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गीत नहीं, विचारधारा है

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आलोक पुराणिक
वरिष्ठ व्यंग्यकार
puranika@gmail.com
यह वक्त अद्भुत है. राजनीतिक विमर्श यह है कि वह गायिका उस पार्टी को ज्वाॅइन कर रही हैं या इस पार्टी को.उस पार्टी के गायक इस गायिका को समझा ले गये कि नहीं कि अभी ज्वाॅइन मत करो. इधर राजनीतिक विचारधारा की तलाश हिट गीतों में होनी चाहिए. इधर एक गीत बहुत हिट हो रहा है- तेरी आंख्या का यो काजल.
इस गीत के गहन अध्ययन से जीवन सूत्र मिल जाते हैं और तमाम समस्याओं का समाधान मिल जाता है. इस गीत में कहा गया है कि झील सी गहरी आंखों में खो जाऊं. मतलब बंदा एक बार सचमुच की झील में खो जाये या आंखों की झील में खो जाये, तो फिर बाकी समस्याओं में डूबने का सीन ही नहीं बचता. डूबते बंदे को न आटे के भाव सताते न दालों की कीमत की चिंता होती. यानी इस गीत में तमाम समस्याओं का मुकम्मल हल बताया गया है कि खो जाओ और खो जाओ आंखों में. यह गीत नहीं, समग्र राजनीतिक विचारधारा है!
एक और हिट गीत है- जिसमें बताया जाता है कि- ही ही हंस देलें रिंकिया के पापा. इसका अर्थ है कि रिंकी के पापा हंस दिये. इस गीत में आगे बताया गया है कि रिंकिया के पापा से कहा गया कि वह चाय बनाएं और पिलाएं.
रिंकिया के पापा ने हंसते हुए यह कार्य संपन्न भी किया. रिंकिया के पापा से कहा गया कि दफ्तर से घर लौटते वक्त सब्जी लेकर आना है, रिंकिया के पापा हंसते-हंसते यह कार्य करते हैं. रिंकिया के पापा हंसते ही रहते हैं. बंदा हंसता रहे, तो सारे बवाल खत्म हैं जी.
बाॅस सेलरी कम दे रहा है और काम ज्यादा करा रहा है, तो भी फिक्र नहीं. रिंकिया के पापा हंसते ही रहेंगे. और तो और, रिंकिया के पापा पर चट देनी खींच के तमाचा पड़ता है, तब भी रिंकिया के पापा हंसते ही रहते हैं. हंसते ही जाते हैं. इस तरह बंदा हंसता रहे, तो कहीं कोई आफत ही नहीं है. रिंकिया के पापा हो जाने में ही अल्टीमेट उद्धार है.
वैसे आम आदमी चाहे या ना चाहे, रिंकिया का पापा ही हुआ पड़ा है. मोबाइल बिल में जाने क्या चार्ज लग के आते हैं- रिंकिया के पापा हंस के चुका देते हैं. क्रेडिट कार्ड वाले जाने कितने परसेंट ब्याज वसूलते हैं, रिंकिया के पापा हंस कर भुगतान करते हैं.
बच्चों की फीस मैनेजमेंट बढ़ा देता है, रिंकिया के पापा चुप्पैचाप फीस भर आते हैं. रिंकिया के पापा करें तो क्या करें. एक नेता बरसों-बरस एक पार्टी में रहता है, फिर चुनावी टिकट न मिलने पर उस पार्टी को राष्ट्र-विरोधी घोषित करके दूसरी पार्टी में चला जाता है, जिसे बरसों-बरस राष्ट्रद्रोही बताता रहा. क्या करें रिंकिया के पापा!
रिंकिया के पापा हंसना सीख जायें, तो हर हाल में हंस सकते हैं. तो यह गीत गहरा राजनीतिक संदेश दे रहा है कि हंसना सीखिए. इसमें गहरा मर्म छिपा है कि तमाम नेताओं की हरकतें भी अब ऐसी हो गयी हैं कि आप उन पर हंस ही सकते हैं. रोकर भी क्या करेंगे आखिर. शिवसेना के नेता नरेंद्र मोदी को कमजोर नेता बता रहे थे, लेकिन अब मोदीजी के नेतृत्व में ही चुनाव लड़ेंगे- ही ही हंस दिहलें रिंकिया के पापा!
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