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चुनाव में बढ़ता धन का दबदबा

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नवीन जोशी
वरिष्ठ पत्रकार
-avee-gjoshi@gmail.com
बेहिसाब चुनाव खर्चों के इस दौर में एक पार्टी से दूसरी पार्टी को मिली 10-15 करोड़ रुपये की रकम ‘नैतिक विवाद’ का मुद्दा बन जाये, तो घोर आश्चर्य ही कहा जायेगा.
आम चुनाव में अरबों-खरबों रुपये व्यय करनेवाले हमारे राजनीतिक दलों के लिए यह रकम कुछ भी नहीं, लेकिन दो वाम दलों- माकपा और भाकपा, को पिछले आम चुनाव में अपने सहयोगी दल द्रमुक से मिली 10-15 करोड़ रुपये की रकम पर सफाई देनी पड़ रही है. उनके सामने समस्या यह भी आन खड़ी है कि वह अपने काडर यानी कार्यकर्ताओं को यह रकम स्वीकार करने का नैतिक औचित्य कैसे समझाये.
कुछ माह पहले हुए लोकसभा चुनाव में तमिलनाडु में भाकपा और माकपा का द्रमुक से चुनावी समझौता था. इस गठबंधन से दोनों ही पार्टियों को लोकसभा की दो-दो सीटें जीतने में सफलता मिली. चुनाव आयोग को दिये गये द्रमुक के चुनाव खर्च के ब्योरे से पता चला है कि उसने भाकपा को 15 करोड़ और माकपा को 10 करोड़ रुपये दिये थे. मूल्यविहीन राजनीति के इस दौर में दोनों वाम दलों को इस बारे में स्पष्टीकरण जारी करना पड़ा है कि इस लेन-देन में कुछ भी गोपनीय और गैर-कानूनी नहीं है. यह रकम बैंक खातों में सीधे जमा की गयी है, आदि.
कोई और पार्टी शायद ही ऐसे राजनीतिक चंदे पर सफाई देना आवश्यक समझती हो. भाजपा और कांग्रेस समेत कई क्षेत्रीय दल औद्योगिक घरानों से बड़ी-बड़ी रकम चंदे के रूप में पाते रहे हैं. विदेशों से चंदा लेने पर पहले कभी रोक थी, लेकिन अब तो खुली छूट है. बल्कि, इस चंदे को जग-जाहिर करना भी जरूरी नहीं है.
ऐसे में वाम दलों को द्रमुक से मिली इस रकम पर विवाद से अधिक सफाई देना चौंकाता है. इसका कारण यह है कि वाम दलों ने राजनीतिक हाशिये पर जाने के बावजूद कुछ मूल्य बचा रखे हैं. प्रकट रूप में वे आज भी अपने प्रत्याशियों का चुनाव खर्च जनता और ‘शुभचिंतकों’ के सहयोग से पूरा करते हैं. पूंजीपतियों से किसी भी तरह का चंदा लेना उनकी नीतियों के विरुद्ध है, यद्यपि कई बार वे ‘उनके शुभचिंतकों’ में शामिल हो सकते हैं. इस पर कभी बड़ा विवाद सामने नहीं आया.
तमिलनाडु में द्रमुक से रकम लेने के बारे में दोनों दलों की सफाई यह है कि चूंकि हमारा द्रमुक से चुनावी तालमेल था, इसलिए हमारे प्रत्याशियों के प्रचार के लिए उनके बड़े नेता भी आये. उन बड़े द्रमुक नेताओं की ‘हाई-प्रोफाइल रैलियों’ के लिए ही द्रमुक ने यह धन दिया और इसे द्रमुक के स्थानीय नेताओं ने ही खर्च भी किया.
यहां हमारा मंतव्य वाम दलों के स्पष्टीकरण के विस्तार में जाने की बजाय इस बहाने चुनाव-खर्च और उसके लगातार बढ़ते दबदबे पर चर्चा करना है.
मुख्य निर्वाचन आयोग के रूप में शेषन के कार्यकाल से चुनाव-प्रचार संबंधी कानूनों पर कड़ाई से अमल किये जाने के बावजूद कई माध्यमों से बेहिसाब धन खर्च करके चुनाव को प्रभावित करना जारी है. अकूत धन खर्च करके पार्टियां और प्रत्याशी ऐसा माहौल रच देते हैं, जैसे वे ही विजयी होनेवाले हैं. इस कारण ऐसे मतदाता प्रभावित हो जाते हैं, जिनके मत पूर्व-निर्धारित नहीं होते.
