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हरियाली का प्रबंधन जरूरी

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क्षमा शर्मा

वरिष्ठ पत्रकार

kshamasharma1@gmail.com

पिछले दिनों अंतरराष्ट्रीय पर्यावरण दिवस पर पेड़, पानी बचाने की खूब चर्चा हुई. हाल ही में किसी ने फेसबुक पर लिखा कि दुनिया के लाखों पेड़ गिलहरियों की देन हैं, क्योंकि ये खाने के लिए बीज छिपाकर रखती हैं और भूल जाती हैं. इसलिए किसी ने सुझाव दिया कि जो फल खाते हैं, उनके बीज बचाकर रखें. कभी यात्रा पर जायें, तो इन्हें रेलवे पटरियों और सड़क के किनारे बिखेर दें. इनसे कुछ दिन में पौधे उग जायेंगे और हरियाली बढ़ेगी.

पेड़ों में भी जीवन होता है, वे भी प्यार भरे स्पर्श को पहचानते हैं. जब कोई कुल्हाड़ा लेकर उनकी तरफ बढ़ता है, तो पेड़ कांपते हैं. इस खतरे का संकेत दूसरे पेड़ों को भी दे देते हैं. यही नहीं, कई बार जो व्यक्ति पेड़ को लगाता है, पालता-पोसता है, तो उसकी मौत पर वे पेड़ रातों-रात मर जाते हैं.

दिल्ली की एक मित्र के पिता ने घर में बड़े कागजी नींबू का पेड़ लगाया था. पेड़ पूरा फलों से भर गया था. एक शाम हृदय गति रुक जाने से उनकी मृत्यु हो गयी. आश्चर्य की बात यह कि अगले चौबीस घंटे में पेड़ के पत्ते पीले पड़ गये और सभी फल सड़ गये. यह मेरी आंखों देखी बात है.

अभी एक फोटो देख रही थी, जिसमें सड़क के किनारे लगे सभी पेड़ काटे जा चुके हैं.

उनके विशालकाय तनों के अवशेष बचे हैं. कहां तो सड़क किनारे ज्यादा से ज्यादा पेड़ लगाने की बातें हो रही हैं और कहां इस तरह से पेड़ों को काटना कि उनका नामोनिशान न बचे. वैसे भी बड़े छायादार वृक्ष बेहद उपयोगी होते हैं. वे मनुष्य को न केवल ऑक्सीजन देते हैं, बल्कि कई औषधियों में भी काम आते हैं.

पेड़ों, नदियों, तमाम जल स्रोतों की चिंता तो हम खूब करते हैं, लेकिन खुद पर जब यह जिम्मेदारी आती है, तो बचने के लिए तरह-तरह के तर्क ढूंढ़ते हैं कि अरे जिंदगी की भाग-दौड़ में इतना समय कहां है कि इन बातों के बारे में सोचें.

लेकिन हमारा जो इको सिस्टम है, जीवन की जो शृंखला है, उसमें हर एक की जगह है. इस शृंखला में अगर कोई एक आंकड़ा, कोई जीव-जंतु, पेड़-पौधे, नदी-पहाड़ गायब होते हैं, तो उसका असर हमारे जीवन की गतिविधियों पर पड़ता है. इसीलिए जब बेतहाशा गरमी हो, तब हमें पेड़ याद आयें या सूखते जल स्रोत चिंता पैदा करें, यह ठीक बात नहीं.

यदि पानी बचाने की चिंता करनी हो, तो बारिश के दिनों में अधिक से अधिक पानी बचाने का काम जिस तरह से भी हो सके, घर में, बाहर, तालाब, कुएं आदि में करें. अगर ऐसा हम करेंगे, तभी उसकी उपयोगिता पता चलेगी और आगे के लिए भी प्रेरणा मिलेगी. कैसे अपने आसपास हरियाली का प्रबंधन किया जा सकता है, छोटे-बड़े किसी भी रूप में, हमें यह सीखना चाहिए.

उम्मीद सिर्फ दूसरों से न हो. हम भी कुछ करें. कुछ नहीं, तो अपने देश में बहुत से आदिवासी बहुल इलाकों से प्रेरणा ले सकते हैं, जहां पहले तो पेड़ ही नहीं काटे जाते. जरूरी होने पर पहले एक नया पेड़ लगाया जाता है, फिर जिस पेड़ को काटना हो, उसकी पूजा करके उससे माफी मांगी जाती है.

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