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Home Opinion विदेशी बाजार से ऋण लेना खतरनाक

विदेशी बाजार से ऋण लेना खतरनाक

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डॉ अश्वनी महाजन

एसोसिएट प्रोफेसर, डीयू

ashwanimahajan@rediffmail.com

जब सरकार का कुल खर्च उसकी राजस्व प्राप्तियों और अन्य प्राप्तियों के जोड़ से ज्यादा होता है, तो वह राजकोषीय घाटा कहलाता है.इस राजकोषीय घाटे की भरपाई जनता से उधार लेकर की जाती है. भारत सरकार द्वारा आज से पहले सरकारी खर्च की भरपाई के लिए कभी भी विदेशी बाजारों में बांड जारी कर ऋण नहीं लिया गया. अटलजी के प्रधानमंत्री काल में अनिवासी भारतीयों का आह्वान करते हुए इंडिया रिसर्जेंट बांड जारी किये गये थे और प्रवासी भारतीयों ने दिल खोल कर इन बांडों में निवेश किया था.

भारत सरकार अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों जैसे विश्व बैंक, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष, एशियाई विकास बैंक समेत कई संस्थानों से ऋण लेती रही है. ये ऋण अत्यंत रियायती दरों पर होते हैं. समय-समय पर आवश्यकता अनुसार सरकार द्वारा अंतरराष्ट्रीय बाजारों में गैर-रियायती ऋण भी लिये गये हैं. लेकिन सरकार द्वारा कभी भी घोषित रूप से बजट में घाटे को पूरा करने के लिए विदेशों से ऋण नहीं लिया गया.

अपने बजट भाषण में वित्तमंत्री ने कहा था, ‘अपनी जीडीपी में भारत का संप्रभु ऋण विश्वभर में सबसे कम है, जो पांच प्रतिशत से भी नीचे है.

सरकार विदेशी बाजारों में विदेशी मुद्रा में अपनी सकल उधारी कार्यक्रम के एक हिस्से को बढ़ाना शुरू करेगी. इससे घरेलू बाजार में सरकारी प्रतिभूतियों की मांग पर भी लाभप्रद प्रभाव पड़ेगा’. हमारी जीडीपी आज 2.8 खरब डाॅलर की है. यदि जीडीपी के 10 प्रतिशत के बराबर ऋण लिया जाता है, तो इसका मतलब होगा 280 अरब डाॅलर का ऋण. रुपये में यह 19 लाख 15 हजार करोड़ रुपये होगा.

इस वक्त भारत का विदेशी मुद्रा भंडार सभी रिकाॅर्ड तोड़ कर लगभग 430 अरब डाॅलर तक पहुंच गया है. ऐसे में विदेशी मुद्रा के रूप में ऋण लेने का कोई औचित्य भी नहीं दिखता. सरकारी सूत्रों से यह भी कहा जा रहा है कि विदेशी उधार वर्तमान में जीडीपी के पांच प्रतिशत से भी कम है और इसे आसानी से 15 प्रतिशत तक बढ़ाया जा सकता है.

ऐसे में प्रश्न है कि इस प्रकार से कर्ज बढ़ाने की कोई सीमा तय नहीं की जा सकती. क्या गारंटी है कि आगे आनेवाली सरकारें इस कर्ज को और ज्यादा नहीं बढ़ायेंगी? कर्ज लेना तो आसान है, लेकिन सरकार के पास निर्यात बढ़ा कर विदेशी मुद्रा कमाने जैसी कोई योजना भी दिखायी नहीं देती. ऐसे में कर्ज की अदायगी मुश्किल हो सकती है.

पहले भी कई देशों ने अपने सरकारी घाटे को पूरा करने के लिए अंतरराष्ट्रीय बाजारों से ऋण लिया है. लेकिन इन देशों का अनुभव कभी भी अच्छा नहीं रहा.

