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Home Opinion कम होती खाद्य मुद्रास्फीति की चुनौती

कम होती खाद्य मुद्रास्फीति की चुनौती

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अजीत रानाडे
सीनियर फेलो, तक्षशिला इंस्टीट्यूशन
editor@thebillio- press.org
मार्च के नवीनतम आंकड़ों के अनुसार मुद्रास्फीति की दर 2.6 प्रतिशत है. मार्च में समाप्त पिछले वित्तीय वर्ष के लिए औसत मुद्रास्फीति दर भी लगभग 3.5 प्रतिशत ही है.
ये आंकड़े इस क्षेत्र में सफलता की अपनी ही कहानी बयान करते हैं, जिसका श्रेय रिजर्व बैंक (आरबीआइ) तथा एनडीए सरकार को संयुक्त रूप से दिया जाना चाहिए. सिर्फ तीन वर्ष ही गुजरे हैं, जब आरबीआइ ने मुद्रास्फीति को लक्षित करना आरंभ किया और यह नीति प्रभावी होती प्रतीत होती है.
मुद्रास्फीति की दर की गणना कई कारकों को मिलाकर की जाती है, जिनमें वस्तुएं एवं सेवाएं भी शामिल हैं, जिन्हें उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआइ) भी कहते हैं. इसे याद करें कि नवंबर 2013 में सीपीआइ मुद्रास्फीति 12 प्रतिशत की चोटी पर पहुंच चुकी थी, जो पिछले दशक का सबसे ऊंचा आंकड़ा था.
सीपीआइ की गणना में ली जानेवाली आधी सामग्रियां तो खाद्य तथा पेय पदार्थों से संबद्ध हैं. इसमें भी खाद्य सामग्रियों को 46 प्रतिशत भारिता (वेटेज) दी जाती है, जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में उसे और भी ऊंचे स्तर की यानी 54 प्रतिशत भारिता दी जाती है.
इसलिए जब मुद्रास्फीति में गिरावट का रुझान रहता है, तो इसमें खाद्य मुद्रास्फीति की गिरावट एक बड़ी भूमिका निभाती है. यह एक तथ्य है कि फरवरी के पहले के पांच महीनों के दौरान खाद्य मुद्रास्फीति नकारात्मक ही थी. मार्च की खाद्य मुद्रास्फीति शून्य से कुछ ही ऊपर 0.3 थी. पिछले पूरे वित्तीय वर्ष के लिए खाद्य मुद्रास्फीति 0.1 पर थी, जो 1991 के बाद की अवधि में न्यूनतम है.
खासकर शहरी उपभोक्ताओं के लिए निम्न तथा स्थिर मुद्रास्फीति खुशी की वजह होती है. विकसित देशों में जहां शहरी आबादी पूरे देश की 90 प्रतिशत अथवा उससे भी ऊपर तक होती है, खाद्य मूल्य वस्तुतः निम्न तथा स्थिर स्तर पर कायम रहते हैं.
मगर, भारत जैसे देश के लिए जहां आज भी 50 प्रतिशत आबादी प्रत्यक्षतः अथवा परोक्षतः कृषि से संबद्ध है, निम्न एवं नकारात्मक खाद्य मुद्रास्फीति का अर्थ यह होता है कि इन परिवारों की आय भी निम्न स्तर पर है. अन्य गैर-खाद्य सामग्रियों के विपरीत, कीमतें गिर जाने पर खाद्य सामग्रियों की मांग तेजी से बढ़ नहीं जाती है.
इसलिए गिरती कीमतें साधारणतः किसानों की आय घटने की ही सूचक होती हैं, न कि कृषि उत्पादन में वृद्धि की. खाद्य सामग्रियों में भी जिन चार श्रेणियों की कीमतों में सर्वाधिक गिरावट हुई है, वे हैं फल, सब्जियां, दालें एवं चीनी. इन चारों की सम्मिलित भारिता 15 प्रतिशत है. इनकी कीमतें अंशतः तो जरूरत से ज्यादा आपूर्ति की वजह से गिरी हैं. एक वक्त वह भी था, जब हमें दालें आयात करनी पड़ती थीं. पिछले तीन वर्षों में खाद्यान्नों का उत्पादन भी लगातार बढ़ा है.
कम कीमतें तथा किसान परिवारों में कम आय ही वे वजहें थीं, जिनसे प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि शुरू करने का विचार उत्पन्न हुआ.
न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) भी किसानों को कुल उत्पादन लागत के 50 प्रतिशत का मुनाफा देने पर लक्षित है. पर यह प्रत्याशित ढंग से प्रभावी सिद्ध न हो सका, क्योंकि तंग राजकोषीय स्थिति की वजह से केंद्र एवं राज्य सरकारों द्वारा उपज की खरीद काफी कम ही रही. यही कारण है कि सरकार भी अत्यंत निम्न खाद्य मुद्रास्फीति के निहितार्थों से चिंतित है.