अच्छे और योग्य प्रत्याशी धनाभाव के कारण चुनाव जीतना तो दूर, चुनाव मैदान में अपनी प्रभावी उपस्थिति तक दर्ज़ नहीं करा पाते. मुख्यधारा के मीडिया से लेकर सोशल मीडिया तक की चर्चाओं में धन-बली प्रत्याशियों का ही दबदबा दिखता है. यह तथ्य लोकतंत्र की मूल भावना के विपरीत है. लोकतांत्रिक चुनाव का सिद्धांत यह है कि धन-बली प्रत्याशी हो या अत्यंत गरीब, जनता के समक्ष अपनी उम्मीदवारी साबित करने के लिए उसे बराबर के अवसर मिलने चाहिए. व्यवहार में ऐसा कतई नहीं होता. ऐसा हो सके, इसीलिए चुनाव खर्च की सीमाएं तय की गयी हैं.
निर्वाचन आयोग ने अलग-अलग चुनावों के लिए प्रचार-व्यय की जो सीमाएं तय की हैं, अब वे भी इतनी बड़ी हो गयी हैं कि आम प्रत्याशी के लिए उतनी रकम की व्यवस्था करना संभव नहीं हो पाता. दूसरी तरफ, बड़े दलों के अमीर प्रत्याशी निर्धारित सीमा से कई गुणा अधिक खर्च करते हैं. स्वतंत्रता के एक दशक तक के चुनावों में ऐसे कई उदाहरण हैं, जब अत्यल्प धन व्यय करके गरीब किंतु ईमानदार प्रत्याशियों ने चुनाव जीते. अब ये किस्से परी लोक की कहानियों जैसे लगते हैं.
वाम-दलों के स्पष्टीकरण से एक और कटु सत्य उजागर होता है. राजनीतिक दलों के बड़े नेताओं की चुनावी रैलियां ‘असाधारण’ बनायी जाती हैं.
भाकपा-माकपा का कहना है कि उनके प्रत्याशियों के प्रचार के लिए आनेवाले द्रमुक के बड़े नेताओं की ‘हाई-प्रोफाइल’ रैलियों के लिए ही उन्हें वह रकम दी गयी थी. यानी, वाम दलों की सामान्य रैलियों में अाना द्रमुक के हाई-प्रोफाइल नेताओं की शान के विरुद्ध था. यह तथ्य द्रमुक से ज्यादा भाजपा-कांग्रेस पर लागू होता है. नरेंद्र मोदी, अमित शाह, सोनिया और राहुल की चुनावी रैलियां उनकी प्रतिष्ठा से जोड़ी जाती हैं. इसी कारण अकूत धन खर्च कर उनका आयोजन भव्य किया जाता है.
हाई-प्रोफाइल नेताओं की चुनावी रैलियां किसी कारण भव्य नहीं हो पातीं, तो ऐन मौके पर उन्हें रद्द किया जाना भी यही बताता है. बड़े नेता नुक्कड़ सभाएं नहीं करते.
उन्हें रैली नहीं, ‘महारैली’ को ही संबोधित करना होता है. यानी चुनाव-प्रचार जनता को अपने मुद्दे समझाने का नहीं, अपनी प्रतिष्ठा, दम-खम और चकाचौंध दिखाने का होता है. इसीलिए हमारे यहां चुनाव अब प्रदर्शन बन कर रह गये हैं. प्रदर्शन के लिए धन चाहिए. जितना अधिक धन, उतना बड़ा और बढ़िया प्रदर्शन.
चुनावी चंदे का अपना अर्थशास्त्र है. यह कोई छुपी बात नहीं है कि बड़े कॉरपोरेट या औद्योगिक घराने चुनावी चंदे के रूप में ऐसे ही दांव लगाते हैं, जैसे रेस के घोड़ों पर. दान का प्रतिदान अपेक्षित होता है. यही बात चुनाव जीतने के लिए सब कुछ झोंक देनेवाले प्रत्याशियों के लिए भी कही जा सकती है. मंत्री बनने का एक प्रस्ताव ही दल-बदल कराने का चारा और क्यों बनता है?
धन-तंत्र से प्रभावित चुनाव से बचने के लिए ही सरकारी व्यय पर चुनाव कराने का महत्वपूर्ण सुझाव बहुत पहले दिया गया था, जिस पर आज तक गंभीरता से विचार नहीं किया गया.
क्या कारण है कि पूरे देश में एक साथ सभी चुनाव कराने पर तो खूब हो-हल्ला किया जा रहा है, लेकिन चुनाव सुधार के बेहद महत्वपूर्ण सुझावों पर कोई बात नहीं हो रही? भाकपा-माकपा को द्रमुक से मिले धन पर विवाद को इस विमर्श के लिए देखा जाये तो ठीक, वर्ना यह भी कोई मुद्दा है भला.
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