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Home Opinion नदी का जल और भाषा का पानी

नदी का जल और भाषा का पानी

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सन्नी कुमार
टिप्पणीकार
sunnyand65@gmail.com
रामचरितमानस में एक प्रसंग है, जब माता कौशल्या सीता को आशीर्वाद देते हुए कहती हैं कि ‘अचल होउ अहिवात तुम्हारा, जब लगी गंग जमुन जलधारा’, अर्थात जब तक गंगा-यमुना में जल रहेगा, तब तक तुम सुहागन रहो. अगर निर्दोष हृदय से आशीर्वाद प्रेषित किया जाए, तो इसमें दीर्घजीविता और सर्वोत्तम का गुण अंतर्निहित होता है.
अत: स्वाभाविक है कि मध्यकाल के कवि तुलसीदास ने गंगा-यमुना के प्रवाह की दीर्घजीविता की कल्पना करते हुए ही वैवाहिक जीवन के चिरस्थायी होने के लिए इस उपमा का प्रयोग किया. लेकिन हम क्या इस बात की कल्पना कर सकते हैं कि कोई आज का कवि इन नदियों के प्रवाह की उपमा आशीर्वाद के रूप में करे?
रामचरितमानस लिखे जाने के बाद से गंगा और यमुना में काफी जल बह भी चुका है और सूख भी चुका है. अब इनका प्रवाह ऐसा नहीं रहा कि इसका उपयोग भाषाशास्त्र में उत्साह और आनंद की उपमा के लिए हो. आज कोई कवि संभावनाओं के छीजने के संदर्भ में ही इसका प्रयोग कर सकता है. मसलन, यमुना की धारा के समान ही इस प्रदेश से समृद्धि भी निरंतर संकुचित होती जा रही है.
वस्तुतः नदियों का सूख जाना महज पर्यावरणीय घटना नहीं है, बल्कि यह भाषा की उर्वरता के कम होने का अभिशाप भी है. हम अक्सर इस पक्ष पर बहुत कम गौर करते हैं और सभ्यता के बनने-बिगड़ने में नदी की भूमिका जैसे भारी-भरकम विषय पर ही अधिकांश ऊर्जा नष्ट कर देते हैं.
नदी सिर्फ जीवन ही प्रदान नहीं करती, बल्कि यह भाषा में रंग और रस भी घोलती है. इस पर संकट न जाने कितनी ही जगह भाषा को अर्थहीन बना देती है और ‘अर्थहीन भाषा’ से बड़ी विडंबना मानव सभ्यता के लिए और क्या होगी!
उदाहरण के लिए अंग क्षेत्र के एक गांव में गाये जानेवाले फाग की एक पंक्ति है ‘उत्तर दिशा में गंग की धारा’, दुर्भाग्य से गंगा की यह उपधारा वहां अब सदानीरा नहीं रही. जिस पीढ़ी ने इस भूगोल को जिया है, वह अपनी स्मृति के सहारे तो इस वाक्य का अर्थ लगा सकते हैं, लेकिन आनेवाली पीढ़ी के लिए यह अर्थहीन हो जायेगी. इस प्रकार क्रमशः यह गीत और संस्कृति के ऐसे अनेक गान विलुप्त हो जायेंगे.
कहने का भाव यह है कि नदियों का संरक्षण और उसकी अविरलता की रक्षा सिर्फ पर्यावरणीय दृष्टि से ही नहीं, बल्कि भाषायी दृष्टि से भी जरूरी है. नदी की राह बदलने से संस्कृति का व्याकरण भी बदल जाता है.
एक भाषा अनुरागी के लिए इससे अधिक त्रासद अनुभूति और क्या होगी कि उत्साह और गति के लिए प्रयोग में आनेवाले प्रतीक अब जर्जर होकर निराशा और विराम की व्यंजना तक सिमट गये हैं! भाषा का ‘पानी’ बचा रहे, इसके लिए आवश्यक है कि नदी में पानी बचा रहे. भाषा प्रेमियों को इस नाते भी नदियों के जीवन के प्रति अधिक सजग होना चाहिए. अंत में यह उम्मीद कि कोई ‘इंदीवर’ फिर लिख सके ‘नदिया चले चले रे धारा..
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