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कांग्रेस, कर्नाटक और कर्मफल

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नवीन जोशी
वरिष्ठ पत्रकार
naveengjoshi@gmail.com
‘नेतृत्वविहीन’ कांग्रेस के संकट बढ़ते जा रहे हैं. राहुल गांधी के अध्यक्ष पद छोड़ने के फैसले पर अडिग रहने के बाद पार्टी के लिए नया नेता चुनना बहुत मुश्किल होगा. विशेषकर जब नेहरू-गांधी परिवार का कोई सदस्य इस चुनाव में प्रकट या अप्रकट रूप में कोई ‘सहायता’ न कर रहा हो. एक युग हुआ, कांग्रेसियों को इस परिवार के नेतृत्व की आदत हो गयी है. दूसरी समस्या कांग्रेस के भीतर नये और पुराने नेताओं के आसन्न टकराव की है.
टकराव हमने राजस्थान और मध्य प्रदेश में देखा. दोनों राज्यों में विजय के बाद मुख्यमंत्री चुनने में राहुल गांधी को भी पसीने आ गये थे, क्योंकि नयी पीढ़ी पुराने कांग्रेसियों को खुली चुनौती दे रही थी. सचिन पायलट और ज्योतिरादित्य सिंधिया नयी पीढ़ी के ऐसे प्रभावशाली प्रतिनिधि हैं, जो पुराने नेतृत्व से कांग्रेस को मुक्त करना चाहते हैं.
राहुल गांधी की ताजपोशी के बाद नयी पीढ़ी को ताकत भी मिली थी, किंतु स्वयं राहुल युवा नेतृत्व को राज्यों की कमान देने का साहस नहीं दिखा पाये. उनके अध्यक्ष रहते भी युवा कांग्रेसी नेताओं को दूसरे पायदान से ही संतोष करना पड़ा. अब राहुल गांधी ने अपने को नये नेता के चयन से पूरी तरह अलग रखने का फैसला किया है, कांग्रेस के भीतर नये और पुराने का यह टकराव जोरों से सिर उठायेगा.
कांग्रेस कार्यसमिति नये अध्यक्ष के चुनाव की प्रक्रिया कब तय करेगी, अभी यही निश्चित नहीं है. इस बीच कांग्रेसियों में बेचैनी बढ़ रही है. कांग्रेस विरोधी ताकतें, विशेष रूप से भाजपा, इस कमजोरी का लाभ उठाने से नहीं चूक रही.
कांग्रेस में नेतृत्व संकट न होता और कमान मजबूत हाथों में होती, तो कांग्रेसी विधायकों को ‘तोड़ना’ इतना आसान नहीं होता. भाजपा नेतृत्व लाख इनकार करे, लेकिन कर्नाटक में कांग्रेस-जद (एस) के विधायकों की ‘खरीद-फरोख्त’ करके गठबंधन सरकार को अस्थिर करने का आरोप लगाकर कांग्रेस के लोकसभा में हंगामा करने को अकारण नहीं माना जा सकता.
लोकसभा चुनावों में भाजपा की प्रचंड जीत के साथ ही यह आशंका थी कि शीघ्र ही कर्नाटक, राजस्थान और मध्य प्रदेश सरकारों को अस्थिर करने का राजनीतिक खेल शुरू होगा. इस आशंका के कारण थे. भाजपा शासन के पहले दौर में अरुणाचल प्रदेश से लेकर उत्तराखंड तक इस तरह के खेल किये जा चुके थे. उत्तराखंड में तो हाईकोर्ट के फैसले के बाद कांग्रेस की सरकार बहुमत साबित कर बहाल हो पायी थी. अटल बिहारी सरकार के दौर में भी बिहार में बहुमत वाली राबड़ी सरकार को अपदस्थ कर दिया गया था.
राज्यों में विरोधी दलों की कमजोर सरकारों को अस्थिर करके गिराने का यह खेल नया नहीं है कि ‘लोकतंत्र की हत्या’ के लिए सिर्फ भाजपा को दोषी ठहराया जाये. इंदिरा गांधी के समय से कांग्रेस ने ऐसे खूब खेल खेले.
दल-बदल, तोड़फोड़, राज्यपालों और विधान सभाध्यक्षों के ‘विवेकपूर्ण’ फैसलों की आड़ में बहुमत की सरकारों को गिराया गया. इसी कारण संविधान के अनुच्छेद 356 का दुरुपयोग हमारे देश में एक बड़ा विवाद बनता रहा और कई बार सर्वोच्च न्यायालय तक पहुंचा.
