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बढ़ता जा रहा है पर्यावरण संकट

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डॉ अनुज लुगुन

सहायक प्रोफेसर, दक्षिण बिहार केंद्रीय विवि, गया

anujlugun@cub.ac.in

दिल्ली की केजरीवाल सरकार ने वायु प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए ऑड-इवन योजना लागू की थी. इसके साथ ही बाजार ने अपने लिए मुनाफे का अवसर तलाश लिया. अब दिल्ली में ऑक्सीजन बेचने के बार भी खुल गये हैं.

गांवों में रहनेवालों और पुरानी पीढ़ी के लिए भले यह हास्यास्पद हो कि हवा भी बेची-खरीदी जा रही है, लेकिन महानगरों में रहनेवालों और 4जी तकनीक से लैस पीढ़ी के लिए तो यह संभाव्य और स्वीकार्य है.

कुछ महीने पहले सोलह वर्षीया पर्यावरण कार्यकर्ता ग्रेटा थनबर्ग द्वारा संयुक्त राष्ट्र की जनरल असेंबली से दिया गया भाषण दुनियाभर में लोकप्रिय हुआ. उसका कहना था कि आपके खोखले शब्दों ने मेरे सपने और मेरा बचपना चुरा लिया. यह बात पूरी दुनिया की हकीकत है.

दुनिया के बड़े औद्योगिक नगर तो इसकी चपेट में पहले से ही हैं, अब न केवल छोटे शहर और कस्बे प्रदूषण की भयावह चपेट में हैं, बल्कि इसकी वजह से हो रहा जलवायु परिवर्तन सुदूरवर्ती पारिस्थितिकी को भी प्रभावित कर रहा है. भारत जैसे तीसरी दुनिया के देशों में यह आनेवालों दिनों में त्रासदी बनकर सामने आयेगा. इसके उदाहरण के रूप में दिल्ली का ‘प्रदूषण इमरजेंसी’ हमारे सामने है.

देश के तमाम बड़े शहर और महानगर सुदूरवर्ती आम जनता की जीविका का आसरा बना दिये गये हैं. इससे बहुत बड़ी आबादी तेजी से इन महानगरों की ओर चली आयी है. बाहरी जनसंख्या के दबाव ने यहां की पारिस्थितिकी के संतुलन को िबगाड़ दिया है.

वास्तव में यह विकास के पूंजीवादी मॉडल का समाजशास्त्रीय परिणाम है. पूंजीवाद न केवल पूंजी का केंद्रीकरण करता है, बल्कि वह इसके साथ ही बहुत बड़ी आबादी को सस्ते श्रमिक में रूपांतरित कर अपने केंद्रों की ओर खींचता है. यह जनता की जीविका के साधनों को ध्वस्त कर, उनकी आत्मनिर्भरता को खत्म कर समाज में खाई पैदा करता है. मसलन, दिल्ली जैसे महानगरों में जो आधारभूत सुविधाएं हैं, वे दंडकारण्य जैसे सुदूरवर्ती आदिवासी क्षेत्रों में नहीं हैं.

ठीक उसी तरह दंडकारण्य में जो प्राकृतिक संसाधन हैं, वे दिल्ली में नहीं मिलेंगे. लेकिन महानगर अपने लिए सारा खाद-पानी दंडकारण्य जैसे सुदूरवर्ती क्षेत्रों से हासिल करते हैं, उसे अपने यहां केंद्रित कर वहां की स्थानीय आबादी को अपनी ओर खींचते हैं. संसाधनों के साथ ही श्रम का प्रवाह महानगरों की तरफ हो जाता है. संसाधनों के दोहन से स्थानीय पारिस्थितिकी भी प्रभावित हो जाती है और श्रम के रूप में विस्थापित होती आबादी नयी जगह की पारिस्थितिकी को प्रभावित कर देती है.

