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Home Opinion आखिर कब तक मुंह नहीं खोलेंगे?

आखिर कब तक मुंह नहीं खोलेंगे?

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।। सत्य प्रकाश चौधरी ।।

प्रभात खबर, रांची

जैसे पपीहा स्वाती की बूंद का इंतजार करता है, वैसे ही जनता प्रधानमंत्री जी का मुंह खुलने का इंतजार कर रही है. लेकिन मुंह है कि मानता नहीं. चुनाव से पहले बंद होने को राजी नहीं था और अब खुलने को तैयार नहीं है.भक्त पुकार रहे हैं, पर प्रभु का मौन टूट नहीं रहा. प्रभु कहां हो? इस महंगाई का संहार करो, दंगों का नाश करो, पाकिस्तानी गोलीबारी और चीनी घुसपैठ रोको, मुंह में रोटी ठूंसनेवालों को दंड दो.. की पुकार चहुंओर गूंज रही है, पर प्रभु मौन हैं. यकीनन उनके कानों में तेल नहीं पड़ा है.

और फिर, वह तो अंतर्यामी हैं. उनके जासूसी उपकरण घर से लेकर घाट तक की पल-पल की खबर उन्हें दे रहे हैं. कुछ लोगों ने गुनगुनाना भी शुरू कर दिया है, दो जासूस करें महसूस कि दुनिया बड़ी खराब है.. और जब दुनिया इतनी खराब हो, तो बोलने से क्या फायदा! भक्त हजारों सालों से प्रभुओं की अगर, कपूर, बाती से आरती उतार रहे हैं, तो क्या वे बोलने लगे? फिर ऐसी उम्मीद प्रधानमंत्री जी से क्यों?

प्रभु करें तो क्या करें, भक्तों को ज्यादा भाव दे दो, तो सिर पर चढ़ जाते हैं.. टुच्चे कहीं के! बताइए, प्रधानमंत्री से टमाटर, आलू, प्याज की बात कर रहे हैं.. शर्म नहीं आती इन्हें! सचमुच, इन आम आदमी टाइप लोगों को मुंह लगा लेने पर बड़ी दुश्वारी है. ठीक है, वोट दिया है, तो क्या प्रधानमंत्री के सिर पर चढ़ जाओगे! और फिर, यह क्यों भूल जाते हो कि तुमने राजनीतिक सोच से नहीं, भक्ति-भाव से वोट दिया है.

अब चुनाव बाद भी भक्ति-भाव बनाये रखो. सच्च भक्त कभी अपने प्रभु पर शक नहीं करता, अपने भक्ति-भाव में फर्क नहीं आने देता. जिन भक्तों के मन में प्रभु के प्रति संशय आया है और अच्छे दिनों को लेकर संदेह पैदा हुआ है, उन्हें प्रायश्चित करना चाहिए. गाय का गोबर और बालू खा कर.

खैर, प्रधानमंत्री जी के मौन का एक और पहलू है. भक्त जहां सन्नाटे में हैं, वहीं विरोधियों की बांछें खिली हुई हैं. विरोधियों का दावा है कि यह प्रधानमंत्री जी का मौन ही है, जिसकी वजह से उत्तराखंड के उपचुनाव में तीनों सीटें उनकी पार्टी हार गयी. कहा जाता है कि जब मिन्नत करने पर भी कोई न बोले, तो उसे गुस्सा दिलाओ. आपने उस कछुए की कहानी पढ़ी होगी जो सूखे से बचने के लिए तालाब से नदी में जा रहा था. उसके दो हंस दोस्त थे.

उन्होंने लकड़ी चोंच में दबायी. लकड़ी को मुंह से पकड़ कर कछुआ लटक गया और हंस नदी की ओर उड़ पड़े. इस आसमानी दृश्य को लोग चकित होकर देख रहे थे. तभी किसी ने नीचे से गुस्सा दिलानेवाली टिप्पणी की. कछुए का धीरज जवाब दे गया और उसने जवाब देने के लिए मुंह खोला.

नतीजा यह हुआ कि वह नीचे गिर गया और गांववालों का भोजन बन गया है. प्रधानमंत्री जी को कुछ इसी तर्ज पर गुस्सा दिला रहे हैं पृथ्वीराज चव्हाण. उन्होंने उन्हें ‘मौनेंद्र’ कह कर संबोधित किया है. देखना है कि इस पर भी प्रधानमंत्री का मुंह खुलता है या नहीं?

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