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हितों की चिंता

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भारत, चीन, जापान, दक्षिण कोरिया, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड तथा दस आसियान देशों के बीच प्रस्तावित व्यापार समझौते पर सहमति नहीं बन पा रही है. सात वर्षों से जारी बहुपक्षीय वार्ताओं का दौर पूरा हो चुका है. मसौदे पर सदस्य देशों के हस्ताक्षर के लिए चार नवंबर की तारीख तय की गयी है, लेकिन भारत की उचित मांगों पर अन्य देशों का रवैया फिलहाल सकारात्मक नहीं दिख रहा है.
ऐसे में समझौते पर अंतिम निर्णय लेने में देरी हो सकती है या कुछ मसलों पर बाद में चर्चा होगी. इसी सिलसिले में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी थाईलैंड की राजधानी बैंकॉक में हैं, जहां वह अन्य सदस्य देशों के नेताओं के साथ सोमवार को महत्वपूर्ण बैठक में हिस्सा लेंगे. उन्होंने कहा है कि संबंधित देशों के हितों पर आधारित समझौता सभी के लिए लाभदायक होगा. इसी कारण भारत इस समझौते को वास्तविकता में बदलते देखना चाहता है. इस समझौते के तहत दुनिया की लगभग 40 फीसदी आबादी और 40 फीसदी अर्थव्यवस्था है.
भारत के लिए सबसे बड़ी चिंता व्यापार घाटे के बढ़ने तथा घरेलू उत्पादन में कमी को लेकर है. इन 16 देशों में से चीन समेत 11 के साथ हमारा व्यापार संतुलन नकारात्मक है यानी है हम उन देशों से निर्यात की तुलना में आयात अधिक करते हैं. जापान, दक्षिण कोरिया और आसियान के साथ भारत का द्विपक्षीय मुक्त व्यापार समझौता पहले से ही है.
प्रस्तावित समझौते के तहत भारत को 90 फीसदी से अधिक वस्तुओं पर चीन को छोड़ कर अन्य देशों के लिए आयात शुल्क में कटौती करनी पड़ सकती है या उसे हटाना पड़ सकता है. आयात की छूट कृषि, दुग्ध उद्योग और अन्य कुछ क्षेत्रों के लिए बड़ी चोट साबित हो सकती है. पहले से ही बड़ी मात्रा में आयातित वस्तुओं से घरेलू उत्पादन को कड़ी चुनौती मिल रही है. चीन के साथ हमारा व्यापार घाटा 55-60 अरब डॉलर के दायरे में पहुंच चुका है.
इसका सीधा असर हमारी अर्थव्यवस्था, आमदनी और रोजगार पर हुआ है. विभिन्न औद्योगिक और व्यापारिक समूह सरकार को अपनी आशंकाओं के बारे में कह चुके हैं. सरकार भी लगातार आश्वासन देती रही है कि समझौते पर सहमति देने की प्रक्रिया में वह भारत के आर्थिक व वित्तीय हितों का पूरा ध्यान रखेगी.
ऐसी समस्याओं से उबरने का एक ही रास्ता है, जैसा कि प्रधानमंत्री मोदी ने रेखांकित भी किया है, भारतीय बाजार में पहुंच के बदले कुछ क्षेत्रों की भारतीय वस्तुओं और सेवाओं के लिए अन्य देशों के बाजार भी उपलब्ध कराये जाने चाहिए. यदि बड़े पैमाने पर एकतरफा आयात की स्थिति आती है, तो हमारे कई उत्पाद मूल्यों और गुणवत्ता में आयातित वस्तुओं का सामना शायद ही कर पायेंगे.
समुचित प्रतिस्पर्धा के लिए हमारी तैयारी भी अपेक्षाकृत कमतर है. अब देखना यह है कि अंतिम समय में भारत की चिंताओं को मसौदे में क्या जगह मिलती है. भारत के सामने एक विकल्प यह भी है कि वैश्विक बाजार में पैठ जमाने के लिए वह पहले अपनी क्षमता को बेहतर करे और फिर ऐसे किसी बहुपक्षीय समझौते का हिस्सा बने.
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