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Home Opinion प्रलेस के अंदर आकर बदलाव की सहभागी बनिए

प्रलेस के अंदर आकर बदलाव की सहभागी बनिए

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14 अगस्त, 2019 के ‘प्रभात खबर’ के संपादकीय पृष्ठ पर लेखिका एवं सामाजिक कार्यकर्ता नूर जहीर ने प्रगतिशील लेखक संघ के सोच में बदलाव के लिए उपयोगी सुझाव दिये हैं, पर पूरी टिप्पणी में जिस एक चीज का अभाव दिखा, वह है ईमानदारी का. नूर जी ने पदाधिकारी मंडल में महिलाओं के न होने, दलित साहित्य व विमर्श पर चर्चा न करने के कारण प्रलेस को रूढ़िवादी सोच में फंसा हुआ बताया है.
उन्हें पता ही नहीं है कि प्रलेस ने कैसे कोशिशें जारी रखी हैं और उसमें अब सफलता मिलनी भी शुरू हुई है. 2007 के उत्तरार्द्ध में रांची में हुई प्रलेस की राष्ट्रीय कार्यसमिति की बैठक में ये विचार किया गया कि दलित, आदिवासी लेखकों व संगठनों से कैसे जुड़ा जाए?
इसी को ध्यान में रखकर 2008 के गोदरगावां (बेगूसराय) के राष्ट्रीय सम्मेलन में एक पूरा सत्र भी रखा गया और वहां प्रतिनिधियों ने जो विचार रखे उसी के अनुरूप विभिन्न राज्य इकाइयों को आवश्यक संवाद स्थापित करने की जिम्मेदारी दी गई. हाल ही में झारखंड, बिहार, छत्तीसगढ़, असम सरीखे राज्यों में प्रलेस के जो सम्मेलन हुए, उसकी रपटों से उन्हें गुजरना चाहिए, तब वे सही तरीके से जान पाएंगी कि दलित, आदिवासी व स्त्री लेखकों के साथ हमारे कैसे संबंध हैं या वे कमिटी में कहां किस दायित्व का निर्वहन कर रहे हैं?
झारखंड प्रलेस की ओर से मैं निवेदन करना चाहूंगा कि हाल ही में संपन्न घाटशिला के राज्य सम्मेलन में रजिया जहीर के योगदान को अपनी सामर्थ्य के मुताबिक परखा गया. आदिवासी अस्मिता और संघर्ष के सत्र के सारे वक्ता आदिवासी थे, जिनमें तीन स्त्री वक्ता थीं और संचालन भी एक आदिवासी स्त्री कवयित्री ने ही किया. हमारे कार्यकारी अध्यक्ष भी आदिवासी लेखन के एक महत्वपूर्ण नाम महादेव टोप्पो जी हैं और हमारा मार्गदर्शन बखूबी कर रहे हैं.
बिहार में भी कार्यकारी अध्यक्ष एक महिला सुनीता गुप्ता हैं. अब इन्हें भी आप भूले-भटके ही करार देंगी! नूर जी आपसे विनम्र अनुरोध है कि आप प्रलेस के अंदर आइए और बदलाव की प्रक्रिया की भागीदार बनिए. बाहर रहकर उपदेश देने से यही संदेश जाता है कि हम परिवर्तन चाहते तो हैं पर जिम्मेवारी नहीं निभाएंगे.
मिथिलेश, महासचिव, झारखंड प्रगतिशील लेखक संघ
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