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विकास में विषमता

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भारतीय अर्थव्यवस्था की बढ़त का एक नकारात्मक पक्ष राज्यों का असमान विकास रहा है. स्टेट बैंक ऑफ इंडिया द्वारा जारी मानव विकास सूचकांक ने भी इस तथ्य को रेखांकित किया है.
इस सूची में केरल, गोवा, हिमाचल प्रदेश, हरियाणा, पंजाब और तमिलनाडु शीर्ष पर हैं, तो उत्तर प्रदेश और बिहार निचले पायदान पर हैं, लेकिन कुछ अहम तथ्य भी विचारणीय हैं. औद्योगिक रूप से उन्नत गुजरात और महाराष्ट्र कुछ नीचे आये हैं. दक्षिणी राज्यों में विकास की गति बरकरार है और राजस्थान, उत्तर प्रदेश, ओड़िशा और मध्य प्रदेश में भी उत्साहवर्द्धक परिणाम हैं.
इस रिपोर्ट को तैयार करने में तीन मानदंडों को आधार बनाया गया है- शिक्षा, स्वास्थ्य एवं जीवन स्तर. हालांकि पूर्वी और उत्तरी राज्य भी विकास की राह पर हैं, पर दक्षिणी राज्यों की तुलना में इसे संतोषजनक नहीं माना जा सकता है. कुछ समय पहले स्टेट बैंक की ही वार्षिक रिपोर्ट के निष्कर्षों के साथ सूचकांक को देखें, तो जनसंख्या में असमानता भी एक चुनौती के रूप में हमारे सामने है. दक्षिण के राज्यों में जनसंख्या नियंत्रण के परिणामस्वरूप कुछ समय बाद अधिक उम्र के लोगों की आबादी ज्यादा हो जायेगी, जबकि उत्तर और पूर्व के राज्यों में युवाओं की संख्या बढ़ती जायेगी.
इस आबादी के लिए शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार उपलब्ध कराने के लिए विकास प्रक्रिया को तेज करने की दरकार है. जनसंख्या का यह असंतुलन पलायन का भी एक कारण है और इसके सामाजिक और सांस्कृतिक प्रभावों पर भी ध्यान देने की आवश्यकता है.
संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम के मानव विकास सूचकांक की कमियों को दूर करने के उद्देश्य से ऑक्सफोर्ड की पहल पर बहुआयामी निर्धनता सूचकांक पिछले साल जारी हुआ था. संयुक्त राष्ट्र के सूचकांक में आय एक महत्वपूर्ण कारक होता है, पर ऑक्सफोर्ड के अध्ययन में शिक्षा, स्वास्थ्य और जीवन स्तर को आधार बनाया गया था. इस कारण उसकी तुलना स्टेट बैंक की ताजा रिपोर्ट से करना तर्कसंगत है.
संयुक्त राष्ट्र सूचकांक में भारत का स्थान विश्व में 130वां है और बहुआयामी निर्धनता सूचकांक में 53वां (105 देशों में) है. बहुआयामी सूचकांक के राज्यवार विवरण के अनुसार, देश के सबसे निर्धनतम 50 जिले बिहार, झारखंड, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान, ओड़िशा और उत्तर प्रदेश में हैं. इस आंकड़ों को विस्तार दें, तो देश के 100 सबसे गरीब जिलों में से 91 इन्हीं सात राज्यों में हैं.
बिहार की आधी से अधिक तथा मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश की 40 फीसदी से अधिक आबादी कई स्तरों पर वंचना के न्यूनतम स्तर पर है. इस आंकड़े को अन्य राज्यों से मिला कर देखें, केरल में बहुआयामी वंचना एक फीसदी तथा दिल्ली, पंजाब, गोवा, सिक्किम और तमिलनाडु सरकार में चार से सात फीसदी है.
जैसा कि स्टेट बैंक की रिपोर्ट में कहा गया है, आयुष्मान भारत जैसी पहलों से इस दशा में व्यापक सुधार की आशा है. यही संभावना अन्य केंद्रीय और राज्य-स्तरीय कार्यक्रमों को लेकर जतायी जा सकती है. वंचना का यह हाल दशकों से चला आ रहा है, सो समाधान में भी समय लगना स्वाभाविक है.
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