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राष्ट्रीय सुरक्षा हमारे लिए सर्वोपरि

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अवधेश कुमार

वरिष्ठ पत्रकार
awadheshkum@gmail.com
अब जब चुनाव खत्म हो गया है, एक महत्वपूर्ण मुद्दे पर देश का गंभीरता से विचार करना जरूरी है. क्या राष्ट्रवाद, राष्ट्रीय सुरक्षा किसी देश के लिए प्रमुख मुद्दा होना चाहिए या नहीं? पूरे चुनाव के दौरान कुछ लोगों का तर्क था और आज भी है कि राष्ट्रवाद मुद्दा होना ही नहीं चाहिए, क्योंकि यह भावनाओं को भड़काने का विषय है. सैन्य पराक्रम पर राजनीतिक चर्चा नहीं होनी चाहिए, इससे उग्र राष्ट्रवाद भड़कता है. सुरक्षा को चुनाव का मुद्दा बनाना असली मुद्दों से ध्यान भटकाना था.
पाकिस्तान के खिलाफ चुनाव में बोलना लोगों को गुमराह करना था. क्या वाकई चुनाव में ये सब मुद्दे उठने ही नहीं चाहिए थे? यह सच है कि ये सारे मुद्दे चुनाव में भाजपा के पक्ष में जाते दिखते थे और गये भी. लेकिन देश ने दूसरी पार्टियों को ये मुद्दे उठाने से रोका तो था नहीं. यह विषय चुनाव तक ही सीमित नहीं है. इस पर हमारे यहां लगातार बहस चलती रहती है.
हम एक अजीब संस्कारों वाले देश हैं. यहां राष्ट्रवाद, पराक्रम, सुरक्षा आदि से एक बड़े वर्ग के अंदर संस्कारगत वितृष्णा है. दुनिया के प्रमुख देशों की स्थिति उलट है. हमारा पड़ोसी चीन कम्युनिस्ट शासन वाला देश है. किंतु चीनी राष्ट्रवाद कम्युनिज्म पर भारी है और इसी कारण वह संकल्प के साथ अपने लक्ष्यों को पाता है. राष्ट्रीय सुरक्षा उसके लिए सर्वोपरि है तथा राष्ट्र की सीमाओं की उसकी जो कल्पना है, उस पर वह टस से मस होने को तैयार नहीं.
तिब्बत में हिमालय तक रेल पहुंचा देने का असाधारण करनामा उसने कैसे कर दिखाया? नाभिकीय मिसाइलों का जखीरा उसने हमारे पास हिमालय में बिछा दिया है. डोकलाम भूटान का भाग है, पर वह दावा करता है और उसे साबित करने के लिए उसने किस तरह की सैनिक जिद की, यह सामने है. अगर हमारे पास सैन्य ताकत नहीं होती और राजनीतिक नेतृत्व दृढ़ निर्णय नहीं करता, तो भूटान भाग वाले डोकलाम से चीन हटता?
सोवियत संघ के विघटन के बाद अनेक विश्लेषक रूस के दुर्बल, जर्जर और दयनीय देश होने की भविष्यवाणी कर चुके थे. अपनी बुरी दशा से उबरने के लिए रूस के नेतृत्व ने रूसी राष्ट्रवाद की चेतना जागृत की और आज वह महाशक्ति को चुनौती दे रहा है.
मलेशिया इस्लामी देश है. कर्ज से देश को बाहर निकालने के लिए महाथिर मोहम्मद को राष्ट्र की बात करनी पड़ी और लोग दान देने के लिए आगे आने लगे. इस्राइल तो राष्ट्रवाद के दम पर ही अपना अस्तित्व बनाये हुए है. आप अमेरिका से यूरोप और ऑस्ट्रेलिया तक नजर दौड़ा लीजिए, सब अपने यहां राष्ट्रवाद और राष्ट्रीय सुरक्षा को प्राथमिकता देते हैं और यह चुनाव में मुद्दा रहता है.
आतंकवाद के उभार के बाद तो हर देश में पार्टियों को बताना पड़ता है कि इसके संदर्भ में उनकी सुरक्षा नीति क्या है. दुनिया के सभी प्रमुख देशों में राष्ट्रवाद और राष्ट्रीय सुरक्षा को लेकर ऐसी विकृत धारणा नहीं है, जैसा हमारे यहां है. यह भारत नामक इस राष्ट्र की त्रासदी है कि यहां आनुवंशिकी में ही ऐसे कुछ विचार रहे हैं. यह अकेला देश है, जहां अपने राष्ट्रीय हीरो की चर्चा करने को उग्र-राष्ट्रवाद या फासीवाद साबित किया जाता है.