दुनियाभर में यह असंतुलन तेजी से फैल रहा है. अब विश्व बैंक जैसी पूंजीवादी संस्थाएं भी इस असंतुलन पर चिंता जता रही हैं. संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के अनुसार, आनेवाले एक दशक में दिल्ली दुनिया में सबसे ज्यादा आबादी वाला शहर होगा. अभी टोक्यो दुनिया में सबसे ज्यादा आबादी वाला शहर है.

दुनिया बढ़ते हुए प्रदूषण और उससे हो रहे जलवायु परिवर्तन को महसूस कर रही है. हाल ही में ट्रंप ने अमेरिका में बढ़ रहे प्रदूषण के लिए भारत, रूस और चीन की तीखी आलोचना करते हए कहा कि इन देशों का कचरा अमेरिका पहुंच रहा है. यह ठीक वैसे ही आरोप हैं, जैसे दिल्ली के प्रदूषण के लिए समीपवर्ती राज्यों के किसानों को दोषी माना गया.

जैसे-जैसे प्रदूषण का स्तर बढ़ता जायेगा, इस तरह के झगड़े और बढ़ेंगे. पड़ोसी एक-दूसरे से झगड़ेंगे, राष्ट्र एक-दूसरे से झगड़ेंगे. खनिज, तेल आदि संसाधनों को लेकर जो लड़ाई चल रही है, वह आगे चलकर बहुत जल्दी सांस लेनेवाली हवा की लड़ाई में तब्दील हो जायेगी. जो ताकतवर होंगे, पैसे वाले होंगे, वही ‘सर्वाइव’ कर पाने की स्थिति में होंगे.

दिल्ली में जो ‘ऑक्सी प्योर’ ऑक्सीजन बार शुद्ध हवा को बेचने के लिए खुला है, वहां पंद्रह मिनट सांस लेने के लिए करीब तीन सौ रुपये चुकाने होते हैं. तो क्या जो पैसा चुका नहीं सकते, वे सांस लेने के अधिकारी नहीं होंगे? इस तरह के बाजार तक किसकी पहुंच होगी? देखते-देखते इस तरह के बाजार और बड़े होंगे. इसके साथ ही सांस लेने की शुद्ध हवा आम लोगों की पहुंच से और दूर हो जायेगी.

साम्यवादी हों या पूंजीवादी देश, सबके उत्पादन के तरीके एक जैसे हैं. हमारी आत्मनिर्भरता मशीनों पर है. तो क्या हमें मशीनों को अपने जीवन से विस्थापित कर देना चाहिए? यह हमारी पूरी सभ्यता का सबसे जटिल सवाल है.

फिदेल कास्त्रो ने पर्यावरण सम्मेलन में कहा था कि जलवायु परिवर्तन को नियंत्रित करने का एक नकारात्मक असर उन गरीब और विकासशील देशों पर होगा, जो अब भी जीवन की बुनियादी जरूरतों के लिए संघर्ष कर रहे हैं.

क्योंकि उन्हें उन वस्तुओं को उत्पादित करने के लिए प्रकृति का दोहन करना पड़ेगा. उनका कहना था कि अमीर देशों की विलासिता में कटौती कर न केवल करोड़ों गरीबों की समस्याओं का समाधान किया जा सकता है, बल्कि पारिस्थितिकी को भी बचाया जा सकता है. दुनिया में बढ़ती गैर-बराबरी आनेवाले दिनों में पर्यावरण संकट से निबटने में बाधा बनेगी.

हमारे लिए दिल्ली का जो प्रतीक बनाया गया है, उस प्रतीक को जितना जल्दी बदला जाये, उतना ही ठीक होगा. टोक्यो, लॉस एंजिल्स, शंघाई आदि के वैभव का जो प्रतीक हमारे सामने रखा जा रहा है, उससे बचना ही बेहतर है. गांधी की 150वीं जयंती के वर्ष में सभ्यता के वर्तमान संकट से उबरने के लिए कम-से-कम यह बात कही ही जा सकती है.

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