकार बना सकते हैं, अवसरवाद को भुना सकते हैं, तो तुम अवसरवादी लेखक क्यों नहीं हो-बन सकते.’
पत्नी की बात अपनी जगह दुरुस्त है. जब हमारे नेता कुर्सी के लिए अपनी विचारधारा त्याग सकते हैं, तो मैं ईमानदारी को क्यों नहीं छोड़ सकता! यों भी, अब तक ईमानदार लेखक रहकर मैंने कौन से लेखन की दुनिया में झंडे गाड़ दिये हैं.
कौन-सा मुझे साहित्य अकादमी मिल गया. कौन-सा मैंने देश-समाज को बदल डाला. दुनिया अब भी अपने ढर्रे पर ही चल रही है, आगे भी चलती रहेगी!
दरअसल, मैंने कई बार देखा है कि लेखक ठोस निर्णय लेने में गच्चा खा जाता है. किसी और का क्या कहूं, मुझे ही देख लीजिए, इतने सालों से सोचते-सोचते अब यह निर्णय ले पाया. यह जरूरी इसलिए भी था, क्योंकि जिस तरह की हवा देश में चल रही है, बेहतर यही है कि आप चुपके से अवसरवादी हो जायें.
खामख्वाह की तिकारिता करने से कुछ हासिल नहीं. लेखन की दुनिया में मैंने बड़े-बड़े तीसमार खां लेखक देख लिये; वे ऊपर से कुछ और अंदर से कुछ और ही हैं. उनकी सारी प्रगतिशीलता शब्दों की बाजीगरी है. वास्तविकता में हैं अधिकतर अवसरवादी ही.
कोई कुछ कहे, पर अवसरवाद की मलाई खाने में लेखक से कहीं आगे नेता रहते हैं. ये कोई मौका नहीं छोड़ते. जहां उन्हें अवसरवाद की दाल गलती नजर आती है, झट से चट कर जाते हैं. खैर, मैं भी अब नेताओं की राह पर हूं.
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