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Home Opinion आरटीआइ पर चिंता के मायने

आरटीआइ पर चिंता के मायने

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पवन के वर्मा
लेखक एवं पूर्व प्रशासक
pavankvarma1953@gmail.com
सूचना का अधिकार अधिनियम (आरटीआइ एक्ट) 2005 में पारित हुआ और उसी वर्ष अक्तूबर में लागू हुआ था. देश के विधिक इतिहास में यह एक मीलस्तंभ जैसा था, जिसने पहली बार नागरिकों को भी इस हेतु अधिकृत किया कि वे सरकारी प्राधिकारियों से अहम सूचनाएं पा सकें. अब कोई भी सरकारी निकाय किसी ऐसी सूचना को छिपा नहीं सकता, जो उचित रूप में सार्वजनिक जानकारी में होनी चाहिए. यह श्रेय इस विधेयक का है कि इसने सरकारी कामकाज को पर्दे के पीछे स्थित बाबुओं तथा अपारदर्शी निर्णय प्रक्रिया से निकाल उसे नागरिकों की नजरों में ला दिया. इस अर्थ में इस कानून ने नागरिकों के हकों की रक्षा की.
निस्संदेह इस कानून ने सरकार से नागरिकों तक सूचनाओं के प्रवाह का पूरा परिदृश्य ही बदल दिया. यह एक तथ्य है कि इस विधेयक के असर को भारी कामयाबी भी मिली. प्रति दिन लगभग पांच हजार आरटीआइ अर्जियां दायर की जाती हैं और नौकरशाह एवं राजनेता इस सत्य से सजग रहते हैं कि कुछ अपवादों को छोड़ कर उनके विभाग की तकरीबन सारी सूचनाएं सार्वजनिक पड़ताल हेतु उपलब्ध हैं.
यह भी एक अहम तथ्य है कि सिर्फ सरकार ही नहीं, बल्कि सार्वजनिक सुविधा प्रदान करनेवाली निजी कंपनियों के अलावा वैसे एनजीओ भी इस अधिनियम के दायरे में हैं, जिनकी अवसंरचना निधि का 95 प्रतिशत सरकार से प्राप्त होता है.
यह अधिनियम शुरू से ही सुचारु ढंग से काम कर रहा है और इसने सामान्य जनता को सार्वजनिक प्राधिकारियों से उनका हक दिलाने के अलावा, सरकारी भ्रष्टाचार तथा प्रशासनिक अकुशलता भी उजागर की है.
इसके ऐसे इतिहास के बावजूद यदि वर्तमान केंद्रीय सरकार ने इस अधिनियम को संशोधित किया है, तो सवाल उठता है कि इसकी वजह क्या है, क्योंकि इसी कानून के दम पर भाजपा ने पूर्ववर्ती यूपीए सरकार के तथाकथित भ्रष्टाचारों को सामने लाने की कोशिश की थी. दरअसल, जो चीज किसी एक के लिए असुविधाजनक है, उससे दूजे को भी असुविधा हो सकती है. इसलिए, कई बार ऐसा भी हुआ है कि इस अधिनियम के अंतर्गत चाही और हासिल की गयी सूचनाएं एनडीए सरकार के गले में हड्डी साबित हुई है.
मसलन, एक आरटीआइ प्रश्न से ही यह पता चला था कि आरबीआइ के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन ने कर्ज न चुकानेवालों की एक सूची सरकार को सौंपी थी. इसी तरह, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की शैक्षिक योग्यता, नोटबंदी के प्रस्ताव से आरबीआइ की सहमति तथा काले धन की अब तक उजागर की गयी रकम से संबद्ध सवालों पर भी सरकार को शर्मिंदगी का सामना करना पड़ा.
इसके बाद भी इस अधिनियम की कार्यप्रणाली और स्वायत्तता को कमजोर करनेवाली किसी भी कोशिश को निश्चित तौर पर एक प्रतिगामी तथा नागरिकों के हितों के विरुद्ध कदम माना जाना चाहिए.
क्या सरकार द्वारा किया गया नवीनतम संशोधन एक ऐसा ही कदम कहा जा सकता है? इसका उत्तर देने के निमित्त हमें इस पर विचार करना चाहिए कि ये संशोधन आखिर हैं क्या? आरटीआइ अधिनियम, 2005 कहता है कि केंद्रीय तथा राज्य सूचना आयुक्तों का कार्यकाल पांच वर्षों अथवा उनकी 65 वर्षीय उम्र तक, जो भी पहले हो, निश्चित किया जायेगा.