बजट भाषण में वित्त मंत्री ने यह नहीं बताया कि जो प्रस्ताव वे दे रही हैं, उसको अपनानेवाले देशों का क्या हाल हुआ. इंडोनेशिया का विदेशी ऋण आज 36.2 प्रतिशत है, ब्राजील का 29.9 प्रतिशत, अर्जेंटीना का 51.9 प्रतिशत, टर्की का 53.8 प्रतिशत और मैक्सिको का 36.5 प्रतिशत है. इन देशों द्वारा विदेशी ऋण लेने के फैसले ने उन्हें ऐसे भंवर में फंसा दिया है कि हर बार उस ऋण की अदायगी के लिए उन्हें और विदेशी ऋण लेना पड़ रहा है. कारण यह है कि विदेशी ऋणों की अदायगी विदेशी मुद्रा (डाॅलर) में करनी होती है. कई देशों के इस जाल में फंसाने के बाद अमीर देशों ने अब कर्जदार देशों पर अपनी शर्तें लादनी शुरू कर दी है. माना जाता है कि विदेशों से विदेशी मुद्रा में ऋण लेना सस्ता पड़ता है और इसलिए राजकोषीय प्रबंधन आसान हो जाता है.

ऋणदाता देशों में ब्याज दरें कम होती हैं और ब्याज दर निर्धारण में महत्वपूर्ण भूमिका रेटिंग की होती है. चूंकि अंतरराष्ट्रीय रेटिंग ऐजेंसियों ने भारत की बेहतर रेटिंग की हुई है, हम अपने खर्चों के लिए कम खर्चीले ऋण विदेशों से ले सकते हैं.

जब हम विदेशी ऋण लेते हैं, तो ऋण अदायगी के बोझ के कारण रेटिंग कम होने के फलस्वरूप भी ब्याज दर आगे बढ़ जाती है और चूंकि अदायगी में कोताही से बचने के लिए और अधिक ऋण लेना जरूरी हो जाता है, ऐसे में देश कर्ज के भंवर जाल में फंसता चला जाता है. कर्ज की बढ़ती अदायगी, विदेशी मुद्रा की कमी और भुगतान घाटे की स्थिति के चलते हमारी करेंसी (रुपया) का अवमूल्यन होता जाता है. पिछले समय में विदेशी ऋण न लेते हुए भी हमारे रुपये का पिछले सालों में लगभग 6 प्रतिशत वार्षिक की दर से अवमूल्यन हुआ है. विदेशी ऋण की राह पर चलने के कारण यह दर आगे बढ़ सकती है.

सरकार को यदि किसी से सीख लेनी हो, तो वह भारतीय निजी क्षेत्र की कंपनियों से ले सकती है. गौरतलब है कि बड़ी संख्या में भारत की छोटी-बड़ी कंपनियों ने सस्ते ब्याज के लालच में विदेशों से ऋण लिये. कंपनियां ब्याज और अदायगी की मार सहते-सहते घाटे में चली गयीं. उससे सीख लेते हुए निजी कंपनियों ने मोटे तौर पर विदेशी कर्ज से तौबा कर ली है.

विदेशी मुद्रा में ऋण लेने के बाद उसे खर्च करने हेतु सरकार को रिजर्व बैंक से उसके बदले भारतीय मुद्रा लेनी होगी. देश में मुद्रा की आपूर्ति बढ़ने के बाद महंगाई बढ़ना एक स्वाभाविक बात है. ऐसे में राजकोषीय घाटे को अनुशासन में रखने का कोई लाभ नहीं होगा. किसी भी नीतिगत परिवर्तन से पहले बहस होना जरूरी है.

यही नहीं इस संबंध में सरकार के राजनीतिक नेतृत्व और अफसरशाही ने मिल कर यह एकतरफा फैसला लिया है. जरूरी है कि इस संबंध में अर्थशास्त्रियों, मौद्रिक नीति के जानकारों और विदेशी मुद्रा एवं अंतरराष्ट्रीय व्यापार विशेषज्ञों समेत सभी हितधारकों से विचार-विमर्श हो.

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