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बुद्धिमत्ता के पर्याय आइंस्टीन

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शफक महजबीन
टिप्पणीकार
mahjabeenshafaq@gmail.com
‘हर कोई जीनियस है, लेकिन अगर एक मछली को पेड़ पर चढ़ने की काबिलियत के हिसाब से आप आंकेंगे, तो मछली खुद को जिंदगी भर मूर्ख समझेगी.’ जाहिर है, मछली पानी में तैरने में जीनियस है.
जीनियस शब्द का सही अर्थ बतानेवाले, बुद्धिमत्ता के पर्याय और सार्वकालिक महानतम वैज्ञानिक, अल्बर्ट आइंस्टीन की आज पुण्यतिथि है. आइंस्टीन को प्रकाश-विद्युत उत्सर्जन की खोज के लिए 1921 में नोबेल पुरस्कार दिया गया. हालांकि, उनके ‘सापेक्षता का सिद्धांत’ (थ्योरी ऑफ रिलेटिविटी) और ‘द्रव्यमान-ऊर्जा समीकरण’ (E= mc2) के लिए उन्हें ज्यादा जाना जाता है.
ब्रह्मांड के नियमों को समझानेवाले भौतिकविद् आइंस्टीन का जन्म 14 मार्च, 1879 को जर्मनी के वुटेमबर्ग में हुआ था. इनके पिता का नाम हर्मन आइंस्टीन और माता का नाम पॉलीन आइंस्टीन था. अल्बर्ट बचपन में बहुत शांत स्वभाव के थे. बच्चों के साथ खेलने के बजाय वह अकेले ही खेलते थे. चार साल की उम्र तक आइंस्टीन कुछ भी नहीं बोल सके थे.
जब वे पांच वर्ष के हुए, इनके पिता ने इन्हें जन्मदिन पर मैग्नेटिक कंपास गिफ्ट किया, जिसकी सूई हमेशा उत्तर दिशा में रहती थी. आइंस्टीन सोचने लगे कि सूई हमेशा उत्तर दिशा में क्यों रहती है. यह जानने के लिए उनमें जिज्ञासा का जन्म हुआ, और धीरे-धीरे विज्ञान में रुचि बढ़ने लगी. स्कूल के दिनों में वे अपने टीचर्स से अजीब-अजीब सवाल पूछते थे.
इस कारण उन्हें मंदबुद्धि तक कहा गया और ऐसी शरारतों की वजह से उन्हें स्कूल से बाहर भी निकाल दिया गया. बचपन से ही उनके दिमाग में चीजों को लेकर गहरी जिज्ञासा थी. वह आसमान और सूरज के बारे में सोचते थे. तारों के बारे में सोचते थे कि वे रात में ही क्यों चमकते हैं. अपनी तमाम उपलब्धियों के पीछे वह अपनी जिज्ञासा को ही मानते हैं. वे लिखते भी हैं, ‘मेरे पास कोई विशेष गुण नहीं है, मैं तो बस जिज्ञासू हूं.’
अलबर्ट आइंस्टीन की साहित्य, कला, संगीत और अध्यात्म में भी गहरी दिलचस्पी थी. दिखने में वे बेहद ही साधारण व्यक्ति थे, पर असाधारण दिमाग वाले वैज्ञानिक और चिंतक थे. यही वजह है कि उनके विचार भी असाधारण हैं.
साल 1999 में टाइम पत्रिका ने आइंस्टीन को ‘शताब्दी-पुरुष’ घोषित किया था. उन्होंने तीन सौ से ज्यादा वैज्ञानिक शोधपत्रों का प्रकाशन किया. एक से बढ़कर एक वैज्ञानिक सिद्धांतों का प्रतिपादन करनेवाले, अनेक किताबें लिखनेवाले और ब्रह्मांड के रहस्यों को सुलझानेवाले आइंस्टीन 18 अप्रैल, 1955 को हमेशा के लिए ब्रह्मांड में कहीं विलीन हो गये.
आज हमें आइंस्टीन के वैज्ञानिक योगदानों को न सिर्फ याद करना चाहिए, बल्कि ऐसी कोशिशें करनी चाहिए, जिससे आज की पीढ़ी में वैज्ञानिक चेतना से भरी जिज्ञासा पैदा हो सके.
स्कूलों और कॉलेजों में ऐसी चेतना का विस्तार किया जाना चाहिए, ताकि आगे चलकर लोगों में विज्ञान के प्रति रुचि बढ़ सके और अच्छे-अच्छे शोध सामने आ सकें. यह न सिर्फ हमारे देश के लिए जरूरी है, बल्कि पूरी दुनिया के लिए जरूरी है.
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