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शिशुओं की देखभाल

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महान साहित्यकार विलियम वर्ड्सवर्थ की एक कविता की यह पंक्ति बहुत प्रसिद्ध है- ‘बच्चा मनुष्य का पिता होता है.’ इसका सामान्य अर्थ यह है कि बचपन के अनुभवों की नींव पर ही व्यक्ति का निर्माण होता है.
इसी विवेक और संवेदना के कारण हम बच्चों के लालन-पालन पर ध्यान देते हैं. परंतु, समुचित समझ और जागरूकता के अभाव में अभिभावक अपने उत्तरदायित्व को ठीक से नहीं निभा पाते. विश्व स्वास्थ्य संगठन ने इस कमी को दूर करने के उद्देश्य से पहली बार पांच वर्ष तक की आयु के बच्चों के लालन-पालन के संबंध में स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी किया है.
इसमें कहा गया है कि बच्चों को शारीरिक रूप से सक्रिय रहने और खेलने-कूदने के लिए पर्याप्त समय मिलना चाहिए तथा उनके खान-पान पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए. मनोरंजन और सूचना के इलेक्ट्रॉनिक और डिजिटल साधन हमारी वर्तमान सभ्यता के अभिन्न हिस्से हैं. स्वाभाविक रूप से बच्चे भी इनका उपभोग करने लगे हैं. शिशुओं के डिजिटल मनोरंजन का व्यापक कारोबार विकसित हो चुका है. शहरों में जगह की कमी और अभिभावकों की व्यस्तता ने भी बच्चों के हाथों में डिजिटल उपकरणों को थमा दिया है.
पारंपरिक समाज का स्थान एकल परिवारों की बस्तियों ने ले लिया है. ऐसे में डिजिटल का उपभोग, अस्वास्थ्यकर खान-पान और शारीरिक सक्रियता की कमी बच्चों में मोटापा और वजन बढ़ने का कारण बन रही हैं. डिजिटल का बहुत अधिक उपभोग शिशुओं के मन और मस्तिष्क पर भी असर करता है. इससे बच्चा एकाकी और अंतर्मुखी स्वभाव का हो सकता है तथा डिजिटल उपभोग एक खतरनाक लत में बदल सकता है.
पिछले कुछ समय से इन मसलों पर शिशु रोग विशेषज्ञों, मनोवैज्ञानिकों, समाजशास्त्रियों और शिक्षकों में चर्चा तेज हुई है. अमेरिकी शिशु रोग विशेषज्ञों की अकादमी भी पहले ऐसे ही सुझाव दे चुकी है. विभिन्न पत्रिकाओं में इससे संबंधित अध्ययन और शोध-पत्र भी छप चुके हैं. विश्व स्वास्थ्य संगठन ने सभी प्रमुख और महत्वपूर्ण शोधों का संज्ञान लेकर विस्तृत निर्देश जारी किया है.
अभिभावकों को इनका पालन करना चाहिए, ताकि शिशु का स्वास्थ्य उसके अच्छे विकास का आधार बन सके. बच्चों से संबंधित नीतियों एवं कार्यक्रमों को बनानेवाली सरकारी और स्वयंसेवी संस्थाओं को भी संगठन की रिपोर्ट का अनुपालन करना चाहिए. ध्यान रहे, शिशुओं की देखभाल का प्राथमिक उत्तरदायित्व अभिभावकों का है. सरकार, मीडिया और अन्य संस्थाएं जानकारियों और निर्देशों से उन्हें अवगत करा सकती हैं. बच्चों में मानसिक, मनोवैज्ञानिक और शारीरिक परेशानियों की शिकायतें भी बढ़ रही हैं.
हमारे देश में कुपोषण, प्रदूषण और कमजोर स्वास्थ्य सेवा जैसी समस्याओं के कारण बच्चों पर ध्यान देने की जरूरत बहुत ज्यादा है. शिक्षकों और चिकित्सकों के साथ आंगनबाड़ी एवं आशा कार्यक्रमों की सेविकाओं को इन निर्देशों से अवगत कराया जाना चाहिए, ताकि वे अभिभावकों को जानकारी दे सकें.
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