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अमेरिका की हेठी

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भारतीय विदेश मंत्रालय ने उस अमेरिकी रिपोर्ट को उचित ही खारिज किया है, जिसमें भारत में धार्मिक अल्पसंख्यकों, कमजोर वर्गों और सरकार के आलोचकों के विरुद्ध हिंसात्मक हमले होने तथा अनेक मामलों में सरकार की विफलता की बात कही गयी है.

भारत ने कहा है कि अल्पसंख्यकों समेत सभी नागरिकों को संविधान के अंतर्गत मौलिक अधिकार प्राप्त हैं तथा किसी विदेशी सरकार को इन अधिकारों के अनुपालन की स्थिति पर टिप्पणी का अधिकार नहीं है.

अमेरिकी विदेश विभाग दुनियाभर में धार्मिक अधिकारों का आकलन कर एक रिपोर्ट प्रकाशित करता है. अंतरराष्ट्रीय राजनीति के जानकार कहते रहे हैं कि ऐसे दस्तावेज वास्तव में अमेरिकी वर्चस्व को बनाये रखने के लिए एक दबाव के रूप में इस्तेमाल होते हैं.

विदेश विभाग के मुख्यालय में इस रिपोर्ट को जारी करनेवाले अमेरिकी विदेश सचिव माइक पॉम्पियो इसी महीने भारत के दौरे पर आ रहे हैं. भारत और अमेरिका के बीच आयात शुल्कों को लेकर तनातनी चल रही है. कुछ समय पहले ही अमेरिका ने भारत को मिली विशेष व्यापारिक छूट को भी वापस लिया है. वाणिज्यिक मामलों के अलावा भारत द्वारा रूस से सैन्य साजो-सामान खरीदने पर भी अमेरिका ने आपत्ति जतायी है.

ऐसे माहौल में इस रिपोर्ट का जारी होना महज संयोग नहीं हो सकता है. इसे विडंबना नहीं तो और क्या कहा जा सकता है कि मानवाधिकारों के हनन के लिए भारत पर अंगुली उठानेवाले ट्रंप प्रशासन को अमेरिका में हो रहे मानवाधिकार हनन तथा नस्ल के आधार पर हो रही हिंसा की चिंता नहीं है.

प्रतिष्ठित अमेरिकी संस्था सदर्न पॉवर्टी लॉ सेंटर की रिपोर्ट के अनुसार, 2018 में अमेरिका में नस्लभेदी घृणा समूहों की संख्या एक हजार से अधिक हो चुकी है. इस रिपोर्ट ने ऐसे समूहों की बढ़ोतरी में एक बड़ा कारक राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के विवादित बयानों को भी माना है.

जांच ब्यूरो एफबीआइ के अनुसार, राष्ट्रपति के चुनावी वर्ष 2016 के बाद से घृणा आधारित अपराधों की संख्या में लगातार वृद्धि हुई है. धार्मिक स्थलों और संस्थानों पर हमले की भी अनेक घटनाएं हो चुकी हैं. अमेरिकी मीडिया में खबरों और चर्चाओं के अलावा प्रतिनिधि सभा व सीनेट में भी नस्लभेदी घटनाओं की बढ़त पर बहस होती रही है.

संयुक्त राष्ट्र और अमेरिकी सीनेट में यमन में भयावह बमबारी और गंभीर मानवीय संकट के लिए ट्रंप प्रशासन पर अंगुली उठायी जा चुकी है. मानवाधिकारों का हनन या किसी समुदाय के विरुद्ध हिंसा न केवल निंदनीय है, बल्कि मानवीय सभ्यता पर एक प्रश्नचिह्न भी है. हमारे देश में कुछ राजनीतिक या सामुदायिक तत्व भले ही ऐसी हिंसा को उकसाते हों, पर सरकार, प्रशासन और न्यायिक तंत्र में न्याय की गुंजाइश हमेशा है.

केंद्र और राज्य सरकारों ने समय-समय पर ठोस कदम भी उठाये हैं तथा अनेक मामलों में अदालतों ने कठोर सजा भी दी है. देश के भीतर न्याय की आवाज उठाने और शासन के रवैये की आलोचना के भी प्रभावी मंच हैं. हमें अमेरिका या किसी अन्य देश के हस्तक्षेप या निर्देश की दरकार नहीं है.

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