इसमें यह भी कहा गया है कि मुख्य सूचना आयुक्त (सीआइसी) का वेतन मुख्य निर्वाचन आयुक्त (सीइसी) के समान तथा सूचना आयुक्तों (आइसी) का वेतन निर्वाचन आयुक्तों के वेतन के बराबर होगा, मगर यह संशोधित अधिनियम कहता है कि इनका कार्यकाल तथा वेतन मामलों के आधार पर तय किये जायेंगे.
एक स्तर पर ऐसे संशोधन को ऐसा ‘तकनीकी’ परिवर्तन बता कर महत्वहीन साबित किया जा सकता है, जो पारदर्शिता तथा उत्तरदायित्व को लेकर सरकार की प्रतिबद्धता को कम नहीं करता, पर एक अन्य स्तर पर यह इन आयुक्तों की स्वतंत्रता तथा स्वयत्तता पर प्रभाव डालनेवाला भी सिद्ध होगा, क्योंकि उनके कार्यकाल एवं वेतन को लेकर उनके सिर पर हमेशा एक तलवार लटकती रहेगी.
पूरे विश्व में विनियामक, न्यायिक या कि अर्धन्यायिक प्राधिकारियों की निष्पक्षता तथा स्वतंत्रता सुनिश्चित करने का यह अहम औजार है कि उन्हें एक पूर्वनिश्चित कार्यकाल मिले, जिसमें उन्हें नियुक्त करनेवाले प्राधिकार से किसी हस्तक्षेप की गुंजाइश न हो. यदि सरकार यह शक्ति अपने हाथ में ले ले कि कोई सीआइसी एवं आइसी कब तक काम करेगा और उसे क्या भुगतान किया जायेगा, तो क्या यह उसकी स्वायत्तता तथा कार्यशैली को प्रभावित नहीं करेगा?
यह एक स्थापित तथ्य है कि कार्यकाल की निश्चितता तथा वेतन-भत्ते का अपरिवर्तनीय होना किसी भी अहम विनियामक प्राधिकार की कार्यशैली की निष्पक्षता को सबल करनेवाला होता है. यही वजह है कि निर्वाचन आयोग के मामले में भी बाकी दो निर्वाचन आयुक्तों के लिए उसी किस्म की संवैधानिक सुरक्षा आवश्यक है, जो सीइसी को हासिल है.
संविधान के अनुच्छेद 324 का उपबंध (5) यह कहता है कि सीइसी को अपने पद से सिर्फ उसी तरह और उन्हीं आधारों पर हटाया जा सकता है, जो सुप्रीम कोर्ट के जजों के लिए विहित है. कोई वजह नहीं है कि यही सुरक्षा सभी चुनाव आयुक्तों हेतु लागू न की जाए और उनकी नियुक्ति भी कार्यपालिका की पसंदगी की बजाय प्रधानमंत्री, मुख्य न्यायाधीश एवं विपक्ष के नेता के एक संयुक्त पैनल द्वारा न की जाये.
ऐसे परिवर्तन किसी देश की लोकतांत्रिक अवसंरचना को मजबूत करते हैं और आरटीआइ इसी अवसंरचना का एक हिस्सा है. कोई भी यह उम्मीद कर सकता था कि वर्तमान सरकार, जिसे संसद में विशाल बहुमत प्राप्त है और भाजपा, जो एक पार्टी के रूप में आरटीआइ के उपयोग से इतनी लाभान्वित हुई है, ठीक ऐसा ही करेगी.
सही है कि सरकार की अंतिम नीयत को लेकर अस्पष्टता का लाभ उसे दिया जा सकता है, क्योंकि आरटीआइ तंत्र में आगे किसी हस्तक्षेप को लेकर उसके कदम स्थिति को पूरी तरह साफ कर देंगे, मगर किये गये परिवर्तनों का प्रथमदृष्टया निष्कर्ष तो आरटीआइ अधिनियम को कार्यशील करनेवाले प्राधिकार की स्वतंत्रता, स्वायत्तता तथा निष्पक्षता के लिए हानिकारक ही होगा.
ऐसा कदम उन नागरिकों के अधिकारों को चोट पहुंचानेवाला भी होगा, जो आरटीआइ को अपने अधिकारों का रक्षक एवं सार्वजनिक प्राधिकारियों की कार्यशैली को पारदर्शी तथा उत्तरदायित्वपूर्ण बनानेवाला एक शक्तिशाली प्रयास समझते रहे हैं.
(अनुवाद : विजय नंदन)
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