भारत की गुलामी के पीछे भी यह प्रमुख कारण रहा है. जब 1757 में प्लासी का युद्ध हो रहा था, तो जितने लोग सिराजुद्दौला के साथ लड़नेवाले थे, उससे कई गुणा ज्यादा लोग मैदान के बाहर तमाशा देख रहे थे. किसी ने नहीं सोचा कि इससे देश के भाग्य का फैसला होनेवाला है. अगर वे लोग थोड़ा भी पराक्रम दिखाते तो ईस्ट इंडिया कंपनी के सैनिक वहीं खत्म हो जाते.
ऐसा नहीं हुआ और देश गुलाम हो गया. और भारतीय सिपाहियों ने अपने शासकों के आदेश पर भारत के लोगों पर अत्याचार किये. अंग्रेजी शासनकाल में उनकी पुलिस में ज्यादातर भारतीय ही थे, जिन्होंने स्वतंत्रता सेनानियों या विरोध की आवाज उठानेवालों पर गोलियां-लाठियां चलायीं.
नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने पराक्रम दिखाया, सैन्य संगठन बनाया और युद्ध लड़ा. उनके 24 हजार से ज्यादा जवान शहीद हुए. इसी देश में उनका विरोध भी हुआ. आजादी में आजाद हिंद फौज के योगदान को इतिहास में वैसी जगह नहीं मिली, जैसी जाॅर्ज वाशिंगटन और उनके साथियों को अमेरिका में मिलती है.
यह अच्छा संकेत है कि पिछले कुछ वर्षों में भारतीय मानस में थोड़ा बदलाव आया है, लेकिन संस्कारगत दोष जा नहीं रहे है. इसलिए कुछ लोग ऐसा प्रचारित करते हैं कि राष्ट्रवाद, पराक्रम, सुरक्षा जैसे विषयों को उठाकर लोगों की भावनाएं भड़कायी जा रही हैं. पाकिस्तान हमारे यहां आतंकवाद प्रायोजित करता रहा है.
लंबे समय बाद देश ने 2015 में म्यांमार में तथा 2016 में पाकिस्तान में सर्जिकल स्ट्राइक करके भारत के बदलते संस्कार का परिचय दिया. फरवरी 2019 में युद्धक विमानों से पाकिस्तान में घुसकर आतंकवादी ठिकानों पर बमबारी ने इस बदलाव को ज्यादा सुदृढ़ किया और राष्ट्रवाद व पराक्रम का यह संयोग लोगों को रोमांचित करता रहा. साल 1971 के पहले भारत ने इस तरह कोई युद्ध कब जीता?
चुनाव में इसकी चर्चा क्यों नहीं होनी चाहिए थी, यह समझ से परे है. गुन्नार मिर्डल ने भारत को सॉफ्ट स्टेट की संज्ञा यूं ही नहीं दी थी. भारत की वह छवि बदल रही है, तो यह चुनाव अभियान में गूंजित होना ही था. दूसरे दल भी इसे उठा सकते थे. अगर सरकार ने निर्णय किया, तो उसका समर्थन करने एवं पराक्रम को सराहने में विपक्ष संकोच नहीं करता, तो माहौल दूसरा होता.
चुनाव अभियान में नेताओं को जनता के सामने सबसे ज्यादा बातें रखने का अवसर मिलता है. ऐसे अवसर को राष्ट्रवाद, राष्ट्रीय सुरक्षा, कश्मीर आदि से वंचित कर देने की सोच कतई सकारात्मक नहीं कही जा सकती. ये मुद्दे शाश्वत हैं और देश की सामूहिक भावना के साथ इसका जुड़ा रहना आवश्यक है. इससे जो वातावरण बनता है, वह सभी क्षेत्र में सक्रिय लोगों को राष्ट्र का ध्यान रखते हुए काम करने तथा आवश्यकता पड़ने पर पराक्रम दिखाने के लिए प्रेरित करता है.
हमारे सुरक्षा बलों का भी हौसला बढ़ता है कि राजनीतिक पार्टियां एवं आम जनता भी उनके पराक्रम को मुद्दा बना रहे हैं. दुनिया के प्रमुख देश इसी रास्ते आगे बढ़े हैं. इसी तरह कश्मीर के समाधान का विषय राष्ट्रीय मुद्दा होना चाहिए. लंबे समय से इसका मुद्दा न बनना दुर्भाग्यपूर्ण था. कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है, तो उसे सामान्य बनाना चुनाव मुद्दा क्यों नहीं होना चाहिए था? अच्छा है कि धीरे-धीरे अब आम जनता की समझ भी इन सवालों की दिशा में विकसित होने लगी है.
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