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एक रात की बात

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मिथिलेश कु. राय
रचनाकार
mithileshray82@gmail.com
कक्का अक्सर एक बात कहा करते हैं कि लोग बड़े-बुजुर्गों को विशाल छायादार वृक्ष तो कह देते हैं, लेकिन समाज के युवाओं को उसी वृक्ष के फल की संज्ञा देना भूल जाते हैं. वे यह बात तब जरूर छेड़ देते हैं जब उनके कानों तक बुजुर्गों की उपेक्षा की खबरें पहुंचती हैं.
मेरे मैसेंजर पर पिछले दिनों किसी सज्जन ने न्यूज क्लिप का एक वीडियो भेजा था, जिसमें एक बूढ़ी माता को कुछ लोग घसीट रहे थे और उसे ट्रैक्टर के नीचे डालकर डरा रहे थे. वे लोग शायद उस बूढ़ी के बेटे थे और जमीन-जायदाद की फसाद में उनकी यह दुर्गति कर रहे थे.
उसी दिन मैंने एक पोस्ट देखा, जिसमें एक बुजुर्ग महिला की खस्ताहाल स्थिति के बारे में खबर थी कि वह भूख से मरने की स्थिति से जूझ रही हैं. खबर पर उस जिले के कलेक्टर ने संज्ञान लिया और अपने घर से खाना बनवाकर उस बूढ़ी के साथ केले के पत्ते पर खाना खाया. साथ ही उनके लिए वृद्धा-पेंशन की व्यवस्था कर दी.
शहर से लेकर गांव तक बुजुर्ग अपनों से लगातार पीड़ित और उपेक्षित देखे जा रहे हैं. सिमटती जिंदगी में दूर के रिश्ते तो कब के खत्म हो चुके हैं, नजदीकी रिश्तों के प्रति भी उपेक्षा-भाव इतना बढ़ गया है कि देखकर भी रिश्ते हमारी नजरों से फिसल जाते हैं.
कक्का कहते हैं कि बुजुर्गों की कुर्बानियों को याद नहीं रख पाने के कारण ही ऐसा हो रहा है. खैर, इन संदर्भों में अक्सर मुझे एक रात का वह दृश्य याद आ जाता है. क्या है कि किसी-किसी रात मुझे एकदम से नींद नहीं आती. हालांकि, बाद में गहरी नींद आती है. मैं आपको उस रात की बात बताता हूं.
मम्मी की उम्र करीब पचीस वर्ष रही होगी. शिशु मुश्किल से छह महीने का रहा होगा. जब रात के दस बज गये और मम्मी के सोने की बेला आयी, तो शिशु रोने लगा. मम्मी ने उसे गोदी में रखकर झुलाया और दूध पिलाया, तब वह चुप हुआ. पेट भरते ही शिशु खेलने के मूड में आ गया और उसकी किलकारी फूटने लगी. मम्मी ने चाहा कि वह बिस्तर पर खेले, ताकि वह भी झपकी ले सके. लेकिन शिशु को जैसे ही बिस्तर पर लिटाती, वह रोने लगता. तब उसे गोद में लेकर झुलाने लगती. वह चुप हो जाता.
इसी तरह रात के एक बज गये. मम्मी गोद में शिशु को झुलाती हुई ऊंघने लग जाती. उसकी आंखें भारी हो जातीं और वह थकने लगती. पालथी मार झपकी ले रही मम्मी को चौंककर अपनी आंखें खोलनी पड़ जातीं. शिशु पेशाब कर देता और रोने लगता. मम्मी अपनी नींद झटककर उसे सुखाती, तब उसका रोना बंद होता. शिशु कुछ-कुछ देर पर थोड़ा-थोड़ा दूध पीता और मस्ती करने लगता.
रात के तीन बजे तक यही क्रिया अनवरत जारी रही. मम्मी के चेहरे पर नींद और थकान के भाव उभर आये. गुस्सा या खिन्नता का भाव नहीं था. दूध पीते ही किलकते बच्चे को देखकर मम्मी कभी-कभी मुस्कुराने भी लगती. मम्मी का कहना था कि यह उसका रोज का नियम है. बड़ा नटखट बच्चा है. हमारे मां-बाप ने हमें ऐसे ही पाला है, लेकिन अब बुजुर्ग हो गये हैं. हर हाल में हमें इनका सम्मान करना चाहिए.
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