ऐतिहासिक रूप से भारत की औद्योगीकरण नीति में शहर समर्थक एवं कृषि विरोधी पुट रहा है. नतीजतन, व्यापार की शर्तें उद्योग की तुलना में कृषि के विरोध में ही झुकी रही हैं. यदि किसान परिवारों की तादाद में एक बड़ी गिरावट आयी होती और कृषि उत्पादन उसी अनुपात में बढ़ा होता, तो हमें इन दो स्थितियों के सम्मिलित फायदे हासिल हुए होते. पर दुर्भाग्यवश कृषि के बाहर किसी सुरक्षित जॉब के अभाव के कारण किसान कृषि क्षेत्र को छोड़ नहीं सके.
एक गतिविधि के रूप में कृषि स्वयं ही कई बंधनों में जकड़ी है, जिनके उदाहरण में मूल्य एवं मात्रा नियंत्रणों, कृषि बाजार समितियों तथा बटाईदारी खेती से संबद्ध पुरातन कानूनों के चंगुल, महाजनों का नियंत्रण और कॉरपोरेट-किसान संबद्धता की सीमाओं को लिया जा सकता है. खेतों से खाने तक की मूल्य शृंखला को कृषि प्रसंस्करण, शीतगृहों, खुदरा सुपर बाजारों के विस्तार तथा मूल्य वर्धित उत्पादों की दरकार होती है, जिनकी संभावनाएं अभी भी सुदूर ही हैं.
हालांकि, हम कृषि में सार्थक आर्थिक सुधारों के इंतजार के साथ ही विनिर्माण, खनन, रियल एस्टेट, निर्माण एवं सेवा क्षेत्र में जॉब के भारी सृजन की राह अब भी ताक ही रहे हैं, ताकि ये सब मिलकर कृषि से अतिरिक्त श्रमबल सोख सके, फिर भी हमारे द्वारा यह सवाल तो किया ही जाना चाहिए कि क्या लगभग शून्य खाद्य मुद्रास्फीति हमें स्वीकार्य हो सकेगी?
कुछ वर्ष पहले आरबीआइ के शोध विभाग ने एक रिपोर्ट प्रकाशित की थी, जिसके अनुसार भारत में आर्थिक विकास की रफ्तार तेज करने के लिए इसकी मुद्रास्फीति दर पांच प्रतिशत के लगभग होनी चाहिए. इसलिए मुद्रास्फीति की शून्य दर तो निश्चित रूप से अत्यंत निम्न है. मुद्रा अवस्फीति अंततः मुद्रा अपस्फीति (डिफ्लेशन) को तथा मूल्य प्रत्याशाओं की एक अधोगामी शृंखला को ही जन्म देती है.
यदि लोग यह उम्मीद करते हैं कि कीमतें और भी नीचे जायेंगी, तो वे खरीद को टालते हैं, जिससे मांग में कमी आती है और जिंसों का भंडार बढ़ता जाता है, जो कीमतों में और भी कमी पैदा करता है. ऐसी स्थिति एक विकासशील देश के लिए खतरनाक होती है. यदि खाद्य मुद्रास्फीति बहुत कम हो गयी, तो हमें अविलंब गैर-कृषि गतिविधियों या नकदी के ट्रांसफर से कृषि आय बढ़ाने के रास्ते तलाशने होंगे.
आधिकारिक अनुमानों के मुताबिक, इस वक्त भारत का 42 प्रतिशत हिस्सा सुखाड़ की चपेट में है. ऐसे में फल तथा सब्जियों के दाम तेजी से बढ़कर खाद्य मुद्रास्फीति के परिदृश्य में नाटकीय परिवर्तन ला सकते हैं. कृषि उत्पादन में कमी से अधिक आपूर्ति की स्थिति में भी कमी आ सकती है.
हालांकि, चीनी की कीमतों में वृद्धि की कोई संभावना नहीं है. यदि खरीद की मात्राओं में पर्याप्त बढ़ोतरी लाते हुए एमएसपी से संबद्ध नीतियों को प्रभावी ढंग से लागू किया जाये, तो कृषि संकट में कुछ कमी लायी जा सकती है. शून्य के करीब खाद्य मुद्रास्फीति यह संकेत करती है कि शहरी बनाम ग्रामीण व्यापार संतुलन एक ओर अत्यधिक झुक चुका है, जिसे विपरीत किये जाने की जरूरत है.
(अनुवाद: विजय नंदन)
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