[tdb_header_weather inline="yes" temp_color="#000000" loc_color="#000000" api="653566bd56b7ecfee45d74c0fc937fc1" float_right="yes" align_horiz="content-horiz-center" icon_size="24" icon_space="10" f_temp_font_family="420" f_temp_font_size="14" f_temp_font_weight="500" f_unit_font_size="14" f_loc_font_size="14" f_unit_font_family="882" location="Ranchi" icon_color="#000000"]
[tdb_header_categories align_horiz="content-horiz-left" el_align_horiz="content-horiz-left" tdc_css="eyJhbGwiOnsibWFyZ2luLXJpZ2h0IjoiNSIsImhlaWdodCI6IjQwIiwiZGlzcGxheSI6IiJ9fQ==" icon_size="18" limit="18" elem_text_color="#2d2800" f_elem_font_family="420" f_elem_font_size="16px" f_elem_font_weight="500" tdicon="tdc-font-fa tdc-font-fa-navicon-reorder-bars" inline="yes" shadow_shadow_size="0" shadow_shadow_offset_vertical="0" shadow_shadow_spread="0" bg_color="#f9f9f9" include="1028, 1081, 1446, 1228, 3706, 2624,1071"][tdb_mobile_horiz_menu inline="yes" menu_id="372" tdc_css="eyJwaG9uZSI6eyJkaXNwbGF5IjoiIn0sInBob25lX21heF93aWR0aCI6NzY3LCJhbGwiOnsiYm9yZGVyLXN0eWxlIjoibm9uZSIsImRpc3BsYXkiOiIifX0=" f_elem_font_size="18px" f_elem_font_weight="eyJhbGwiOiI3MDAiLCJwaG9uZSI6IiJ9" f_elem_font_family="420" text_color_h="#f58220" main_sub_icon_size="13"]
Home Opinion आध्यात्मिक फिजाओं की खुशबू

आध्यात्मिक फिजाओं की खुशबू

0
कविता विकास
रचनाकार
kavitavikas28@gmail.com
भारत में हर ऋतु के अनुसार खान-पान, पर्व-उत्सव और कर्मकांड होते हैं. माघ मेला, पौष मेला, कुंभ मेला, दशहरा मेला आदि एक स्थान विशेष में होते हुए भी विभिन्न प्रदेशों की संस्कृति को समेटे होते हैं. मेला जब गंगा के किनारे हो तब उसका महत्व और भी बढ़ जाता है. गंगोत्री से निकली गंगा कूदती-फांदती उत्तर प्रदेश-बिहार पहुंचते-पहुंचते युवा हो जाती है. थोड़ी चपलता, थोड़ा गांभीर्य. और बात जब संगम के गंगा की हो तो क्या कहने! संगम की गरिमा और इसकी महिमा से हर व्यक्ति परिचित है.
संगम किनारे से गुजरते हुए लगता था कि पलकें भी ना झपकें, नहीं तो कुछ छूट ना जाये. देशी-विदेशी पर्यटकों के स्वागत में कोई कमी नहीं थी. सड़कें सुगठित. वैसे तो कुंभ मेले में पहले भी जाना हुआ है, पर इस बार जैसा विहंगम दृश्य कभी नहीं देखने को मिला था. मेले भारतीय सनातन परंपरा के मुख्य अंग रहे हैं, जो धर्म और परंपराओं के संवहन में मुख्य भूमिका निभाते हैं.
कुंभ मेले में तो मानो आध्यात्मिक फिजाओं की खुशबू अपनी ओर खींच रही हो. जगह-जगह संत पंडालों के मंत्रोच्चार और ऋषियों के सद्-वचन एवं तत्वमीमांसा के उद्गार अपनी समृद्ध संस्कृति को उजागर कर रहे थे.
पूरे वातावरण में धर्म, मंत्र और आस्था का मिला-जुला प्रभाव था. अलग-अलग खेमे में अलग-अलग अखाड़ों का अड्डा था. चेहरे विशिष्ट रंगों से रंगे हुए. मुझे वहीं पता चला कि हरेक अखाड़े के सदस्यों में तिलक लगाने और चेहरे के रंग-रोगन के प्रकार भिन्न-भिन्न होते हैं.
एक की शैली दूसरे से अलग होती है, जो उनकी विशिष्ट पहचान है. कल्पवासियों के अलग खेमे थे. कभी मुग्धकारी संगीत गूंजता, तो कभी नादों का समवेत अनहद नाद.
संगम में डुबकी लगाने के साथ देवताओं के नाम अर्घ्य अर्पण करके सचमुच लगा कि जन्म-जन्मांतर के पापों से मुक्ति मिलने का रास्ता खुल गया. यह पुण्य स्नान अतीत के कुकर्मों का मूल्यांकन कर भविष्य में सुकर्मों की ओर प्रेरित करता है. यह मेला सनातन संस्थाओं और आम जनमानस के बीच सीधा संबंध जोड़ता है. कहते हैं, गंगा, यमुना और सरस्वती के त्रिवेणी संगम को ओंकार नाम से अभिहित किया गया है.
ओंकार का ‘ओम्’ परब्रह्म परमेश्वर की ओर रहस्यात्मक संकेत करता है. अमृत कलश को निकालने में बृहस्पति, सूर्य और चंद्रमा का विशेष योगदान था. मन, आत्मा और ज्ञान के सम्मेलन से ही आध्यात्मिक शक्ति का उद्भव होता है, जो कुंभ स्नान के बाद पापों का नाश कर मोक्ष का मार्ग बनाती है.
जिस यात्रा पर जाने के लिए आप मन से उत्साहित हों, जिसका आध्यात्मिक, सांस्कृतिक और सामाजिक महत्व हो तथा जिसकी महिमा में अटूट आस्था हो, तो वह यात्रा सर्वोत्तम होती है. कुंभ मेले के दौरान तथा पश्चात मुझे कभी न तो थकावट हुई और न कभी शोरगुल से परेशानी. करोड़ों लोगों के साथ चलना द्योतक है कि अपनी मिट्टी की विरासत में भारतीय मूल्य और नैतिकता की गहरी पैठ है.
ऐप पर पढें
होम आप का शहर
News Snap News Reel