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Home Opinion जलवायु परिवर्तन से जूझने का वक्त

जलवायु परिवर्तन से जूझने का वक्त

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आशुतोष चतुर्वेदी
प्रधान संपादक, प्रभात खबर
ashutosh.chaturvedi
@prabhatkhabar.in
पर्यावरण संरक्षण पूरी दुनिया के लिए एक चुनौती है. इसके कारण कभी सुखाड़ आता है, तो कभी बाढ़ का कहर झेलना पड़ता है. बिहार और झारखंड ने कुछ समय पहले गर्मी का सितम झेला और आजकल बाढ़ की विभीषिका झेल रहे हैं. जलवायु परिवर्तन के दंश को पूरे देश को झेलना पड़ रहा है.
इसके लिए हम-आप भी दोषी हैं. अपने देश में पर्यावरण की अनदेखी आम बात है. हम लगातार वनों को काटते जा रहे हैं और कंक्रीट के जंगल खड़े कर रहे हैं. अगर हम अपने आसपास देखें, तो पायेंगे कि नदियों के किनारों पर अवैध कब्जे हो रहे हैं और उसके आसपास इमारतें खड़ी की जा रही हैं. इससे नदियों के प्रवाह में दिक्कतें आती हैं और ज्यादा बारिश होने पर बाढ़ आ जाती है.
हाल में संपन्न हुए संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन में जलवायु परिवर्तन पर भी चर्चा हुई, लेकिन यह विमर्श बहुत सुर्खियां नहीं बटोर सका. सम्मेलन में 16 साल की ग्रेटा थनबर्ग अपने भाषण से सबसे अधिक चर्चा में रहीं. संयुक्त राष्ट्र में उन्होंने दुनिया के सभी बड़े नेताओं को पर्यावरण चिंताओं से स्पष्ट शब्दों में आगाह किया.
स्वीडन की यह बेटी जलवायु परिवर्तन से उत्पन्न खतरों को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लगातार अपनी आवाज बुलंद करती आ रही है. ग्रेटा थनबर्ग ने दुनिया के ताकतवर देशों के नेताओं पर जम कर अपने गुस्से का इजहार किया. ग्रेटा ने कहा- आप पैसों के लिए पर्यावरण से सौदा कर रहे हैं.
आपने हमारे सपने, हमारा बचपन अपने खोखले शब्दों से छीन लिया है. हालांकि,मैं अब भी भाग्यशाली हूं, लेकिन अनेक लोग इसकी मार झेल रहे हैं, मर रहे हैं, पूरा पर्यावरण तंत्र बर्बाद हो रहा है. आपने हमारी उम्मीदों पर पानी फेर दिया है.
युवा मानने लगे हैं कि आपने हमें छला है, जबकि हम युवाओं की उम्मीदें आप लोगों पर हैं. अगर आपने हमें फिर निराश किया, तो हम आपको कभी माफ नहीं करेंगे. हमारे अस्तित्व पर संकट है और आप धन और आर्थिक विकास की काल्पनिक कथाओं के बारे में बातें कर रहे हैं. आप इतना दुस्साहस कैसे कर लेते हैं? अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ग्रेटा के उस वीडियो को ट्वीट किया, जिसमें वह आंसुओं से भरी हुईं थीं और गुस्से में भाषण दे रही थीं. इस पर ट्रंप ने व्यंग्यात्मक लहजे में लिखा कि एक खुश दिखने वाली लड़की उज्ज्वल भविष्य की तरफ देख रही है.
देखकर खुशी हुई. इस ट्वीट को लेकर अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप की खासी लानत-मलानत हुई. संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन से एक वीडियो भी सामने आया, जिसमें ग्रेटा बाहर हॉल में खड़ी थीं और सामने से ही डोनाल्ड ट्रंप निकल रहे हैं. इस दौरान ग्रेटा ट्रंप को गुस्से में घूरती नजर आ रही हैं. यह पहला अवसर नहीं है, जब ग्रेटा ने पर्यावरण को लेकर आवाज उठायी हो. अपने विरोध के कारण ग्रेटा दुनिया भर में चर्चा में हैं.
वह 2018 से हर शुक्रवार को स्कूल छोड़ कर जलवायु परिवर्तन के मुद्दे को उठाती आ रही हैं. ग्रेटा ने स्वीडन की संसद के बाहर प्रदर्शन भी किया था. उन्होंने 2018 में पोलैंड में आयोजित जलवायु परिवर्तन सम्मेलन को भी संबोधित किया था और वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम में भी भाषण दिया है. उन्होंने अमेरिका, ब्रिटेन, इटली अौर यूरोपीयन संसद में भी अपनी बात रखी है.
