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Home Opinion जिस हवा में हम सांस लेते हैं

जिस हवा में हम सांस लेते हैं

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मिथिलेश कु. राय
युवा कवि
mithileshray82@gmail.com
कक्का कह रहे थे कि कल वे फोन पर अपनी सलहज से बातें कर रहे थे. जब उन्होंने उनसे कहा कि कुछ दिनों के लिए साले साहब को साथ लेकर यहां घूमने आ जाइये.
उधर से बड़ी रुआंसी आवाज आयी कि कैसे आऊं. आपके साले साहब की तबीयत ठीक नहीं रहती. वे अब कहीं आने-जाने के बारे में सोचते तक नहीं. मेरी तबीयत को भी पता नहीं किसकी नजर लग जाती है. फिर कक्का यह बताने लगे कि इधर उन्होंने फोन से अपने कई रिश्तेदारों की खोज-खबर ली है.
उन्हें इस बात से काफी दुख हो रहा था कि अधिकतर रिश्तेदारों ने अस्वस्थ होने की बात कही और बड़े सहज तरीके से कहा कि अब तो दवाई के सहारे ही जिंदगी कट रही है.
कक्का यह सब देखकर दुखी थे. उन्हें कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि आखिर ऐसा हो क्यों रहा है. क्यों बीमार होने की प्रवृत्ति लगातार बढ़ती ही जा रही है.
क्या कारण है कि शिशु कोख में ही किसी बीमारी से ग्रस्त हो जाते हैं और जन्म लेते ही उनका उपचार शुरू हो जाता है. वे मुझसे पूछ रहे थे कि डॉक्टर और दवाई का व्यवसाय दिनों-दिन चमकता ही क्यों जा रहा है. क्यों किसी की बीमारी तुरंत पकड़ में नहीं आती. क्यों लोग एक डॉक्टर से दूसरे डॉक्टर के पास भटकते रहते हैं. अस्पताल को लूट का अड्डा कहनेवाले लोग भी क्यों बार-बार उधर की ही राह पकड़ लेते हैं. मैं इन प्रश्नों का भला क्या जवाब देता?
कक्का कह रहे थे कि कोई भी बीमारी अचानक नहीं होती. वह हमारे शरीर में धीरे-धीरे प्रवेश करती है और हमारा शरीर उसे ठीक समय पर मात नहीं दे पाता है. फिर एक दिन पूरा दबोचकर वह हमें चित्त कर देता है. शारीरिक कमजोरी का संबंध भोजन-पानी से होता है. एक तो धरती अब अपनी मूल प्रकृति में जी नहीं रही है. इसकी क्षमता में लगातार ह्रास हो रही है.
कक्का ने उदाहरण देकर समझाया कि अगर हम एक एकड़ में किसी फसल को बोयें और रासायनिक उर्वरक का इस्तेमाल न करें, तो बमुश्किल ही अन्न के दाने उपजने के आसार नजर आयेंगे. इससे साबित होता है कि धरती की अपनी उर्वरा-शक्ति लगभग खत्म हो गयी है. अब जो कुछ भी उपज रहा है, वह रासायनिक उर्वरक की बदौलत उपज रहा है.
कक्का को अपने बुजुर्गों के बारे में यह याद आया कि वे सब लंबे समय तक जीवित रहते थे और सेहतमंद भी रहते थे. उन्होंने एक गहरी सांस ली और यह कहा कि अब हमारा अन्न इतना दूषित हो गया है कि यह हमें अंदर से लगातार खोखला कर रहा है. जिस अन्न को हम खाते हैं और जिस पानी से अपनी प्यास बुझाते हैं, अगर वही शुद्ध न रहे तो वे हमारे शरीर को किस तरह से बल दे सकता है.
भले ही ये सब हमारे शरीर को काम चलाने लायक ऊर्जा दे दें, लेकिन इनमें मौजूद रसायन और प्रदूषण शरीर को अंदर से खोखला करने के काम में लगे रहते हैं और हमें बीमार बनाकर जीवन को डॉक्टर और दवाई के हवाले कर देते हैं. कक्का यह भी कह रहे थे कि डॉक्टर और दवाई स्थायी समाधान नहीं हो सकते. लेकिन जो स्थायी समाधान हो सकते हैं, क्या मनुष्य उस ओर गंभीर प्रयास करेगा?
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