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पांचवीं-छठी अनुसूची का हो विस्तार

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डॉ अनुज लुगुन
सहायक प्रोफेसर, दक्षिण बिहार केंद्रीय विवि, गया

तीन घटनाएं बिल्कुल हाल की हैं- सोनभद्र में दस आदिवासियों की हत्या, छत्तीसगढ़ के बैलाडीला में आदिवासियों द्वारा अडानी के खनन परियोजना का विरोध, और, झारखंड के पूर्व डीजीपी द्वारा अपनी पत्नी के नाम पर फर्जी तरीके से जमीन की खरीदारी. ये तीनों घटनाएं देश के अलग-अलग हिस्सों की हैं, लेकिन इन घटनाओं की प्रवृत्ति लगभग एक ही है.
सोनभद्र में आदिवासियों के नरसंहार के पीछे जमीन का विवाद था. यह विवादित जमीन आदिवासियों को दी गयी थी, जिसे बाद में बिचौलियों और अधिकारियों ने बेच दिया था. इस हत्याकांड की तहों की पड़ताल करने पर दो बातें सामने आती हैं- एक, वहां अफसर, बिचौलियों और दबंग नेताओं के गठजोड़ के बिना यह संभव नहीं था और दूसरा, आदिवासियों को हमेशा की तरह कमजोर मान कर उन पर हमला किया गया.
छत्तीसगढ़ के बैलाडीला में आदिवासी अडानी की खनन परियोजना के खिलाफ आंदोलित हैं. संविधान की पांचवीं अनुसूची के अंतर्गत आने के कारण इस क्षेत्र में विकास संबंधी किसी भी परियोजना को स्थानीय ग्राम सभाओं से अनापत्ति प्रमाण पत्र लेना जरूरी होता है. पेसा अधिनियम, 1996 के द्वारा यह व्यवस्था की गयी है. आदिवासियों का आरोप है कि फर्जी अनापत्ति प्रमाण पत्र लेकर इस परियोजना को स्वीकृति दी गयी है. इसकी जांच चल रही है.
संवैधानिक प्रावधानों के उल्लंघन को कथित विकास के नाम पर जायज भी माना जाता है और आदिवासियों की जमीन की बात को उपेक्षित कर दिया जाता है. झारखंड के पूर्व डीजीपी ने अपनी पत्नी के नाम पर गैर-मजरुआ जमीन खरीदी है. इसमें उन्होंने बड़े अधिकारी होने के प्रभाव का पूरा इस्तेमाल किया है. ऐसी जमीन की खरीद-बिक्री नहीं की जा सकती है.
उपर्युक्त सभी घटनाओं की प्रकृति अलग-अलग है, लेकिन प्रवृत्ति एक ही है, यानी आदिवासियों की जमीन लूट में व्यक्ति, समुदाय, राज्य और उसकी मशीनरी सब शामिल हैं. पूर्व डीजीपी के जमीन घोटाले का मामला सीधे आदिवासी जमीन से नहीं जुड़ा है, लेकिन इससे यह साफ दिख रहा है कि आदिवासियों के लिए निर्देशित अनुसूचित क्षेत्रों में भी जमीन की गैर-कानूनी खरीद-फरोख्त खुलकर हो रही है.
झारखंड में जमीन का मुद्दा बहुत संवेदनशील है. राज्य सरकार आदिवासियों की जमीन की रक्षा के दावे करती है, लेकिन उसके ही शीर्ष अधिकारी बिचौलियों के साथ मिलीभगत कर उसकी ही जमीन पर सेंध लगाते हैं.
जब सरकार द्वार प्रतिबंधित जमीन की खुली लूट हो सकती है, तो भला आदिवासियों की जमीन कैसे बच सकती है? बैलाडीला का मामला तो आजादी के बाद से राज्य सत्ता द्वारा प्रायोजित आदिवासियों की जमीन लूट के सिलसिले का ताजा उदाहरण है.
अनुसूचित क्षेत्रों में या पेसा अधिनियम के क्षेत्र में जिलाधिकारी आदिवासी जमीन की देखरेख करते हैं. ग्राम सभा की सहमति के बाद जिलाधिकारी की अनुमति से ही विकास परियोजनाएं जमीन पर उतरती हैं. पर, इन क्षेत्रों में संबंधित अधिकारी आदिवासी ग्राम-सभा से बात करना ही उचित नहीं समझते.
यह इसलिए होता है कि सरकारों और नेताओं की चाहत कथित ‘विकास’ है और इसके लिए वे संविधान का लिहाज रखे बिना कॉर्पोरेट के साथ गठजोड़ कर लेते हैं. बैलाडीला माओवाद-प्रभावित क्षेत्र है. एक संसदीय समिति की रिपोर्ट में कहा गया था कि नक्सल आंदोलन के प्रसार का एक बहुत बड़ा कारण आदिवासी जमीन की लूट है.
इसके बावजूद राज्य मशीनरी खुद असंवैधानिक गतिविधियों में शामिल है. दूसरी ओर सोनभद्र की घटना ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि आदिवासी समाज मुख्यधारा के समाज के लिए आज भी मनुष्यता के दर्जे से नीचे है. इस सामुदायिक नरसंहार के पीछे दूसरे समुदायों के श्रेष्ठ और ताकतवर होने का बोध भी शामिल है.
उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में जहां आदिवासियों की उपस्थिति बिखरी हुई और कमतर है, उनकी स्थिति दयनीय है. आदिवासी यहां कोई राजनीतिक शक्ति भी नहीं हैं. इस तरह के प्रदेशों में पांचवीं एवं छठी अनुसूची और पेसा अधिनियम के नहीं होने के कारण आदिवासियों को मजबूत सुरक्षा नहीं मिल पाती है. यह दुर्भाग्यपूर्ण है. जरूरी है कि इन आदिवासी क्षेत्रों में भी उक्त अनुसूचियों का विस्तार किया जाये.
अमेरिकी आदिवासी रेड इंडियन समुदाय ने गोरों से कहा था कि तुम्हारे लिए यह धरती दुश्मन का इलाकाभर है, जिसे तुम जीत कर आगे बढ़ जाते हो. यही बात आज की वर्चस्वकारी दिकू मानसिकता की है. यह व्यक्तिगत और संस्थागत रूप से आदिवासियों की जमीन को लूटते हुए, उन्हें खत्म करते हुए कथित विकास की राह पर आगे बढ़ रही है. विडंबना यह है कि सर्वोच्च न्यायालय का एक फैसला भी अचानक आदिवासियों को उनकी जमीन से बेदखली का आदेश दे देता है.
आदिवासी समाज की नयी त्रासदी यह है कि अब उसी के बीच के अफसर, बिचौलिये और नेता भी इस लूट में शामिल हो चुके हैं. जब सत्ता तंत्र के शीर्ष पर बैठे लोग ही भ्रष्ट हों और लूट पर आमादा हों, तो भला निरीह जनता की क्या बिसात? औपनिवेशिक काल से चला आ रहा आदिवासी जमीन की लूट का सिलसिला आज भी लगातार जारी है. यह समानता के विमर्श को निरंतर ध्वस्त कर रहा है.
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