आपको याद होगा कि पिछली सर्दियों में जम्मू-कश्मीर, हिमाचल और उत्तराखंड में पुराने सारे रिकॉर्ड टूटे थे. उन पहाडी इलाकों में भी बर्फबारी हुई थी, जहां पिछले एक दशक से बर्फ नहीं गिरी थी. दक्षिण और पश्चिम भारत तक सर्दी नहीं पहुंचती थी, लेकिन सर्दी ने वहां तक मार कर दी थी. केवल भारत ही नहीं, आधी से ज्यादा दुनिया ने भीषण सर्दी की मार झेली थी.
अमेरिका के कई शहरों में तो तापमान शून्य से 30 से 40 डिग्री तक नीचे चला गया था. मौसम के कहर को देखते हुए अमेरिका के कई हिस्सों में आपातस्थिति घोषित करनी पड़ी थी. चीन की राजधानी पेइचिंग में सारे स्कूल बंद कर करने पड़े थे. दक्षिण कोरिया की राजधानी सियोल में भारी बर्फबारी के कारण हवाई अड्डे को बंद कर देना पड़ा था.
मौसम वैज्ञानिकों ने इस वैश्विक शीतलहर को जलवायु परिवर्तन का नतीजा माना था. उन्होंने चेतावनी दी थी कि आगामी वर्षों में ऐसे परिस्थितियों का और सामना करना पड़ सकता है. इसके पहले पूरे यूरोप को भारी गर्मी का सामना करना पड़ा था. कुछ समय पहले नासा की ओर से एक चेतावनी सामने आयी थी कि जलवायु परिवर्तन के कारण पृथ्वी का तापमान लगातार बढ़ रहा है.
सन 1880के बाद से धरती की सतह का औसत तापमान तकरीबन एक डिग्री सेल्सियस तक बढ़ गया है. नासा का कहना है कि यह गर्मी कॉर्बन डाइऑक्साइड के उत्सर्जन, ग्रीनहाउस गैसों और पर्यावरण के साथ छेड़छाड़ के कारण उत्पन्न हुई है. जंगलों की अंधाधुंध कटाई ने इस समस्या को गंभीर कर दिया है. जो कार्बन डाइऑक्साइड पेड़ पौधे सोख लेते थे, वह अब वातावरण में घुल रही है.
दूसरी ओर ब्रिटिश मौसम वैज्ञानियों ने चेताया है कि अगले पांच साल पिछले 150 वर्षों के मुकाबले सर्वाधिक गर्म रहने वाले हैं. तापमान बढ़ने का सीधा असर खेती-किसानी पर पड़ेगा और पैदावार कम हो जायेगी. कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि एक डिग्री तापमान बढ़ने से पैदावार में 3 से 7 फीसदी की कमी आ जाती है.
भारत में पर्यावरण को लेकर एक बड़ा खतरा पॉलिथीन और प्लास्टिक से भी है. बिहार, झारखंड समेत कई राज्यों में पॉलिथीन पर प्रतिबंध है और दो अक्तूबर से देशभर में एक बार इस्तेमाल होने वाली प्लास्टिक पर प्रतिबंध लगने जा रहा है.
सामान्य-सी दिखने वाली पॉलिथीन और प्लास्टिक हम सबके जी का जंजाल बन गयी है. यह पूरे पर्यावरण के लिए बेहद खतरनाक है और इसमें वह जहर घोल रही है. इंसान, जानवर और पेड़ पौधों- इसने किसी को नहीं छोड़ा है. प्रकृति के लिए यह अत्यंत घातक है. माना जाता है कि प्लास्टिक अजर-अमर है और इसको नष्ट होने में एक हजार साल लग जाते हैं.
इसके नुकसान की लंबी चौड़ी सूची है. जलाने पर यह ऐसी गैसें छोड़ती हैं, जो जानलेवा होती हैं. यह जल चक्र में बाधक बनकर बारिश को प्रभावित करती है. नदी नालों को अवरुद्ध करती है. खेती की उर्वरा शक्ति को प्रभावित करती है. हम लोग अक्सर खाने की वस्तुएं प्लास्टिक में रख लेते हैं, जिससे कैंसर हो‌ने की आशंका बढ़ जाती है.
पर्यावरण को बचाना एक सामूहिक जिम्मेदारी है. यह जान लीजिए कि जब तक लोग पर्यावरण के प्रति चेतन नहीं होंगे, तब तक कोई उपाय कारगर साबित नहीं होने वाला है. पर्यावरण का मसला सीधे तौर से खाद्य सुरक्षा से भी जुड़ा है. इसलिए इसकी अनदेखी की भारी कीमत चुकानी पड़ सकती है.
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