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Home Opinion 17 अक्तूबर, सर सैयद डे : हिंदू-मुस्लिम एकता के बड़े पक्षधर थे सर सैयद

17 अक्तूबर, सर सैयद डे : हिंदू-मुस्लिम एकता के बड़े पक्षधर थे सर सैयद

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शाहिद अख्तर
उपाध्यक्ष, राष्ट्रीय उर्दू विकास परिषद
delhi@prabhatkhabar.in
हिंदुस्तान एक खूबसूरत दुल्हन है, हिंदू और मुसलमान उसकी दो आंखें है. उसकी खूबसूरती इसमें है कि उसकी दोनों आंखें सलामत व बराबर रहें.’
ये शब्द महान मुस्लिम समाज सुधारक और भविष्यदृष्टा सर सैयद अहमद खां के हैं. पारंपरिक शिक्षा के स्थान पर आधुनिक ज्ञान अर्जित करने के लिए प्रेरित करनेवाले सर सैयद हिंदू-मुस्लिम एकता के बड़े पक्षधर थे. उन्होंने कहा- हम (हिंदू और मुसलमान) एक ही देश के निवासी हैं. इसलिए एक राष्ट्र और देश की तथा हम दोनों समुदायों की प्रगति हमारी एकता, पारस्परिक सद्भावना तथा प्रेम पर आधारित है.
हिंदू और मुसलमान के बीच घनिष्ठ संबंध की वकालत करते हुए सर सैयद ने कहा था- ‘हम दोनों की सामाजिक स्थिति एक जैसी है. हम मुसलमानों में बहुत सी आदतें और रस्में हिंदुओं की आ गयी हैं. दोनों कौमों के बीच आपसी संबंध प्रगाढ़ होगा, तो मुझे ज्यादा खुशी होगी.’
सर सैयद ने ढाका के मानकपुर गंज की चर्चा की, जहां मस्जिद निर्माण के लिए हिंदू भाइयों ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया, क्योंकि वहां के मुसलमान गरीब थे. उन्होंने त्योहारों पर दूसरे धर्म के लोगों की आस्था का ध्यान रखने पर बल दिया. वे लिखते हैं- ‘हम हिंदू-मुसलमानों में दोस्ती और आपस में मुहब्बत व हमदर्दी का बर्ताव चाहते हैं.’ उन्होंने दूसरे धर्म के पेशवाओं के साथ अदब से पेश आने की नसीहत की थी.
सैयद अहमद खां का जन्म दिल्ली के सादात खानदान में 17 अक्तूबर, 1817 को हुआ था. उनके पिता मुगल दरबार में अधिकारी थे. पिता की मृत्यु के बाद परिवार को आर्थिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा. थोड़ी सी शिक्षा के बाद ही उन्हें आजीविका कमाने में लगना पड़ा.
उन्होंने आगरा के कमिश्नर दफ्तर में क्लर्क के रूप में छोटी नौकरी से शुरुआत की, लेकिन नजर हमेशा ऊंची रखी. कड़ी मेहनत से तीन वर्ष बाद 1841 में मैनपुरी में सहायक न्यायाधीश बन गये. जब वे 40 वर्ष के हुए, तो उस समय हिंदुस्तान एक नया मोड़ ले रहा था. सन् 1857 की महान क्रांति और उसकी असफलता के दुष्परिणाम उन्होंने अपनी आंखों से देखे. उनका घर तबाह हो गया. उनकी मां जान बचाकर एक सप्ताह तक घोड़े के अस्तबल में छुपी रहीं. अंग्रेजों ने मुस्लिमों को इस क्रांति का मुख्य षड्यंत्रकारी मानते हुए कठोर रुख अपनाया.
हालात से विचलित हो उन्होंने देश छोड़ मिस्र में बसने का इरादा किया, लेकिन कौम की दयनीय हालत देख यह इरादा त्याग दिया. सर सैयद को अपने पक्ष में करने के लिए ताल्लुका जहांबाद (जो सादात के एक नामी खानदान की संपत्ति थी) सर सैयद को देने का प्रस्ताव दिया गया, लेकिन उन्होंने इसे ठुकरा दिया. यह प्रस्ताव स्वीकार कर वे धनाढ्य की जिंदगी व्यतीत कर सकते थे, लेकिन उन्होंने इसे पसंद नहीं किया.
सर सैयद ने असबाबे बगावत-ए-हिंद नामक पुस्तक लिखकर बताया कि इस घटना के लिए अंग्रेजों की करतूतें जिम्मेदार थीं, जिसके कारण जनता में आक्रोश पैदा हुआ.
पहली बार उन्होंने ही मांग की कि उच्च पदों पर भारतीयों को जगह दी जाये. सेवा से अवकाशप्राप्ति के बाद उन्होंने 1875 में मुहम्मडन एंग्लो ओरिएंटल स्कूल की स्थापना की. यह 1878 में कॉलेज और फिर 1920 में अलीगढ़ मुस्लिम विवि बना. वे इसे भारत का ऑक्सफोर्ड विवि बनाना चाहते थे.
शिक्षा के साथ उन्होंने धार्मिक सुधार पर भी जोर दिया. इस दौरान उन्हें धार्मिक नेताओं के जोरदार विरोध का सामना करना पड़ा, पर वे अडिग रहे. उन्होंने तर्क के आधार पर कुरआन की व्याख्या की. तहजीब-व-अखलाक (सभ्यता और नैतिकता) नामक पत्रिका फारसी भाषा में निकाल कर समाज में सुधार की कोशिश की.
कलकत्ता में साइंटफिक सोसाइटी की स्थापना की. स्त्रियों में साक्षरता बढ़ाने का भी अथक प्रयास किया. उर्दू को लोकप्रिय बनाने के लिए प्रयास किया. उनकी देखरेख में पश्चिमी कृतियों का उर्दू में अनुवाद कराया गया. सन् 1860 में पश्चिमोत्तर सीमांत प्रांत में अकाल पीड़ितों को राहत पहुंचाने के लिए योगदान किया.
महान शिक्षाविद और समाज सुधारक सर सैयद अहमद खां ने 27 मार्च, 1898 को आखिरी सांस ली. उनके द्वारा लगाया गया पौधा आज विशाल पेड़ बन चुका है, जिससे आज लाखों लोग लाभान्वित हो रहे हैं. विलियम ग्राहम ने उनकी जीवनी में स्पष्ट लिखा है- ‘उनका नाम पीढ़ी-दर-पीढ़ी ऐसे व्यक्ति के नाम के रूप में चलता रहेगा, जो अपने धर्मवालों को शिक्षा में बाकी दुनिया की बराबरी में लाने के लिए सब कुछ करने पर तुला था.’
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