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बढ़ती शराबखोरी

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एक तरफ देश विकास की राह पर आगे बढ़ रहा है, तो दूसरी ओर समाज का एक हिस्सा खुद को शराब के नशे में डूबो रहा है. साल 2010 और 2017 के बीच हमारे देश में शराब के उपभोग में 38 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है.
विश्व स्वास्थ्य संगठन और ग्लोबल बर्डेन ऑफ डिजीज की रिपोर्टों के आधार पर किये गये जर्मन शोधार्थियों के ताजा अध्ययन के अनुसार, दुनियाभर में 1990 की तुलना में 2017 में शराबखोरी में 70 फीसदी की बढ़त हुई है. पिछले साल आयी विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट के साथ हालिया अध्ययन को रखकर देखें, तो 2005 से 2017 तक शराब का सेवन लगभग ढाई गुना बढ़ा है.
साल 2016 में इस नशे के कारण पूरी दुनिया में 30 लाख से अधिक लोग मरे थे, जिनमें से 28 फीसदी मौतें यातायात दुर्घटना, आत्मघात और झगड़े में हुई थीं. बाकी बीमारियों की भेंट चढ़े थे. इन सभी मामलों में भारत बहुत आगे है, सो यह अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है कि शराब किस हद तक हमारे लिए तबाही का बड़ा कारण है.
जहरीली शराब का कहर भी अक्सर सुर्खियों में होता है. हमारे देश में केंद्र सरकार द्वारा कराये गये हालिया सर्वेक्षण के मुताबिक, 10 से 75 साल आयु के करीब 14.6 फीसदी भारतीय शराब पीते हैं, जिनमें पांच फीसदी को लत छोड़ने के लिए चिकित्सकीय मदद की जरूरत है. सुविधाओं और जागरूकता की कमी से इनमें से सिर्फ आधे लोगों को ही ऐसी मदद मिल पाती है.
चूंकि हमारे यहां नशे को नैतिकता और वर्जना की दृष्टि से देखने की प्रवृत्ति है, सो अक्सर आदी व्यक्ति और उसके परिजन डॉक्टर या सुधार केंद्र जाने में हिचकते हैं. परामर्श और सुधार के लिए बने कई केंद्र या तो अवैध हैं या फिर उनमें सुविधाओं का अभाव है. शराबखोरी के साथ अन्य नशीले पदार्थों के बढ़ते चलन की वजह से हालत लगातार बिगड़ती जा रही है. इससे बीमारी, अपराध और अक्षमता में भी वृद्धि हो रही है.
बच्चों और किशोरों में शराब और दूसरे नशे की लत बढ़ने से युवा पीढ़ी का भविष्य दांव पर है और बड़ी संख्या में परिवार तबाही के कगार पर हैं. रिपोर्ट में भारत समेत अनेक विकासशील और अविकसित देशों में शराबखोरी के बढ़ने की आशंका भी जतायी गयी है. इस दिशा में व्यापक पहल जरूरी है.
सरकार ने नशा मुक्ति के लिए राष्ट्रीय कार्यक्रम की एक रूप-रेखा तैयार की है और आशा है कि उसे जल्दी ही अमली जामा पहनाया जायेगा. हमें बहुत-से मनोचिकित्सकों, प्रशिक्षित सलाहकारों और पुनर्वास केंद्रों की जरूरत है. स्वास्थ्य से संबंधित नीति-निर्धारण में तथा कार्यक्रमों के क्रियान्वयन में नशे की समस्या को प्राथमिक चिंताओं में शामिल किया जाना चाहिए.
शराबबंदी, बिक्री पर निगरानी, मौजूदा कानूनों जैसे आयामों के अनुभवों की समीक्षा भी की जानी चाहिए तथा इसके आधार पर नये सिरे से नियमन के प्रावधान होने चाहिए. लेकिन सिर्फ सरकारी और कानूनी प्रयासों से नशे पर नियंत्रण संभव नहीं है. इसमें समाज और परिवार को भी योगदान करना होगा.
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