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कर्ज सस्ते होने के आसार

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सतीश सिंह
आर्थिक विशेषज्ञ
singhsatish@sbi.co.in
मुख्य रूप से ईंधन की कीमत में गिरावट की वजह से जुलाई महीने में उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई) दर कम होकर 3.15 प्रतिशत हो गयी, जो जून महीने में 3.18 प्रतिशत थी. ऐसा प्रतीत हो रहा है कि भारतीय रिजर्व बैंक को पहले से अंदाजा था कि सीपीआई या खुदरा महंगाई दर में कमी आयेगी.
इसीलिए, केंद्रीय बैंक ने हालिया मौद्रिक समीक्षा में रेपो दर में कटौती की. माना जा रहा है कि आनेवाले महीनों में भी सीपीआई निचले स्तर पर बनी रहेगी. हालांकि, सीपीआई इस अवधि में 2.25 प्रतिशत से बढ़कर 2.36 प्रतिशत हुई है, लेकिन समग्र रूप से सीपीआई में गिरावट दर्ज की गयी है.
सब्जियों की महंगाई दर 4.66 प्रतिशत से कम होकर 3.82 प्रतिशत रह गयी है. अंडे की कीमत 1.62 प्रतिशत से घटकर 0.57 प्रतिशत हो गयी है, जबकि दलहन व इससे जुड़े उत्पादों की महंगाई दर 5.68 प्रतिशत से बढ़कर 6.82 प्रतिशत हो गयी है. मांसाहारी खाद्य पदार्थों जैसे, मांस और मछली की कीमत में भी बढ़ोतरी हुई है. यह 9.01 प्रतिशत से बढ़कर 9.05 प्रतिशत हो गयी है. कुछ राज्यों में आयी बाढ़ के कारण सब्जियों की कीमत बढ़ी हुई है. हालांकि, यह तात्कालिक कारण है, जो आगामी महीनों में दूर हो सकता है.
जुलाई महीने में ईंधन की कीमत जून महीने के 2.32 प्रतिशत से कम होकर 0.36 प्रतिशत हो गयी है. खाद्य और ईंधन के अलावा दूसरी वस्तुओं की महंगाई दर 4.3 प्रतिशत के मुकाबले बढ़कर 4.4 प्रतिशत हो गयी है.
स्वास्थ्य महंगाई में हाल के समय में कमी आयी है. यह जुलाई महीने में 8.22 प्रतिशत से कम होकर 7.88 प्रतिशत हो गयी है. शिक्षा महंगाई भी 6.79 प्रतिशत से कम होकर 6.36 प्रतिशत हो गयी है. हालांकि, मकान का किराया 4.84 प्रतिशत से बढ़कर अब 4.87 प्रतिशत हो गया है.
थोक मूल्य सूचकांक (डब्ल्यूपीआई) भी जुलाई महीने में 25 माह के निचले स्तर 1.08 प्रतिशत पर पहुंच गयी है, जो जून महीने में 2.02 प्रतिशत थी.
जानकारों के अनुसार, सुस्त आर्थिक गतिविधियों के कारण विनिर्मित वस्तुओं के दाम स्थिर बने रहे और ईंधन की कीमत में गिरावट दर्ज की गयी. थोक महंगाई कम होने की एक वजह सूचकांक में शामिल वस्तुएं भी हैं. सीपीआई में खाद्य वस्तुएं अहम भूमिका निभाती हैं, जिनका अधिभार 45 प्रतिशत से ज्यादा है, जबकि डब्ल्यूपीआई में इनका अधिभार 15 प्रतिशत है. विनिर्मित वस्तुओं की महंगाई दर जुलाई में कम होकर 0.34 प्रतिशत रह गयी, जो जून के महीने में 0.94 प्रतिशत थी.
विनिर्मित वस्तुओं की कीमतों में अक्तूबर 2018 के 4.6 प्रतिशत के बाद से लगातार गिरावट के बाद जुलाई 2019 में यह 0.3 प्रतिशत के स्तर पर पहुंच गयी. हालांकि, खाद्य पदार्थों की महंगाई दर अभी भी ज्यादा है.
जुलाई में यह कम होकर 6.15 प्रतिशत रह गयी है, जो जून महीने में 6.98 प्रतिशत थी. सब्जियों की महंगाई दर 24.76 प्रतिशत से कम होकर 10.67 प्रतिशत हो गयी है. ईंधन और बिजली की कीमत में गिरावट का प्रतिशत 2.2 से बढ़कर 3.64 हो गया है. पेट्रोल, डीजल और तरलीकृत पेट्रोलियम गैस की कीमतों में भी गिरावट दर्ज की गयी है.
वैश्विक वृद्धि के सुस्त रहने और अमेरिका और चीन के बीच चल रहे कारोबारी जंग के नहीं थमने से विश्व के देशों में कारोबारी जोखिम बने हुए हैं. इस वजह से विविध उत्पादों की कीमतें स्थिर हैं. प्राथमिक वस्तुएं, जैसे ईंधन और प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थ और अन्य संबंधित वस्तुओं की महंगाई दर जुलाई 2019 में गिरकर 33 महीने के निचले स्तर 0.2 प्रतिशत पर आ गयी है.
समग्र अग्रणी संकेतक (सीएलआई) जो 33 प्रमुख संकेतकों का समूह है, वित्त वर्ष 2020 की पहली तिमाही में, वृद्धि के मामले में यथास्थिति की प्रवृत्ति दिखा रहा है.
रिजर्व बैंक के अनुमान के विपरीत कयास यह लगाये जा रहे हैं कि जीडीपी वृद्धि दर वित्त वर्ष 2019 की चौथी तिमाही में 5.8 प्रतिशत और वित्त वर्ष 2020 की पहली तिमाही में ऑटोमोबाइल बिक्री में कमी, एयर ट्रैफिक मूवमेंट में मंदी, सरकारी खर्च में कमी आदि के कारण कम होकर यह 5.6 प्रतिशत रह जायेगी. इस तरह, चालू वित्त वर्ष में रिजर्व बैंक के ताजा अनुमान 6.9 प्रतिशत के विकास लक्ष्य को भी हासिल करना आसान नहीं होगा. वित्त वर्ष 2020 में जीडीपी वृद्धि दर 6.5 प्रतिशत के स्तर पर रह सकती है.
सीपीआई और डब्ल्यूपीआई में आयी गिरावट की वजह से केंद्रीय बैंक को अक्तूबर महीने में होनेवाली मौद्रिक समीक्षा में नीतिगत दर में कटौती करने की गुंजाइश मिल सकती है. इधर, चालू वित्त वर्ष की दूसरी तिमाही में महंगाई दर के 4 प्रतिशत के लक्ष्य से नीचे बने रहने की संभावना है.
आगामी दिनों में बाढ़ से निजात मिलने के बाद खुदरा महंगाई में और भी कमी आने की संभावना है. साथ ही, आगामी महीनों में वैश्विक स्तर पर कारोबारी तनाव खत्म होने के आसार दिख रहे हैं. ऐसे सकारात्मक माहौल में आगामी मौद्रिक समीक्षा में केंद्रीय बैंक रेपो दर में 25 आधार अंकों की कटौती कर सकता है, क्योंकि अर्थव्यवस्था में छायी मंदी को आर्थिक गतिविधियों में तेजी लाकर ही दूर किया जा सकता है.
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