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सूख रहे जलाशय

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देश के कई हिस्से जल संकट से जूझ रहे हैं. मॉनसून-पूर्व बारिश के कम होने की वजह से हालात तेजी से बिगड़ रहे हैं. ऐसे में बड़े जलाशयों का स्तर लगातार नीचे जाना बेहद चिंताजनक है.

केंद्रीय जल आयोग के अनुसार, 91 बड़े जलाशयों में उनकी क्षमता का सिर्फ 20 फीसदी पानी बचा है. इनमें 30 मई तक 31.65 अरब घन मीटर पानी था. स्थिति की गंभीरता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि 23 से 30 मई के बीच एक फीसदी पानी कम हो गया. पश्चिमी और दक्षिणी भारत के जलाशयों में बीते एक दशक के औसत से भी कम पानी है.

राजस्थान, झारखंड, ओड़िशा, पश्चिम बंगाल, त्रिपुरा, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और केरल में इसी अवधि में पिछले साल की तुलना में कम पानी है. महाराष्ट्र के मराठवाड़ा क्षेत्र के जलाशयों में तो पानी इतना कम कभी नहीं हुआ था. देश के पश्चिमी भाग, जिसमें महाराष्ट्र और गुजरात शामिल हैं, के 27 बड़े जलाशयों में तो उनकी क्षमता का बस 11 फीसदी पानी है.

पिछले साल महाराष्ट्र एवं गुजरात में मॉनसून की बारिश कम हुई थी. पिछले महीने स्काइमेट ने अपने अनुमान में बताया था कि महाराष्ट्र के विदर्भ व मराठवाड़ा क्षेत्रों, पश्चिमी मध्य प्रदेश तथा गुजरात में सामान्य से काफी कम बारिश हो सकती है, जबकि दक्षिण भारत में भी मॉनसून कमजोर रहेगा. जून और जुलाई के महीनों में भी कम बारिश की आशंका है. मार्च के आखिरी दिनों के विश्लेषण के आधार पर भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (गांधीनगर) ने जानकारी दी थी कि देश का 42 फीसदी जमीनी इलाका सूखे जैसी स्थिति का सामना कर रहा है.

अब यह दायरा तेजी से बढ़ता हुआ दिखायी दे रहा है. इसका एक निष्कर्ष तो यह है कि तमाम संकेतों के बावजूद केंद्र और राज्य सरकारों ने सूखे से निबटने के लिए फौरी तौर पर कदम उठाने में कोताही बरती है. साल 2018 में अक्तूबर और दिसंबर के बीच सामान्य से 44 फीसदी कम बारिश हुई थी. इन तीन महीनों में जो बरसात होती है, वह सालभर की बरसात का 10 से 20 फीसदी होती है. इसके अलावा बीते साल मॉनसून में भी बारिश सामान्य से 9.4 फीसदी कम हुई थी.

कमजोर मॉनसून 2015 से ही परेशानी की वजह बना हुआ है. साल 2017 में अच्छी बरसात से खाद्यान्न उत्पादन भी बढ़ा और जलाशयों में पानी भी जमा हुआ, परंतु उसके बाद बारिश में लगातार कमी रही. भूजल के स्तर में गिरावट बहुत लंबे समय से जारी है तथा पानी के संचयन और प्रबंधन में लचर व लापरवाह रवैये ने भी स्थिति को विकराल बनाने में योगदान दिया है.

जल संकट ने जहां एक ओर भूजल के दोहन को तेज कर दिया है, वहीं जलाशयों के बचे हुए पानी पर भी दबाव बढ़ा दिया है. सूखा और जल-संकट अर्थव्यवस्था की गति को अस्थिर कर सकते हैं. ऐसे में केंद्र और राज्य सरकारों को इस मुश्किल से निबटने के लिए आपात उपाय करना चाहिए. अब देरी की कोई गुंजाइश नहीं है.

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