विरोधी दलों की राज्य सरकारों को अस्थिर करने या गिराने के ये खेल लोकतंत्र के लिए तो ‘अशुभ’ हैं ही, महत्वपूर्ण संवैधानिक पदों पर बैठे व्यक्तियों के फैसलों को प्रभावित करके संविधान के प्रावधानों की मनमानी व्याख्या करने का रास्ता भी खोलते हैं.
राज्यपाल और विधानसभाध्यक्ष के पदों को गैर-राजनीतिक, पार्टी-निरपेक्ष और स्वतंत्र रखने का उद्देश्य यह नहीं था कि उनके फैसले परिस्थिति-विशेष में पार्टी-विशेष को लाभ पहुंचाने वाले हों, जैसा कि पिछले कई दशकों से दिखायी देने लगा है.
कर्नाटक विधानसभा अध्यक्ष ने कहा है कि जिन विधायकों ने अपने इस्तीफे भेजे हैं, उनमें से कुछ निर्धारित प्रारूप में नहीं हैं. विधानसभाध्यक्ष ने कहा है कि मुझे अत्यंत विवेकपूर्ण निर्णय देना है, ताकि आनेवाली पीढ़ियां मुझ पर किसी तरह का आरोप न लगा सकें.हमारा संविधान राज्यपालों या विधानसभा अध्यक्षों को विशेष परिस्थितियों के लिए विशेष निर्देश नहीं देता. वह लोकतंत्र और संविधान की मूल भावना के अनुरूप विवेकपूर्ण निर्णय लिये जाने का रास्ता छोड़ता है.
यही विवेक कभी विधायकों के इस्तीफे को तुरंत स्वीकार कराता है और कभी उनके प्रारूप-परीक्षण में समय लगाने की गुंजाइश देता है. यह इस पर निर्भर करता है कि विधानसभाध्यक्ष का पद किस पार्टी के हिस्से आया. इसीलिए गठबंधन सरकार बनने की स्थिति में मुख्यमंत्री पद की दावेदारी से कम महत्व विधानसभाध्यक्ष पद की दावेदारी को नहीं दिया जाता.
अस्थिर एवं गठबंधन सरकारों के दौर में यह राज्यपाल के ‘विवेक’ पर निर्भर है कि वह संबद्ध मुख्यमंत्री को सदन में बहुमत साबित करने के लिए सिर्फ दो दिन देता है या पूरा एक पखवाड़ा. विधायकों के इस्तीफे के मामलों में राज्यपाल सीधे हस्तक्षेप नहीं कर सकते, लेकिन विधानसभाध्यक्ष को सलाह देने का ‘विवेक’ तो उनका भी है ही.
कर्नाटक के राज्यपाल ने विधानसभा के अध्यक्ष को पत्र लिखा है कि वे विधायकों के त्यागपत्रों पर ‘शीघातिशीघ्र’ निर्णय लें. राज्यपाल का विवेक ‘शीघ्रातिशीघ्र’ कहता है, जबकि विधानसभा अध्यक्ष का विवेक फूंक-फूंक कर कदम रखने को कहता है ‘ताकि कोई उन पर अंगुली न उठाये.’
‘विवेक’ का यह विरोधाभास एक दल के लिए ‘संवैधानिक’ है, तो दूसरे के लिए ‘लोकतंत्र का गला घोटना.’ संविधान निर्माताओं ने यह नहीं सोचा होगा कि ‘विवेक’ के कई कोण हो सकते हैं. यह संविधान के ‘छिद्र’ नहीं हैं, जैसा कि कुछ लोग कह देते हैं.
यह आंबेडकर की वह भविष्यद्रष्टा चेतावनी है, जो उन्होंने संविधान सभा की अंतिम बैठक में दी थी-‘संविधान कितना भी अच्छा क्यों न हो, यदि वे लोग, जिन्हें संविधान को अमल में लाने का काम सौंपा जाये, अच्छे नहीं निकलें, तो संविधान भी खराब सिद्ध होगा.’
दलों के कमजोर नेतृत्व, मूल्यहीनता, अल्पमत या अस्थिर सरकारों के दौर और संवैधानिक पदों पर बैठे व्यक्तियों का विवेक हमारे लोकतंत्र और संविधान की बार-बार परीक्षा लेता है. इसीलिए सशक्त विपक्ष लोकतंत्र की सेहत के लिए अनिवार्य कहा गया है. कांग्रेस का यथाशीघ्र नया अवतार इस कारण भी आवश्यक है.
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