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राहतों का सिलसिला

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वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण द्वारा की जा रहीं लगातार घोषणाएं इंगित करती हैं कि अर्थव्यवस्था को गति देना सरकार की शीर्ष प्राथमिकता है.तीसरे चरण में घोषित उपाय विशेष रूप से उन क्षेत्रों के लिए लक्षित हैं, जो बेहद दबाव में है. रियल इस्टेट की अधूरी पड़ी योजनाओं के लिए सरकार ने 10 हजार करोड़ रुपये देने का निर्णय किया है. इतनी ही राशि निवेशकों की ओर से भी उपलब्ध करायी जायेगी. आवास परियोजनाओं को पूरा करने की दिशा में यह प्रभावी प्रारंभिक पहल है.
हालांकि इस मदद से गैर-निष्पादित परिसंपत्तियों के बोझ से दबी और दिवालिया-संबंधी कार्रवाई का सामना कर रही कंपनियों को बाहर रखा गया है, पर विशेषज्ञों का अनुमान है कि बैंकों के साथ बैठक के बाद सरकार रियल इस्टेट में सहयोग बढ़ा सकती है. आर्थिक गतिविधियों को बढ़ाने में निर्यात की अहम भूमिका होती है.
इस क्षेत्र में सरकार 68 हजार करोड़ रुपये तक उपलब्ध करायेगी और धन की आवाजाही को सुचारु बनाने के लिए निर्यात वित्त पर साप्ताहिक निगरानी होगी. इस पहल में छोटे व मंझोले उद्यमों का ध्यान रखा गया है. ये उद्यम निर्यात में योगदान देकर रोजगार और आमदनी को बढ़ाने में बहुत सहयोग कर सकते हैं. विश्व व्यापार संगठन में किसी तरह की चुनौती से बचने के लिए निर्यात बढ़ाने के तरीकों को खास तरह से तय किया गया है. सरकारी कर्मचारियों के लिए घर बनाने के ऋण पर ब्याज दर घटाने, अगले साल तक चार बड़े शहरों में सालाना खरीदारी महोत्सव आयोजित करने, इस महीने के अंत तक निर्यातकों को वस्तु एवं सेवा कर लौटाने जैसे उपाय भी उत्साहवर्धक हैं.
अगस्त में वित्त मंत्री सीतारमण ने दो चरणों में राहतों की घोषणा की थी. पहले चरण में विदेशी निवेशकों से अधिशेष और स्टार्टअप निवेशकों से कर हटाने तथा बैंकों को 70 हजार करोड़ की नकदी देने की पहल हुई थी. दूसरे चरण में विभिन्न बैंकों के परस्पर विलय का निर्णय लिया गया था. इससे उनके प्रबंधन और संचालन को बेहतर बनाया जा सकता है. इन उपायों के साथ पिछले महीने प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के नियमों में भी बड़े बदलाव किये गये हैं.
हालांकि इन उपायों से अर्थव्यवस्था में सुधार की आशा है और अनेक उपाय वर्तमान स्थिति को संभालने के उद्देश्य से हो रहे हैं, लेकिन इन्हें आर्थिक परिवेश में पारदर्शिता लाने और भविष्य के लिए ठोस आधार मुहैया कराने की सरकार के निरंतर प्रयासों की कड़ी में भी देखा जाना चाहिए. इन प्रयासों का ही परिणाम है कि अनेक घरेलू और अंतरराष्ट्रीय कारकों से प्रभावित अर्थव्यवस्था पटरी पर बनी हुई है.
वित्तीय गतिविधियों में अनुशासन बढ़ा है और कराधान का अनुपालन बेहतर हुआ है. बैंकों के ऊपर से फंसे कर्जों का दबाव कम हुआ है तथा मुद्रास्फीति नियंत्रण में है. यह भी ध्यान रखा जाना चाहिए कि संरचनात्मक बदलाव के असर कुछ देर के बाद ही सामने आते हैं. उम्मीद की जानी चाहिए कि हालिया दिनों में विभिन्न आर्थिक क्षेत्रों को राहत देने और सुधार करने का सिलसिला जारी रहेगा.
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