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भूटान का अहम दौरा

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पड़ोसी देशों के साथ रिश्ते मजबूत करना प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की विदेश नीति का प्रमुख हिस्सा है. इसका संकेत 2014 में उनके शपथ-ग्रहण समारोह में सार्क देशों के नेताओं की मौजूदगी से ही मिल गया था. हालांकि, पाकिस्तान की भारत-विरोधी हरकतों और आतंकवाद-परस्ती के कारण सार्क निष्क्रिय हो चुका है, परंतु बिम्सटेक जैसे बहुपक्षीय मंच एवं द्विपक्षीय मेल-जोल के जरिये दक्षिण एशियाई देशों के साथ भारत की नजदीकी लगातार बढ़ रही है.

इसी पृष्ठभूमि में प्रधानमंत्री के दो-दिवसीय भूटान दौरे को देखा जाना चाहिए. हमारे पड़ोसी देशों में भूटान की स्थिति विशिष्ट है. भारत और चीन के साथ सीमाओं की साझेदारी के चलते इसका कूटनीतिक और रणनीतिक महत्व तो है ही, भारत एवं भूटान की सांस्कृतिक घनिष्ठता भी उल्लेखनीय आयाम है. द्विपक्षीय संबंधों को विस्तार देते हुए प्रधानमंत्री ने भूटान को ‘स्कूल से स्पेस तक’ यानी अध्ययन से अंतरिक्ष तक सहभागिता का नया अध्याय प्रारंभ किया है.

उन्होंने दक्षिण एशियाई अंतरिक्ष यान के केंद्र का उद्घाटन भी किया है. भारत को छोड़कर इस इलाके में किसी भी देश ने अंतरिक्ष अनुसंधान में कदम नहीं रखा है. प्रधानमंत्री मोदी ने बहुत पहले ही यह घोषणा कर दी थी कि भारत अपने पड़ोसी देशों को सैटेलाइट उपहार के रूप में देना चाहता है. अब यह इच्छा बहुत जल्दी ही साकार हो जायेगी.

इस यात्रा के दौरान हुए रुपे कार्ड, विमानन, अंतरिक्ष अनुसंधान, सूचना तकनीक, ऊर्जा और शिक्षा आदि से जुड़े 10 समझौतों से भूटान के विकास को नयी गति मिलने की आस बंधी है. प्रधानमंत्री की यात्रा के महत्व का अनुमान इस तथ्य से भी लगाया जा सकता है कि 27 घंटों में उन्होंने 13 कार्यक्रमों में भागीदारी की. देश के राजा, पूर्व राजा और विपक्षी नेता के साथ मिलने के अलावा उन्होंने भूटान के शाही विश्वविद्यालय के छात्रों को भी संबोधित किया.

राजधानी थिंपू में उनके स्वागत और विदाई के लिए प्रधानमंत्री लोतै शेरिंग का हवाई अड्डे पर आना दोनों नेताओं और देशों के बीच आत्मीयता को इंगित करता है. भारत हमेशा मानता रहा है कि शांति एवं सहयोग से ही दक्षिण एशिया में विकास और समृद्धि को सुनिश्चित किया जा सकता है. इसी आदर्श के तहत प्रधानमंत्री मोदी ने अपने पहले कार्यकाल में पाकिस्तान से भी संबंध सुधारने की अनेक पहलें की थीं. नेपाल, मालदीव और श्रीलंका के आंतरिक मामलों से स्वयं को बाहर रखते हुए भी इन देशों में राजनीतिक स्थिरता कायम करने में भारत ने काफी योगदान किया है.

बांग्लादेश के साथ जमीन की अदला-बदली और नदी जल बंटवारे जैसे गंभीर मसलों को बहुत सहजता से सुलझाया गया है. अब भूटान के साथ निकटता बढ़ने से एशिया के इस हिस्से में स्थिरता की संभावनाएं बढ़ गयी हैं. आशा है कि चीन और पाकिस्तान भी अतीत की रार छोड़कर भारत और अन्य देशों की आकांक्षाओं का सम्मान करते हुए दक्षिण एशिया और इससे परे शांति व विकास की यात्रा में सहभागिता करेंगे.

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