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Home Opinion प्रकृति रंग लुटा रही है!

प्रकृति रंग लुटा रही है!

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मिथिलेश कु. राय
युवा रचनाकार
mithileshray82@gmail.com
कक्का खेतों की ओर से घूम कर लौटे ही थे. कह रहे थे कि फागुन का महीना आते-आते प्रकृति लाल, हरे और पीले रंगों में डूबने-उतरने लगती है. उन्होंने सेमल के लाल-लाल फूलों को याद किया और नये निकले हरे पत्तों को भी. उन्हें आमों में अभी-अभी निकले बौर की याद हो आयी. उन्होंने कहा कि किसी भी त्योहार का उत्साह प्रकृति अपने में सकारात्मक बदलाव करके हमें पहले ही दे देती है!
कक्का कह रहे थे कि आज उन्होंने बांस-बाड़ी में बहुत अच्छा समय गुजारा. वहां सेमल के कुछ वृक्ष हैं. उन पर खिले लाल फूलों से अद्भुत छटा बिखरी हुई थी. वे मेड़ पर बैठकर आत्ममुग्ध भाव से फूलों की तरफ देखते रहे थे.
लाल सुर्ख फूल. पत्ते एक भी नहीं, सिर्फ फूल ही फूल. बांसों की हरी पत्तियों के बीच लाल-लाल फूल. वातावरण में एक मोहक दृश्य पसरा हुआ था. निहारने से मन ही नहीं भर रहा था.
उनकी आंखों में अब भी सेमल के लाल-लाल फूलों का दृश्य तैर रहा था. कहने लगे, सेमल के फूल निश्चिंत होकर धरती की पूजा करते हैं. सवेरे चुन लिये जाने का इन्हें कोई खतरा नहीं रहता. ये ईश्वर की पूजा के लिए उपयुक्त नहीं ठहरते.
आदमी चाहे तो इन पर लात रखकर भी निकल सकता है. जबकि हरसिंगार पर पैर रखना महापाप है. धरती को पूजने की कसक हरसिंगार के फूलों की भी रहती होगी. इसलिए जब रात उतरती है, तो वे चुपके से मिट्टी पर गिर-गिर आते हैं. लेकिन उनकी हसरत अधूरी ही रह जाती है. अधूरे में ही वे चुन लिये जाते हैं.
कक्का यह कह रहे थे कि सारे फूल धरती पर गिरने को आतुर रहते हैं. वे मिट्टी की पूजा करने को व्याकुल रहते हैं. लेकिन वे मिट्टी की पूजा कर सकें, इससे पहले ही किन्हीं बेदर्द हाथों से वे डार से बिछुड़ा दिये जाते हैं.
अब उन्हें आम के वृक्षों की याद आ गयी. आम के वृक्षों में मंजर निकल रहे हैं. वे कहने लगे कि अब गाछ सब एकसलिया हो रहा है. कक्का सही थे. अबकी आम में मंजर कम आये हैं. वे जहां-तहां गाछ को रुक कर देखने लगते हैं- मनुष्यों ने जो प्रकृति के साथ किया है, उससे वह खुद तो प्रभावित हो ही रहा है, फसल और वृक्ष भी परिणाम भुगत रहे हैं.
कक्का का कहना था कि पुराने वृक्ष का एकसलिया होना उनकी समझ में आता है. उनकी क्षमता कम हो रही है, तो वे एक बरस रुक कर अपनी शक्ति को संग्रहित करते हैं और दूसरे साल मंजर और फल से लद जाते हैं.
लेकिन नये पेड़ाें की शक्ति का किस कारण क्षय हो रहा है? क्या मिट्टी की उर्वरा और आबोहवा से उनके फलने की क्षमता पर प्रहार हो रहा है? वे इस रहस्य को सुलझा नहीं पाते हैं और उदास नजरों से उन वृक्षों की ओर देखने लगते हैं, जिनमें मंजर के समय मंजर नदारद है.
कक्का की चिंता वाजिब लगती है. पिछले साल जो वृक्ष मंजर से लदे हुए थे, इस बार उनमें मंजर नदारद हैं. कुछ न कुछ तो गड़बड़ है. प्रकृति बड़ी तेजी से प्रतिकूल होती जा रही है. इसका सबसे बड़ा खामियाजा किसको भुगतना होगा? हमारी आनेवाली पीढ़ियों को या दूसरे ग्रह के प्राणियों को!
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